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सेहत / ऑर्गनिक खेती कर इस राज्य के किसान बना रहे लोगों को सेहतमंद

– विजय मनोहर तिवारी

उत्तर-पूर्व के राज्य बाकी देश से काफी हद तक अलग-थलग ही रहे हैं। हमें पता ही नहीं होता कि वहां हो क्या रहा है। वे सात राज्य हैं, जो पांच देशों की सीमाओं को छूते हैं-चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश। सिक्किम इन्हीं में से एक है, जहां टूरिज्म की वजह से फिर भी कुछ हद तक पहुंच है। यह बहुत छोटा सा खूबसूरत पहाड़ी राज्य है।

जब पूरे भारत में बहस एससी-एसटी एक्ट, मॉब लिंचिंग जैसे विषयों पर हो रही है, सिक्किम में यह कोई विषय ही नहीं हैं। वह अपनी धुन में कुछ अलग ही काम में लगा है। यह अकेला राज्य है जो दो साल पहले बाकायदा ऑर्गनिक घोषित हो चुका है। अब पूरी मशीनरी इसे अगले स्तर पर ले जाने में भिड़ी है। लगातार कुछ न कुछ नया हो रहा है। पिछले हफ्ते मैं वहां इसी वजह से गया। शहर और गांवों में कई लोगों से मिला। एक दिन सचिवालय के अफसरों के बीच बिताया। किसानों की हालत बदल देने वाले इस काम में सरकारों और अफसरों को कैसे काम करना चाहिए, यह सिक्किम का सबक है।

राजधानी गंगटोक में बहुमंजिला किसान बाजार बन रहा है, जहां जैविक सब्जियों को लेकर किसान सीधे उपभोक्ताओं के बीच आ रहे हैं। इमारत अभी बन रही है लेकिन बाजार शुरू हो चुका है। कुल 77 हजार हेक्टेयर जमीन में से इलायची, अदरक, हल्दी और बक व्हीट जैसी खास फसलों के लिए 14 हजार हेक्टेयर जमीन रिजर्व की गई है। इंडियन फामर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव (इफको) सिक्किम सरकार के साथ मिलकर जैविक फसलों के लिए 50 करोड़ रुपए लागत की प्रोसेसिंग यूनिट लगा रही है। एक साल के भीतर इनकी योजना इन्हीं चार प्रमुख फसलों को ऑर्गनिक सिक्किम के ब्रांड से देश के हर मॉल तक ले जाने की है। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रांड सिक्किम दाखिल होगा।

’37 साल के शिशिर खड़का रानीपुल के रहने वाले हैं। बेंगलुरू में तीन साल तक थ्रीडी एनिमेशन की पढ़ाई की। दो साल वहीं नौकरी की। जैविक का माहौल बना तो तीन साल पहले लौटकर आ गए। वे ट्रेड में गए। किसानों से खरीदकर इलायची, हल्दी, अदरक, बक व्हीट और कुट्टू के पावडर, चिप्स और नूडल्स का सुंदर सिक्किम नाम से अपना ही ब्रांड बना लिया।’

पर्यटन प्रधान सिक्किम के लिए ऑर्गनिक खेती करिश्माई साबित हुई है। कृषि, उद्यानिकी और कैश क्रॉप डेवलपमेंट विभाग के सचिव खोरलो भूटिया को मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने रिटायर होने के बाद दो सेवावृद्धि दी हैं। वे खुद भी किसानी करते हैं और हर दिन उनका ऑफिस किसी वॉर रूम का अहसास कराता है। वे ऑर्गनिक स्टेट की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं और रोज के टारगेट पर काम कर रहे हैं। वे कहते हैं-ऑर्गनिक सिक्किम के कारण चार सालों में पर्यटकों की तादाद दो गुनी हो गई है। 2014-15 में साढ़े छह लाख पर्यटक आए। बीते साल 14 लाख हो गए। इस साल हम 20 लाख की उम्मीद कर रहे हैं। दो साल में नेपाल, भूटान समेत देश के सभी राज्यों से करीब 11 सौ प्रतिनिधिमंडल आकर देख चुके हैं कि यहां खेतों में चल क्या रहा है?

