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जीवन / नकारात्मक परिस्थितियों में खुद को इस तरह रखें सकारात्मक

  • सद्गुरु जग्गी वासुदेव।

सकारात्मक सोच का कॉन्सेप्ट आजकल बहुत लोकप्रिय है, पर क्या अपना जीवन चलाने का ये सही तरीका है? दरअसल, संसार में, बहुत सारे लोग ‘सकारात्मक सोच’ के बारे में हमेशा बात करते हैं। आप जब सकारात्मक सोच के बारे में बात कर रहे हैं तो एक तरह से आप वास्तविकता से बचने की कोशिश कर रहे हैं। आप जीवन के सिर्फ एक पहलू को देखना चाहते हैं और दूसरे पहलू को पूरी तरह से छोड़ रहे हैं।

आप उस दूसरे पहलू को अनदेखा कर सकते हैं पर वो आपको अनदेखा नहीं करेगा। आप अगर संसार की नकारात्मक चीज़ों के बारे में नहीं सोचते तो आप बस मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं, और जीवन आपको इसकी सज़ा देगा। अभी, मान लीजिए कि आकाश में काले बादल छा जाएं। आप उन्हें अनदेखा कर सकते हैं पर वे आपको अनदेखा नहीं करेंगे। जब बरसात होनी है तो होगी ही। जब आप भीगेंगे तब भीगेंगे ही।

आप इसे अनदेखा कर सकते हैं और सोच सकते हैं कि सब कुछ सही हो जाएगा। इसकी कुछ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सार्थकता हो सकती है पर अस्तित्व में इसकी कोई सार्थकता नहीं है। ये सिर्फ एक आश्वासन होगा। वास्तविकता को छोड़ कर अवास्तविकता की ओर जा कर आप अपने आपको कुछ आश्वासन दे सकते हैं क्योंकि कहीं न कहीं आपको यकीन है कि आप वास्तविकता को नहीं संभाल सकते। इसीलिए आप सकारात्मक सोच की तरफ झुक जाते हैं। आप नकारात्मकता को छोड़ना चाहते हैं और बस सकारात्मक सोचना चाहते हैं, या, दूसरे शब्दों में, आप नकारात्मकता को टालने की कोशिश करते हैं।

आप जिस किसी भी चीज़ को टालने की कोशिश करते हैं वो आपकी चेतना का आधार बन जाती है। आप जिस किसी भी चीज़ को टालने की कोशिश करेंगे वो और मजबूत हो जाएगी। जो भी जीवन के एक पहलू को खत्म कर के दूसरे पहलू के साथ रहने की कोशिश करते हैं, वो अपने लिए सिर्फ दुख ही लाते हैं।

सारा अस्तित्व दो ध्रुवों के बीच घटित हो रहा है। आप जिसे सकारात्मक और नकारात्मक कहते हैं, वो है पुरुषत्व और स्त्रीत्व, प्रकाश और अंधकार, दिन और रात। इनके बिना जीवन कैसे घटित होगा? ये कहना वैसे ही है जैसे आपको मृत्यु नहीं चाहिए। आप सिर्फ जीवन चाहते हैं। ऐसा कुछ नहीं है। जीवन इसीलिए है क्योंकि मृत्यु है। प्रकाश इसीलिए है क्योंकि अंधकार है। बात बस ये है कि आपको नकारात्मकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। हम दोनों को रहने दें और ये सुनिश्चित करें कि ये दोनों ही किसी भी तरह हमारे लिये उपयोगी हों, हमें कुछ दे सकें।

अगर आप जीवन को वैसे ही देखते हैं जैसा वो है, तो ये हमेशा ही एक समान मात्रा में सकारात्मक और नकारात्मक है। ये जैसा है वैसा ही अगर आप इसे देखें, तो आप पर न तो नकारात्मकता और न ही सकारात्मकता हावी हो पाएगी। चूंकि वे दोनों समान मात्रा में हैं इसीलिये सब कुछ वैसे ही हो रहा है, जैसे वो हो रहा है। इन दोनों का ही अच्छा प्रयोग कर के आपको वो बनाना चाहिये जो आप बना सकते हैं।

प्रकाश का बल्ब इसीलिए जलता है क्योंकि बिजली में दोनों ही हैं। सकारात्मक और नकारात्मक! चूंकि हमें सकारात्मक परिणाम मिल रहा है तो हम नकारात्मक के बारे में चिंता नहीं करते। अगर कहीं पर कोई पुरुष और स्त्री हैं और उनमें से आनंद प्रकट हो रहा है तो हम चिंता नहीं करते कि वहां स्त्री है या पुरुष पर, मान लीजिए कि वे दोनों कोई बहुत नकारात्मक परिणाम दे रहे हों तो हमें लगेगा कि ये दोनों समस्या हैं। सकारात्मक या नकारात्मक होना वास्तव में समस्या नहीं है, उनमें से अंतिम परिणाम क्या आता है बस यही सवाल है।

आपको सकारात्मक या नकारात्मक का प्रतिरोध नहीं करना है। आपको उन दोनों में से बस एक सकारात्मक परिणाम लाना है। और ये आपकी योग्यता का सवाल है। अगर हमें इस जीवन के बारे में चिंता है तो ये बहुत महत्वपूर्ण होगा कि हम जहाँ भी हैं, उसके बारे में सत्यवादी रहें। तभी हम कोई यात्रा कर सकते हैं। सकारात्मक सोच ने लोगों के लिये बहुत सी संभावनाओं को खत्म कर दिया है।

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