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जीवन / क्या सभी के साथ, विनम्र रहना जरूरी है?

कभी किसी को आदर के साथ मत देखो। कभी किसी के को तिरस्कार के साथ मत देखो। सिर्फ जीवन को उसके असली रूप में देखना सीखें। तो सहजता से अपने जीवन से गुजर जाएंगे। यह वो मूल सिद्धांत है जो आपको ताउम्र खुश और तनाव मुक्त रखेगा।

आप देखेंगे स्कूल और कॉलेज में हमें खुद को महत्व देना सिखाया जाता है। खुद से प्यार। खुद पर विश्वास। हमें खुद पर इतना महत्व देना सिखाया जाता है कि हम यह भूल जाते हैं कि विनम्र कैसे रहें? विनम्र कैसे रहें यह सवाल ही नही हैं। सद्गुरु कहते हैं विनम्र रहने की कोई जरूरत नहीं है और ना ही घमंडी होने की कोई जरूरत है।

आप एक उदाहरण से समझिए एक आदमी था जो देश भ्रमण करने निकला और उसके साथ उसकी एक छोटी लड़की भी थी। उस ल़ड़की का बचपन कई घरों में बीता। जब वो आदमी किसी के यहां रुकता तो उस परिवार के परिजन बच्ची पर टूट-पढ़ते और उसे कई तरह की चीजें सिखाने लगते। इसलिए उस आदमी ने फिर एक नियम बनाया कि उस छोटी लड़की के साथ खेल सकते हैं।

कोई उन्हें कुछ सिखाएगा नहीं। तो वो हंसते-खेलते बड़ी हुई। 18 महीने तक होते-होते वह तीन भाषाएं धाराप्रवाह तरह से बोल रही थी। क्योंकि उसे किसी ने सिखाया नहीं तो वह सुन रही थी। तो जब वो स्कूल गई तो 12 साल की थी। जो स्कूल में हुआ उससे वो परेशान होकर घर आई।

वो आदमी जो एक संत था। उसकी लड़की ने कहा कि आप सब कुछ सभी को सिखा रहे हैं मुझे कुछ भी नहीं। तब उस आदमी ने कहा कि तुम्हें बस इतना जानने की जरूरत है कि कभी किसी को तिरस्कार के साथ मत देखो। कभी किसी को आदर के साथ मत देखो।

जब आप किसी को आदर से देखते हैं तो पूरी तरह से चूक जाएंगे कि मैं कौन हूं? अगर आदर के साथ देखेंगे तो हो सकता है दीवार पर उस व्यक्ति की तस्वीर लगा दें। लेकिन वो जो है उसके पूरे महत्व के साथ चूक जाओगे। हमें लोगों को वैसे देखना चाहिए जैसे वो हैं। आदर के साथ नहीं। तिरस्कार के साथ भी नहीं। यह बहुत सरल लगता है। लेकिन इसे आजमा के देखिए। आपने अपने मन में यह तय कर लिया है कि क्या अच्छा है क्या बुरा है। क्या ऊंचा है क्या नीचा है। क्या पुण्य है क्या पाप है। क्या गरीबी है क्या अमीरी है यानी सब कुछ।

सब कुछ पहले से तय है एक बार जब आप तय कर लेते हैं फिर आपको किसी को आदर और किसी को तिरस्कार के साथ नहीं देख सकते हैं। जिसे आप बुरा समझते हैं उसे तिरस्कार से देखेंगे। जिसे आप अच्छा समझते हैं उसे आदर से देखेंगे। अगर आप इसे हटा दें और जीवन को उसके असली रूप में देखना सीखें तो बिना संघर्ष के सहजता से अपने जीवन से गुजर जाएंगे।

अभी समस्या यही है कि आप किसी को आदर तो किसी को तिरस्कार के साथ देख रहे हैं और आप विनम्र होने की कोशिश कर रहे हैं। विनम्र होने की कोई जरूरत नहीं है। हर किसी से उसी कठोरता से बर्ताब कीजिए जैसे कि आप अपने साथ करते हैं। ऐसा तब करें जब आप खुद से सख्ती कर रहे हों तब, यदि आप खुद को खुश रखते हों तो दूसरों के साथ भी यही कीजिए जब आफ ऐसे करते हुए थक जाएंगे तो आप वैसे भी उनके साथ कठोर बर्ताब करेंगे। तो यह सरल है। यही इस संस्कृति की बुनियाद है।

यदि आप मंदिर जाते हैं तो क्या करते हैं। तो Hello तो नहीं करते हैं, आप वहां नमस्कार करते हैं। प्रकृति में आप किसी को भी देखते हैं नमस्कार करते हैं। मूल रूप से इसे वैराग्य कहते हैं।

वैराग्य का अर्थ अपना जीवन त्याग कर कहीं ओर चले जाना नहीं है। ऐसी कोई जगह नहीं है जब तक आप उस व्यक्ति के साथ अंतरिक्ष में साथ नहीं जाते हैं। वैसे आप जहां भी जाएंगे जीवन ही है। वैराग्य का शाब्दिक अर्थ है रंग से परे, यानी आप पारदर्शी हो गए हैं। अगर आप पारदर्शी है तो जीवन का हर आयाम आपसे होकर गुजर जाता है। मगर आपको वो छूता नहीं है।

आप जीवन को जिस हद तक चाहें संभाल सकते हैं। यदि आपके जीवन में वो नहीं कर सकते, जो आप नहीं कर सकते। ये समस्या नहीं है। लेकिन यदि आप वो नहीं कर सकते जो आप करते हैं। तो आप एक तबाही हैं।

जब आप सोचते हैं कि वो अच्छा है बुरा है। अमीर है गरीब है। ऐसा आप सोचते हैं। आप समझिए आपका एक छोटा सा जीवन है। बहुत थोड़ा सा समय है मनुष्य की क्षमता को खिलने के लिए। यहां जब आप चुन रहे हैं कि क्या करना है क्या नहीं। हर चीज जो आप कर रहे हैं वो होनी चाहिए। जो आप नहीं करते वो नहीं हो सकती है।

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