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पर्यावरण / ऐसे भी होते हैं शिक्षक जो करते हैं पेड़ों का नि: शुल्क उपचार

चित्र सौजन्य से: द हिंदू/के.बीनू।

के.बीनू एक स्कूली शिक्षक हैं जो कई वर्षों से ‘वृक्ष चिकित्सक’ के तौर पर पेड़ों की बीमारियों का इलाज कर रहे हैं। लोग उन्हें ‘ट्री डॉक्टर’ कहते हैं। उम्र के 51वें साल में वो एक ऐसा काम कर रहे हैं जिसके लिए सदियों तक उन्हें याद रखा जाएगा। वह तरह-तरह के रोगों द्वारा नष्ट किए गए पेड़ों को बचाने के मिशन पर हैं।

एक आम का पेड़, जो बारिश होने से वो खराब हो रहा था। जल्द ही एक रहस्यमय बीमारी के लक्षण उसमें विकसित हुए। यह पेड़ एक स्कूल में था और स्कूल जिसका नाम सेंट जोसेफ यूपी स्कूल है वो केरल के मलायिन्चिप्पारा में है। स्कूल के बच्चे पहले तो यह सब देखकर चौंक गए, फिर जब वो पेड़ ठीक हो गया तो उसे स्वस्थ्य करने के लिए के. बीनू को, ‘ट्री डॉक्टर’ के नाम से संबोधित किया तभी से बीनू ‘ट्री डॉक्टर’ के नाम से पहचाने जाने लगे।

यह पूरी घटना उनके लिए बेहद खास थी। क्योंकि उन्होंने अगले दिन पेड़-पौधों में लगे रोग को ठीक करना का जिम्मा उठाया। वह पेड़ों में लगी दुर्लभ बीमारी ठीक करने के लिए उन्हें थेरेपी देते हैं। जहां से पेड़ खराब हो रहा है पहले वो उसे साफ करते हैं। दवा लगाते हैं और कुछ दिनों तक उस पेड़ के उस हिस्से की देखरेख करते हैं। उनका मानना है कि जब यह चीजें लोग देखते हैं तो वो भी पेड़ों के प्रति संवेदनशील होते हैं।

एक दुर्लभ बीमारी के निदान के साथ, रोगी पेड़ को थेरेपी से गुजरना पड़ता है। बीनू के नेतृत्व में एक टीम क्षय वाले हिस्से को साफ करती है, दवा लगाती है और अगले कुछ दिनों में लकड़ी को एक निर्धारित आहार देती है।

पर्यावरणविद् एस सीतारमण से प्रेरित, बीनू ने लगभग छह साल पहले पेड़ों का इलाज करना शुरू किया था। अंग्रेजी अखबार द हिंदू को वो बताते हैं, ‘जिस तरह आप एक बीमार आदमी को मार नहीं सकते। ठीक उसी तरह बीमार पेड़ काटने के लिए नहीं होते हैं। पेड़ों में भी एक चरित्र होता है, दर्द से चीखता है, अकेलापन महसूस करता है और स्नेह के लिए तरसता है।’

वो बताते हैं उनका पहला मरीज आधा जला हुआ पेड़ था। उन्होंने पेड़ों की चिकित्सा के बारे में चरक और सुश्रुत की कई पुस्तकों के जानकारी हासिल की है। उन्होंने विभिन्न प्रकार के रोगी वृक्ष के उपचार को सीखा है। उन्होंने लगभग 23 पेड़ों का इलाज किया है, जिनमें एक सदी से अधिक उम्र के पेड़ शामिल हैं और यह सब कुछ वो नि शुल्क करते हैं।

बीनू के अनुसार, उपचार कैसे किया जाता है इसका व्यापक रूप से अभ्यास किया है। वह पहाड़ी मिट्टी का मिश्रण, धान के खेतों की मिट्टी, गाय के गोबर, दूध, घी, शहद, केला और के जरिए रोग का उपचार करते हैं। पेड़ के प्रभावित हिस्से पर दवा को लगाते हैं। फिर एक सूती कपड़े से सील कर दिया जाता है। अगले कुछ दिनों तक बंधे हुए हिस्से को भैंस के दूध का उपयोग करके भिगोने की जरूरत होती है और घावों को पूरी तरह से ठीक होने में छह महीने तक का समय लगता है।

बीनू कहते हैं पेड़, विशेष रूप से सड़क के किनारे, कई गालियों में होते हैं। वो पर्यावरण प्रदूषण को कम करते हैं। उनके प्रति हमें संवेदनशील होने की जरूरत है।

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