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शिक्षा / स्कूल नहीं ये है अनोखा पुलिस स्टेशन जहां बच्चों को पढ़ाती है पुलिस

Picture Courtesy: TOI

उत्तराखंड के देहरादून का प्रेम नगर पुलिस स्टेशन सुबह के 9.30 बजते ही बच्चों का स्कूल बन जाता है। यहां पुलिस चोरों और हत्यारों पर नकेल कसने के साथ यहां के पुलिस अधिकारी भी बच्चों को पढ़ाते हुए नजर आते हैं।

दरअसल, रोज सुबह यहां बच्चों से भरी एक वैन आती है जो बच्चों को 9.30 बजे से पहले पुलिस स्टेशन के बाहर छोड़ जाती है और यह पुलिस स्टेशन स्कूल में बदल जाता है। ये सभी बच्चे टन नदी के पास बसे नंदा की चौकी नामक बस्ती से यहां पढ़ने आते हैं। 4 से 12 साल के ये बच्चे बिना कोई देरी किए स्टेशन में बिछी एक दरी पर अपनी अपनी जगह बैठ जाते हैं।

इन बच्चों को यहां 6 घंटे यानी 3.30 बजे तक पढ़ाया जाता है। सभी बच्चों की उम्र और उनकी क्षमता के मुताबिक उन्हें यहां अलग अलग विषय पढ़ाए जाते हैं। क्योंकि इन बच्चों को स्कूल की तरह नहीं पढ़ाया जाता। इस वजह से बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। तो वहीं जो बच्चे आसानी से पढ़ सकते हैं, उन्हें इतिहास और भूगोल भी पढ़ाया जाता है। मार्च में 10 बच्चों के साथ शुरू किए गए इस स्कूल में अब 51 बच्चे हैं।

कुछ इस तरह हुई स्कूल की शुरूआत

इस स्कूल की शुरुआत देहरादून की आसरा ट्रस्ट द्वारा की गई थी, लेकिन उनके पास स्कूल शुरू करने के लिए कोई जगह नहीं थी। जिस कारण ये ट्रस्ट, बच्चों को चकराता रोड के फुटपाथ पर बच्चों को पढ़ाती थी, लेकिन देहरादून की इस सड़क पर बहुत ट्रेफिक रहता है और जब प्रेम नगर पुलिस स्टेशन के ऑफिसर मुकेश त्यागी ने फुटपाथ पर बच्चों को पढ़ते देखा तो उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने स्टेशन में बच्चों को पढ़ाने की जगह दी।

पुलिस की मदद से इस स्कूल को आगे बढ़ने में मदद मिली। जिसके बाद ज्यादा बच्चों के माता पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए। वहीं कुछ लोगों ने स्कूल को आगे बढ़ाने के लिए मदद का हाथ बढ़ाया। किसी ने स्कूल वैन के लिए हर महीने 5,000 देने का वादा किया तो वहीं किसी ने बच्चों को स्कूल बैग दिलाए।

तो वहीं पुलिस स्टेशन में काम करने वाले 50 लोगों के स्टाफ से भी स्कूल को मदद मिली। किसी ने रोजाना बच्चों को समोसा या केला जैसी चीजे खिलाने का जिम्मा उठाया तो किसी ने बच्चों के खाने की जिम्मेदारी भी ली।

मैं कभी स्कूल नहीं गई थी लेकिन

TOI से बात करते हुए आसरा ट्रस्ट के साथ काम कर रहीं राखी वर्मा बताती हैं, ‘स्कूल में बच्चों की तादाद बढ़ने के बाद से पुलिस स्टाफ भी अपने खाली वक्त में बच्चों को पढ़ाता है। साथ ही रोजाना की क्लास को तीन भागों में बांट दिया गया है. जिसमें सभी भाग 2-2 घंटे के होते हैं।’

5 साल की अर्चना ने कहा, यह स्कूल हमारे लिए वरदान है। अर्चना के पिता प्लास्टिक के बर्तन बेचते हैं और घर के खर्चों को मुश्किल से पूरा कर पाते हैं। मैं कभी स्कूल नहीं गई थी लेकिन अब मैं रोज स्कूल आती हूं और मुझे यहां बहुत अच्छा लगता है। वहीं 6 साल की गायत्री जो पहले अपने पिता की मदद के लिए उनके साथ काम करती थी। अब आसरा स्कूल में पढ़ती हैं।

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