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गरिमा / रिश्तों में भाषा की कैसी होनी चाहिए भूमिका, यहां जानें

रिश्तों की परिभाषा में भाषा ठीक उसी तरह होती है जैसे चाय में चीनी। ये भाषा चीनी यानी मंदारिन भी हो सकती या दुनिया के किसी ओर स्थान की या हिंदी और अंग्रेजी जो आप बोलते हैं। स्थानीय भाषा भी हो सकती है या फिर कुछ इस तरह की भाषा जो आपके मन की बात को शब्दों में पिरोकर बयां करने का हुनर जानती हो।

भाषा का ये मेला बहुत पुराना है। भाषा ही है, जो रिश्तों को जोड़ने में एक अहम भूमिका निभा सकती है। रिश्ते जो कांच की तरह होते हैं, बिखर जाएं तो समेटना मुश्किल, संभल जाएं जिंदगी संवर जाती है और ये सब कुछ होता है। भाषा से, भाषा जो रिश्तों में विश्वास की बुनियाद मजबूत करती है और हर रिश्ते में प्रेम के बीज रोपित कर खुशियों के नन्हें पौधों को पल्ववित करती है।

इंसान की शुरूआत में जब कोई भाषा नहीं थी। शब्द अस्त-व्यस्त थे जिन्हें व्यवस्थित किया गया। आदिकाल में आदिमानव से लेकर आधुनिक समय में रोबोट या कहें यंत्र मानव जो भी भाषा बोलते हैं वो कहीं न कहीं किसी न किसी रिश्ते का प्रतिनिधित्व कर रही होती है। ये आप खुद महसूस कर सकते हैं।

भाषा के मेले में सिर्फ बात भाषा की  

भाषाविज्ञान के विशेषज्ञों ने भाषाओं के आर्य, सेमेटिक, हेमेटिक आदि कई वर्ग स्थापित किए। उनमें से अलग-अलग शाखाएं तैयार कीं। उन शाखाओं के भी अनेक वर्ग-उपवर्ग बनाए। उनमें से ज्यादा बोले जाने वाली भाषाओं और उनके प्रांतीय भेदों, उपभाषाओं और बोलियों को रखा है। जैसे हिंदी भाषा भाषाविज्ञान की नजर से भाषाओं के आर्य वर्ग की ‘भारतीय आर्य शाखा’ की एक भाषा है, और ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी आदि इसकी उपभाषाएं या दूसरे शब्दों में कहें तो बोलियां हैं।

यदि भाषा को लिखना है तो लिपियों की मदद लेनी पड़ती है। भाषा और लिपि, भाव व्यक्तीकरण के दो पहलू हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है और दो या अधिक भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है। जैसे कि पंजाबी, गुरूमुखी और शाहमुखी दोनों में लिखी जाती है जबकि हिन्दी, मराठी, संस्कृत, नेपाली आदि सभी देवनागरी में लिखी जाती हैं।

बिगड़ते रिश्तों में अमृत की तरह ही भाषा

रिश्ते प्रकृति बनाती है। ये पूरी तरह से प्राकृतिक और रासायनिक घटना है। जो हमारे शरीर में और हमारे आस-पास घटित हो रही होती हैं। रिश्तों की लंबी फेहरिस्त है। यहां कई रिश्ते जन्म से तो कई बाद में जुड़ते हैं। रिश्तों की खुबसूरती इस बात में होती है कि उन रिश्तों में बंधे लोग विश्वास, ईमानदारी, अपनेपन और सबसे जरूरी प्रेम/स्नेह के बंधन में कितने बंधे हुए हैं।

आप अपने आस-पास देखिए उन लोगों को जो रिश्तों के बिखराव की स्थिति में पहुंच गए हैं और जो रिश्तों को बनाने में पारंगत हो गए हैं। दोनों में इन बातों की गरिमा कितनी जरूरी है ये आप खुद देख सकते हैं। कहते हैं कि बात करने से बात बनती है और बात न करने से बात बिगड़ जाती है। ये एक पुराना जुमला है, ‘किसने और कब कहा, कोई नहीं जानता’ और ना ही जानने की कोशिश करता है क्योंकि इस बात का अर्थ मायने रखता है।

बिगड़ते रिश्तों में भाषा अमृत की तरह होती है। भाषा संवाद का वो जरिया है जो संचार के जरिए भावानाओं या जानकारी से परिपूर्ण बातों को लोगों तक पहुंचाती है। हर व्यक्ति इससे जुड़ा है, ये जुड़ाव ही भाषा की संवेदनशीलता, गरिमा और उसके महत्व की ओर इंगित करती है। जब आप किसी से कुछ कहते हैं तो सिर्फ उन शब्दों को बोल रहे होते हैं जो आप कह रहे हैं लेकिन जो सुन रहा है वो उसे महसूस करता है। कान सतर्क रहते हैं मस्तिष्क विश्लेषण करता है और वो शब्द भाव बनकर सामने जो सुन रहा है उसके चेहरे और व्यवहार में उतर जाते हैं। इसलिए तो कहा गया है भाषा से आप कभी राजा तो कभी निरंक बन सकते हैं।

रिश्तों में भाषा का तालमेल कैसे बनाएं?

हम जब बचपन से पचपन तक का सफर तय कर चुके होते हैं तो एक बात मन के उस कोने में जरूर रहती है कि हमने क्या खोया और क्या पाया। यह खोया-पाया विभाग में भाषा की बड़ी भूमिका होती है। एक बच्चा जब छोटा होता है तो वो अपनी मां के स्वर को सबसे पहले सुनता है और महसूस करता है और जब वो बड़ा होता है तो उस मां की हर बात उसे अजीब लगती है। यह भाषा का एक ऐसा उदाहरण है जो सबसे ज्यादा जीवंत है।

यहां भाषा एक ऐसा भाव बनकर रिश्तों को बनाए रखने में जीवंतता का काम करती है जो आपकी चेतना से जुड़ा होता है। आप जितने सचेत होंगे आपके द्वारा कहे गए वो हर शब्द उतना ही आनंद से सराबोर और लोगों के ह्दय को छूने वाले होंगे। बोलते समय किसी तरह का बनावटीपन नहीं दिखाई देगा और ये सब होगा भाषा से जो रिश्तों को मजबूत बनाने के काम करेगी।

भाषा की गरिमा रिश्तों की गरिमा को भी बनाए रखती है। कई लोग कई तरह से हिंसक, एव्यूज और अपमानजनक शब्दों का उपयोग करते हैं। यदि आप भाषा में इन शब्दों का उपयोग कर रहे हैं तो रिश्तों में भी दूरियां बढ़ती जाएंगी। हो सकता है बात-बात में एव्यूज करना या अपमानजनक शब्दों का ज्यादा बढ़ जाना आपको उन रिश्तों से दूर ले जाए जिन्होंने आपको बनाया है और आपने उन्हें… तय आपको करना है, यह आप कर सकते हैं। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है, लेकिन रॉकेट साइंस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। 

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