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बिश्नोई / भारत के पहले पर्यावरणविद जिनकी पहचान है करुणा और त्याग

Image courtesy : Bishnoisafari

15 वीं शताब्दी के बाद से राजस्थान में बिश्नोई समुदाय पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित रहे है। पर्यावरण के लिए करुणा और त्याग समुदाय के मन में हमेशा रहता है। सन् 1485 में पश्चिमी राजस्थान में मारवाड़ के राजपूत सरदार, गुरु जम्बेश्वर बिश्नोई पंथ का संस्थापक माना जाता हैं। उन्होंने 29 आज्ञाएं तैयार कीं, जो बिश्नोई मृत्यु तक पालन करने की उम्मीद करते है। इनमें से छह असाधारण हैं, वे सभी पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

वो अपनों से अलग हुए पशुओं के लिए आश्रय प्रदान करते हैं और उन्हें पेड़ों को काटने की इजाज़त नहीं है, उन्हें इस आज्ञा आजीवन पालन करना होता है। बिश्नोई समुदाय के लोग राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उतरप्रदेश और मध्यप्रदेश आदि प्रदेश में रहते हैं। इस पंथ के मूल में पर्यावरण की सुरक्षा सिद्धांतों के अंतर्गत की जाती है।

सदियों से, वे पर्यावरण के लिए जीते और मरते रहे हैं। सन् 1730 में पश्चिमी राजस्थान के सुदूरवर्ती गांव खेजारी में 363 बिश्नोई पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने खेजड़ी के सैकड़ों पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। यह पेड़ राजा के महल के लिए चूने के भट्टों गर्म करने के लिए काटे जा रहे थे।

बिश्नोई अपने आसपास रहने वाले लुप्तप्राय वन्यजीवों की रक्षा करते हैं। 1998 में बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान द्वारा किया गया काले हिरण का शिकार काफी समय तक चर्चा में रहा। बिश्नोईयों के आंदोलन से हालांकि सलमान को पांच साल कैद की सजा सुनाई गई है। लेकिन स्टारडम और पैसा इन दोनों के सहारे वो आजाद हो गए।

हाल ही में बिश्नोई समुदाय के लोगो ने हरियाणा में परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ एक आंदोलन का नेतृत्व किया। दरअसल, ये जगह पर काले हिरण के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास है और बिश्नोई वन्यजीवों के लिए पर्याप्त संरक्षण योजना की मांग कर रहे हैं। वे पर्यावरणीय सतर्कता के रूप में आगे बढ़ने का इरादा रखते हैं।

15 वीं शताब्दी में गुरु जंबेश्वर द्वारा 29 सिद्धांत तैयार किए गए थे। वो रेगिस्तान में कठिन परिस्थितियों में गेहूं, बाजरा और मिर्च उगाते हैं। वे वन्यजीवों के साथ 10 प्रतिशत भोजन साझा करने के सिद्धांत का धार्मिक रूप से पालन करते हैं।

राजस्थान के खेजड़ली गांव में एक बड़ा मकबरा 363 शहीदों पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को समर्पित है। बिश्नोई पारंपरिक लोग हैं। बुजुर्ग महिलाएं अपने विस्तृत आभूषण पहनती हैं, बिश्नोई पंथ के सिद्धांत में हवन पूजा विशेष है।

बिश्नोई मान्यता के अनुसार हवन हवा को शुद्ध करता है और उनके गुरु के मार्ग को साफ करता है। समुदाय के पुरुष, महिलाओं के विपरीत पारंपरिक रूप से सफेद पोशाक पहनते हैं। उनकी पगड़ियां बहुरंगी होती हैं जो उनकी सामाजिक स्थिति का संकेत देती हैं।

पारंपरिक बिश्नोई रसोई में केवल पेड़ों से गिरी लकड़ियों और पूरी तरह से सूख चुके पेड़ों की लकड़ियों को ईंधन के रूप में और फर्नीचर बनाने में उपयोग करते हैं।

उन्होंने जोधपुर के पास गुडा झील में प्रवासी पक्षियों के लिए इस रेगिस्तानी क्षेत्र में वर्षा जल का संरक्षण किया है। यह झील बिश्नोईयों द्वारा बनाई गई है। कुछ साल पहले, बिश्नोईयों ने बिजली परियोजना की नींव रखने के खिलाफ हरियाणा के फतेहाबाद में भूख हड़ताल की। वे क्षेत्र के लुप्तप्राय वन्यजीवों के लिए एक पर्याप्त संरक्षण कार्यक्रम की मांग करते रहे हैं।

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