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प्रबंधन / ‘मानसिक तनाव को मैनेज’ करने के ‘तनाव’ से कैसे बचें?

दुनिया में स्ट्रेस मैनेजमेंट या तनाव प्रबंधन का बहुत चलन है। दरअसल, जब भी आपकी इच्छा के अनुरूप काम नहीं होता, तब आपको गुस्सा आता है। जब भी आपकी उम्मीदों के अनुसार दूसरे लोग व्यवहार नहीं करते तब आपको गुस्सा आता है। इसलिए स्ट्रेस मैनेजमेंट की जरूरत महसूस की गई।

हमें शारीरिक स्वास्थ्य जितनी अहमियत रखता है, मन का स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इन दिनों दुनिया में ये शब्द बहुत ही प्रचलित है, ‘स्ट्रेस मैनेजमेंट’ यानी मानसिक तनाव का प्रबंधन। जहां-जहां मैनेजमेंट के बारे में बोलना होता है, उन सभी स्थानों पर ‘तनाव को कैसे संभाला जाए’ इसके बारे में सिखाने के लिए मनोविज्ञान विशेषज्ञों का दल मुस्तैदी के साथ तैयार है।

सद्गुरु कहते हैं अपने उद्योग, परिवार या संपत्ति को कैसे मैनेज किया जाए, यदि कोई इस विषय को सीखने की इच्छा करे तो वह बात मायने रखती है। लेकिन मानसिक तनाव तो एक बार में छोड़ देने की चीज है। उसे अपने पास रखते हुए उसे मैनेज करने की कला किसलिए सीखनी चाहिए?

आप अपने आस-पास देखें लोग यह विचार क्यों पाल रहे हैं कि आधुनिक जीवन में मानसिक तनाव कोई जरुरी चीज है? कौन बढिय़ा मैनेजर बन सकता है? किसी वाहन को किस तरह चलाना है यह कला आपको आती हो, तभी तो आप उसे दूसरों को सिखा सकते हैं?

यदि आप दूसरों को अपने वश में रखने की क्षमता पाना चाहते हैं तो पहले खुद को संभालना आपको आना चाहिए। अपने शरीर पर, मन पर और भावनाओं पर काबू पाने की कला सीखने के बाद ही तो आप दूसरों को नियंत्रित करने के बारे में सोच सकते हैं?

जब आप आराम से रहते थे, मन में यही तड़प थी कि नौकरी कब मिलेगी? जब नौकरी मिल जाती है, अपनी सारी खुशियां गंवाकर आप ब्लडप्रेशर जैसी बीमारी को न्योता देते हैं। जब तक पदोन्नति नहीं मिलती उसके लिए संघर्ष जारी रहता है। तरक्की मिल गई तो अब यही शिकायत कर रहे हैं, अरे पल प्रति पल तनाव बढ़ता जा रहा है। और ऊंचे पदों पर पहुंचेंगे तो क्या कहेंगे? यही न कि पहले कितने आराम से रहता था अब जिंदगी का सारा सुख-चैन गायब हो गया है?

जिंदगी को गंवाकर सुख-सुविधाएं बढ़ा लेना मरे हुए तोते के लिए सोने का पिंजड़ा बनवाने के बराबर है। मानसिक तनाव का एक प्रमुख कारण है गु्स्सा। आपने देखा होगा सभी फिल्मों में अपने हीरो को बात-बात पर चिढ़ते और गुस्सा करते हैं और ये देखकर आपने यही धारणा बना ली है कि गुस्सा एक जबर्दस्त ताकत है, महान शक्ति है।

आपने यही धारणा बना ली है कि हो-हल्ला करते हुए चार लोगों को पीटकर दस लोगों को धराशायी करने वाला ही हीरो होता है। आप के अंदर यही डर बैठ गया है कि यह संसार सीधे-सरल लोगों का आदर नहीं करता। आपने अनजाने में ही यह गलत हिसाब लगा लिया कि गुस्सा दिखाने पर आप भी हीरो बन सकते हैं। कभी आपने सोचा है कि आपको गुस्सा कब आता है?

दरअसल, जब भी आपकी इच्छा के अनुरूप काम नहीं होता, तब आपको गुस्सा आता है। जब भी आपकी उम्मीदों के अनुसार दूसरे लोग व्यवहार नहीं करते तब आपको गुस्सा आता है। जैसे मैं चाहता हूं, वैसे दूसरे लोग काम नहीं करते-यूं शिकायत करने से पहले थोड़ी देर के लिए आंखें बंद करके बैठ जाइए।

जरा देखिए, अपने मन को चंद मिनटों तक किसी भी चीज पर टिका पाना संभव हो रहा है या नहीं। आपका मन आपकी इच्छा का उल्लंघन करते हुए कहां-कहां भाग रहा है, इस पर गौर कर रहे हैं न? जब आपका अपना मन आपकी इच्छानुसार काम नहीं करता, तो भला दूसरों का मन आपकी इच्छानुसार कैसे काम करेगा? और इसी बात पर अपने सहयोगियों पर गुस्सा करना कहां तक न्याय संगत है?

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