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धरोहर / संस्कृत मंत्रों के बिना अधूरे हैं दक्षिण कोरिया के बौद्ध मंदिर

दुनिया के ऐसे कई देश हैं जहां पर देवभाषा संस्कृत को वहां की संस्कृति ने आदर पूर्वक स्वीकार किया है। ऐसा ही एक देश है दक्षिण कोरिया जहां के सांस्कृतिक धरोहर पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि यहां के ऐतिहासिक बौद्ध मंदिरों जो अमूमन पहाड़ों के बीच हैं, जहां अंकित संस्कृत भाषा में लिखे श्लोकों को संस्कृत विद्वान आसानी से पढ़ सकते हैं।

दक्षिण कोरिया में ऐसे कई प्राचीन मंदिर हैं, जहां ऐतिहासिक कलाकृतियों में संस्कृत श्लोकों का समृद्ध संग्रह मौजूद है, यहां ऐसे कई बौद्ध स्तूप, घंटियां, अनुष्ठान की वस्तुएं और चित्र शामिल हैं, जहां इन्हें देखा जा सकता है।

देवभाषा संस्कृत ने भारत ही नहीं बल्कि मध्य एशिया के माध्यम से चीन, कोरिया और जापान तक पहुंची। संचार की यह प्रक्रिया प्रचीन समय से चले आ रहे महाद्वीपीय व्यापार के रास्ते से शुरू होती है, जिसे ‘सिल्क रोड’ कहा जाता है। विशेष रूप से, प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार ने संस्कृत भाषा को एशिया के विभिन्न हिस्सों में प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘धर्मनिरपेक्ष संदर्भ में यदि देखें तो चीनी, संस्कृत भाषा के उच्चारण ध्वनि और इसकी वर्णमाला की व्यवस्था पर मोहित थे। 291 ई.पू. में भारतीय भिक्षु मोक्षला ने चीन के लिए 42 सिद्धम सिलेबस की शुरुआत की।’

पूर्वी एशिया में, 4 वीं या 5 वीं शताब्दी के बाद से सिद्धम, रंजना और उचेन जैसी कई लिपियों को ऐतिहासिक रूप से संस्कृत बीज शब्दांश, धरणी और मंत्र लिखने के लिए इस्तेमाल किया गया था। एक हिंदू-बौद्ध धार्मिक संदर्भ में उल्लेखित है कि संस्कृत शब्दांश का उपयोग अमूमन एक शब्दांश ध्वनि, एक देवता के दृश्य रूप का प्रतिनिधित्व करने वाला एक मूल मंत्र होता है। ओम (सिद्धम में), हिंदुओं के साथ-साथ बौद्ध धर्म के दिव्य है।

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धर्मनिरपेक्ष संदर्भ में देखें तो चीनी, संस्कृत भाषा के उच्चारण ध्वनि और इसकी वर्णमाला की व्यवस्था पर मोहित थे। 291 ई.पू. में भारतीय भिक्षु मोक्षला ने चीन के लिए 42 सिद्धम सिलेबस की शुरुआत की।

Courtesy of Cultural Heritage Administration South Korea: संस्कृत में लिखे मंत्र को दर्शाती मिहवांग मंदिर की चित्रित छत।

15 वीं शताब्दी में हंगुल के आविष्कार से पहले, कोरिया में संस्कृत ग्रंथों से अनुवादित चीनी ग्रंथों का उपयोग किया गया। चीनियों ने संस्कृत को फेनिन यानी (ब्रह्म ध्वनि) कहा। संस्कृत भाषा में लिखे गए बौद्ध ग्रंथों का बड़े स्तर पर चीनी भाषा (मंदारिन) में अनुवाद के बावजूद, मध्य तांग अवधि तक लगभग 7,000 खंडों में, संस्कृत को बौद्ध धर्म में एक विशेष स्थान मिला क्योंकि इन मंत्रों का चीनी भाषा का उपयोग करके सटीक उच्चारण नहीं किया जा सकता था।

Feature Podcast : संस्कृत मंत्रों के बिना अधूरे हैं दक्षिण कोरिया के बौद्ध मंदिर

माना जाता है कि बौद्ध धर्म 4 वीं शताब्दी में कोरिया पहुंचा था, जब बौद्ध धर्म की शुरुआत प्राचीन भारत के गांधार क्षेत्र के आचार्य मरनंता द्वारा बकेजे के राज्य से की गई थी। प्रसिद्ध कोरियाई भिक्षु ह्यचो ने 700 ईसवी के आसपास भारत का दौरा किया। इसके बाद, 727 ईसवी में, उन्होंने चीन का दौरा किया और भारतीय आचार्य वज्रबोधि और अमोधवजरा के सानिध्य में संस्कृत का अध्ययन किया। उनके निर्देशन में, ह्यचो ने चीन के माउंट वुताई में संस्कृत से चीनी भाषा में मंजुश्री के सूत्र का अनुवाद किया।

‘आज भी पवित्र शब्द ओम और मंत्र लिखने के लिए सुलेख का उपयोग करने की परंपरा कोरिया में जीवित है। राजधानी सियोल के बाहर, यांग्जी प्रांत में हूएम मंदिर संग्रहालय, संस्कृत रूपांकनों के साथ छत टाइल्स पर संस्कृत के श्लोक आज भी देखे जा सकते हैं।’

कोरियाई प्रायद्वीप पर, 758 ईसवी में सिला काल के दौरान बनाए गए गल्हांग मंदिर के एक पत्थर के शिवालय पर सिधम लिपि में लिखे गए शुरुआती संस्कृत ग्रंथों का उल्लेख है। यह पाठ गोलाकार मंत्र में लिखा है। रिसर्च से पता चला है कि कोरियाई भिक्षुओं ने प्रार्थना में संस्कृत भाषा का उपयोग किया और संस्कृत को कोरियाई के साथ मिलाया।

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आज भी पवित्र शब्द ओम और मंत्र लिखने के लिए सुलेख का उपयोग करने की परंपरा कोरिया में जीवित है। राजधानी सियोल के बाहर, यांग्जी प्रांत में हूएम मंदिर संग्रहालय, संस्कृत रूपांकनों के साथ छत टाइल्स पर संस्कृत के श्लोक आज भी देखे जा सकते हैं। ग्योंगजू के गोलगुल मंदिर की छत पर लगी टाइल्स में सुंदर डेंचॉन्ग चित्रों पर ओम आकृति को विशेष तौर पर स्थान दिया गया है।

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