खेतों में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए मैं भी गंगटोक से बाहर गया। 37 साल के शिशिर खड़का रानीपुल के रहने वाले हैं। बेंगलुरू में तीन साल तक थ्रीडी एनिमेशन की पढ़ाई की। दो साल वहीं नौकरी की। जैविक का माहौल बना तो तीन साल पहले लौटकर आ गए। वे ट्रेड में गए। किसानों से खरीदकर इलायची, हल्दी, अदरक, बक व्हीट और कुट्टू के पावडर, चिप्स और नूडल्स का सुंदर सिक्किम नाम से अपना ही ब्रांड बना लिया। तीन साल में ही टर्न ओवर 80 लाख रुपए। रानीपुल में फैक्ट्री बन रही है। अब सिलीगुड़ी और कोलकाता ले जाने की तैयारी है। शिशिर कहते हैं- पैसा अपनी जगह है। बड़ी बात है कि सिक्किम के सीएम समेत इस फील्ड के कई बड़े लोग मुझे पहचानते हैं। बेंगलुरू की नौकरी में क्या यह मुमकिन था?

एक छोटे किसान की दूसरी कहानी खामदोंग गांव में मिली। यहां के 44 वर्षीय डीपी सुबेदी ढाई एकड़ के किसान हैं। उनके पिता इसी जमीन पर सिर्फ भरण-पोषण लायक ही उपज ले पाते थे। सिर्फ लाख-डेढ़ लाख के अदरक और संतरे ही बाहर बिकते थे। वर्ष 2006 में सुबेदी ने काम संभाला। उन्होंने हर एक इंच जमीन का इस्तेमाल किया। आज वे चेरी पेपर, पपीता, अदरक, हल्दी, मिर्ची और सब्जियां उगा रहे हैं। शहद के लिए मधुमख्खी पालन और दूध के लिए तीन गाएं भीं। सालाना छह लाख की उपज बेच रहे हैं। अकेली मिर्ची ही दो लाख की। तीन गायों के गोबर और गोमूत्र से खाद खुद बनाते हैं। खेतों के चारों तरफ बरगद की एक प्रजाति के पेड़ लगाए हैं, जिनके ताजे हरे पत्ते चारे में काम आते हैं। सभी चीजें अलग मौसम की हैं। यानी हर मौसम में कुछ न कुछ उपज आना तय। वे कहते हैं-ढाई एकड़ को जैविक बनाने के लिए तीन गाएं काफी हैं। हम खाद नहीं खरीदते।

रूमटेक गांव में 29 एकड़ के किसान करमा डिचेन बताते हैं कि शुरू के तीन साल बहुत कठिन थे। किसान गुस्से में थे। सरकार से नाराज भी। पहले एक हेक्टेयर में उत्पादन 20-22 क्विंटल था। लेकिन बाद मजबूरी में जैविक हुए तो घटकर 15-16 क्विंटल पर आ गया। उन्हीं तीन सालों में जैविक खाद बनाने के ट्रेनिंग प्रोग्राम लगातार चले। शुरुआती नुकसान की भरपाई एमएसपी के जरिए सरकार ने की। खाद के लिए किसानों ने डेयरी साथ में जोड़ीं। जिनके पास गाएं नहीं हैं, उन्हें सरकार जैविक खाद दे रही है। अब हम अपना उत्पादन 24-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक ले आए हैं। उपज की कीमतें बेहतर मिल रही हैं।

नहीं था इतना आसान फिर निकाला ये समाधान

2003 में रासायनिक खाद पर रोक के बाद गांव-गांव में जैविक खाद बनाने की ट्रेनिंग दी गई। हर जिले में हर महीने चार ट्रेनिंग रोग प्रबंधन की। उद्यानिकी विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र और आईसीएआर सबने ट्रेनिंग प्रोग्राम किए। सिक्किम स्टेट ऑर्गनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी बनी। इंटरनेशनल कंट्रोल सिस्टम के तहत ही ऑर्गनिक का प्रमाणीकरण साल में दो बार हो रहा है। वर्ष 2013-17 के दौरान सौ करोड़ रुपए की रासायनिक खाद पर केंद्र की सब्सिडी ली ही नहीं गई। मिशन ऑफ वैल्यू एड डेवलमेंट के तहत केंद्र से सिक्किम को 116 करोड़ रुपए मिले। इसके बाद ही सरकार ने चार प्रमुख फसलों पर अपना फोकस बढ़ाया। राज्य को 28 क्लस्टर में बांटकर इतने ही मिशन अधिकारी नियुक्त किए गए। इन्होंने उत्पादक किसानों के समूह बनाए। चार प्रमुख फसलों के बीज किसानों को दिए गए। डेढ़ हजार बीज उत्पादक भी तैयार किए। किसानों के समूह ही अपनी उपज को बाजार में लाएंगे। बिचौलिए गायब। अदरक और हल्दी की पहली फसल बाजार में आ भी चुकी है।

‘पंजाब जैसे राज्यों में एक हेक्टेयर में 200 किलो रसायन ने मिट्टी को मार ही डाला है। हम तो फिर भी सबसे कम 10 किलो रसायन ही इस्तेमाल कर रहे थे। आज सिक्किम की मिट्टी, पानी और हवा किसी भी राज्य से ज्यादा सेहतमंद है।’

हालांकि जैविक शोरशराबे का दूसरा पहलू भी है। अभी भी दाल, चावल, गेहूं, चना, मक्का, आलू, टमाटर, प्याज और मिर्ची बाहर से ही आ रहा है। यानी इनके जैविक होने की कोई गारंटी नहीं। इसलिए अगर आप ऑर्गनिक सिक्किम के आकर्षण में गंगटोक जा रहे हैं तो जैविक स्वाद के लिए आपको सिक्किम में पैदा होने वाली सब्जियों की ही मांग करनी पड़ेगी। इन दिनों फूल गोभी का मौसम नहीं है, लेकिन बाहर से आवक बंद है तो आपको इसकी डिश नहीं मिलेगी। बाजार पर नियंत्रण नहीं होने से चोरी-छिपे बाहर की सब्जियां भी जैविक के नाम से बिक रही हैं। कीमतों का भी बड़ा सवाल है।

सिक्किम का केला पहले 25-40 रुपए दर्जन था। अब 80-100 रुपए है। खीरा 50-60 रुपए किलो से 80-120 तक हो गया है। टिंडे जैसे स्वाद वाला इसकुस पहले 10-20 रुपए किलो था। अब 30 के ऊपर है। पत्ता गोभी 20-25 रुपए किलो से 40 पार चला गया है। फूल गोभी 50-60 से सीधे 80-100 रुपए किलो तक है। गाजर 30-40 रुपए किलो थी। अब 60-100 के बीच है। गोभी और गाजर यहीं होती हैं इसलिए बाहर से लाने पर बंदिश है। होटल व्यवसायी बीबी शुक्ला का कहना है कि जैविक से किसानों को तो फायदा हुआ है लेकिन कीमतें बेकाबू हैं।

खोरलो भूटिया ने आखिर में पते की बात कही। वे बोले कि हम धरती को मां कहते हैं। लेकिन पंजाब जैसे राज्यों में एक हेक्टेयर में 200 किलो रसायन ने मिट्टी को मार ही डाला है। हम तो फिर भी सबसे कम 10 किलो रसायन ही इस्तेमाल कर रहे थे। आज सिक्किम की मिट्टी, पानी और हवा किसी भी राज्य से ज्यादा सेहतमंद है।

– लेखक और वरिष्ठ पत्रकार, वह पिछले कई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

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