Press "Enter" to skip to content

लोकतंत्र / …तो क्या जनता ही ‘नेता’ है लेकिन कैसे? यहां जानें

तमिल में लोकतंत्र को जननायक कहते हैं जिसका मलतब है कि जनता ही नेता है। दुर्भाग्य की बात है कि आम लोग यह भूल गए हैं कि वे नेता हैं।

लोकतंत्र में न कोई नेता होता है और न कोई जनता। बस लोग होते हैं। होना यह चाहिए कि हर पांच साल में आप खड़े हों और नेता बनें। हम एक बार किसी को जिम्मेदारी देने के बाद भूल जाते हैं। जब कोई कुछ गलत करता है, तो हम चीखने लगते हैं, नहीं तो हमें कोई परवाह नहीं होती।

अगर आप लोकतंत्र में रह रहे हैं, तो आपकी इसमें सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। दर्शक बनकर आप चुपचाप नहीं बैठ सकते हैं और जब किसी ने कुछ गलत किया तो चीखने-चिल्लाने लगे, इससे काम नहीं होगा।

सद्गुरु कहते हैं कि अगर आप पूरा ध्यान नहीं देंगे, तो आपका घर भी ठीक से नहीं चलने वाला। तो जब बात पूरे देश की है, इतने सारे लोगों की है, तब अगर हर व्यक्ति इस बात पर ध्यान नही देगा कि क्या करना जरुरी है, तो गड़बड़ी तो होगी ही और जब गड़बड़ी होती है तो हम रोते हैं। लोकतंत्र को लेकर सबसे खूबसूरत बात यह है कि बिना किसी खून-खराबे के सत्ता बदलती रहती है। मानव इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

हमारा देश है तो हमें संभालना होगा

हमने एक बड़ी गलती यह की है कि शिक्षा व्यवस्था में, अपने घरों में इस मुद्दे पर कोई जागरूकता नहीं लाए हैं। हम जानते ही नहीं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कुछ ऐसे तरीके होते हैं जिनके जरिए हम सभी रोजमर्रा के आधार पर इसमें हिस्सा ले सकते हैं।

आज अच्छे लीडरशिप को लेकर हमारी सोच ये है कि अगर हमें कोई अच्छा नेता मिल जाए तो हम उसकी पूजा करना शुरू कर देते हैं। अगर एक काबिल नेता शिखर तक पहुंचता है, तो उसे पूजा की जरूरत नहीं है, उसे अपने नीचे कई स्तरों पर लीडरशिप की जरूरत है, जिससे उसे उन कामों को पूरा करने के लिए सहयोग मिलता रहे, जो वह करना चाहता है। लेकिन अगर कोई बड़ा नेता उभरता है तो वह अपनी जगह ही घूमता रहता है, क्योंकि नीचे से कोई सहयोग मिल ही नहीं रहा। या तो ऐसे लोग होंगे, जो उसकी पूजा करने लगेंगे, या वे होंगे जो अपने काम में उलझे हैं।

लोकतंत्र का अर्थ है कि देश हमारे हाथों में है। हमें ही इसे संवारना है। कोई इंसान हमें दिशा देगा, कोई नीतियां बनाएगा, कोई फैसले लेगा, लेकिन देश सारे लोग ही मिलकर चलाएंगे। अगर हमें यह बात समझ नहीं आई तो हम हमेशा शिकायतें ही करते रहेंगे। हमारा देश मजबूत नहीं होगा।

अगर हमें मजबूत देश चाहिए तो हमें खड़ा होना होगा और देश की बागडोर अपने हाथ में लेनी होगी। देश की बागडोर हाथ में लेने का अर्थ यह नहीं है कि कल सुबह ही आप सत्ता हड़पने पहुंच जाएं। बल्कि इसका मतलब यह है कि हम जहां हैं, हमारी जो भूमिका है, हम उसे अच्छी तरह से निभाते रहें।

पहले से मौजूद है लोगों में भ्रष्टाचार

लोग कहते हैं कि राजनेता भ्रष्ट होते हैं। मैं आपसे पूछता हूं कि अगर चौराहे पर कोई पुलिसवाला न हो तो कितने लोग रेड लाइट पर रुकेंगे? मुश्किल से 10 फीसदी। बाकी का क्या होगा?

अगर उनमें से एक को आप मंत्री बना दें, तो बताइए वे क्या करेंगे? वे तो कानून तोड़ेंगे ही। ऐसे लोगों को अगर आप सत्ता में ले आए तो क्या होगा? बस ये है कि जो लोग सत्ता में होते हैं, उन पर सबकी नजरें होती हैं। वे जो करते हैं, सबको नजर आ जाता है, लेकिन भ्रष्टाचार हर जगह फैला है।

एक घर के भीतर लडक़ी और लडक़े में फर्क किया जाता है। यह भी भ्रष्टाचार ही है। भ्रष्टाचार किसी से रिश्वत लेना ही नहीं है, यह हर स्तर पर है। जीवन में कहीं निष्पक्षता नहीं है, हमने भ्रष्टाचार को हर जगह पहुंचा दिया है। अगर इसे हटाना है तो आध्यात्मिक प्रक्रिया की जरूरत होगी।

(आप हमें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, लिंक्डिन और यूट्यूब  पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।)

More from जीने की राहMore posts in जीने की राह »

Be First to Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *