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समाधान / पारिवारिक कलह मिटाकर, प्रेम के पौधे करें रोपित

घर-परिवार में कलह, विवाद, लड़ाई-झगड़ा आम बात है। लेकिन कैसे संभालें, ये बड़ा पेचीदा सवाल है। कई बार ऐसे हालात भी बन जाते हैं कि पारिवारिक कलह के कारण घर टूट जाते हैं या ये कलह लोगों की अंतिम सांस बन जाती है।

मतभेद हर जगह हैं, मनभेद नहीं होना चाहिए। हर समय कोशिश करें कि आप अपने रिश्तों को मधुर कैसे बना सकते हैं। आपके पास कई रिश्ते हैं जैसे माता-पिता और भाई-बहन इसलिए सबसे पहले आपको यह समझना जरूरी है कि इन लोगों का चुनाव आप नहीं कर सकते। अगर यह पति-पत्नी के बारे में होता तो आपके पास चुनने का विकल्प होता है।

अपने भीतर मौजूद सीमाओं को समझने के लिए परिवार एक अच्छी जगह है। परिवार में रहकर आप अपनी ट्रेनिंग कर सकते हैं। परिवार के साथ रह कर आप कुछ लोगों के साथ हमेशा जुड़े रहते हैं, जिसका मतलब है, आप जो कुछ भी करते हैं, उसका एक दूसरे पर असर जरूर पड़ता है।

ऐसा हो सकता है कि उनके कुछ काम या आदतें आपको पसंद न हो, फिर भी आपको उनके साथ रहना पड़ता है। सदगुरु बताते हैं कि यह आपके फेसबुक परिवार की तरह नहीं है जिसमें आपने 10,000 लोगों को जोड़ तो रखा है, लेकिन अगर आप किसी को पसंद नहीं करते, तो आप एक क्लिक से उसे बाहर कर सकते हैं। अपनी पसंद-नापसंद से ऊपर उठने के लिए परिवार बहुत ही कारगार साबित हो सकता है।

आपकी पसंद-नापसंद आपको मजबूर बना देती हैं। जब आप पसंद और नापसंद में अटके रहते हैं, तो चेतन होने का सवाल ही नहीं उठता। आप जिस पल किसी चीज को पसंद या नापसंद करते हैं, आपका व्यवहार कुदरती रूप से आपके लिए एक बंधन बन जाता है जो आप पसंद करते हैं, उसकी तारीफ करने और जिसे आप पसंद नहीं करते, उसकी आलोचना करने के लिए आप मजबूर हो जाते हैं।

बात जब परिवार की होती है तो यह एक आवरण की तरह होता है, जिसके भीतर, चाहे आपको पसंद हो या नहीं, लोगों के साथ एक निश्चित समय तक आपको जीवन बिताना होता है। परिवार एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमे रह कर आपको लोगों के साथ एक निश्चित समय तक जीवन बिताना होता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप इसे पसंद करते हैं या नहीं।

अब चाहे आप इसे एक कड़वा अनुभव बना लें, या अपनी पसंद और नापसंद से परे जाना सीख लें, यह आप पर निर्भर है। मान लीजिए, आपको अपने पति की कुछ बातें पसंद नहीं हैं। अगर कुछ समय बाद, आप कहती हैं, ‘यह तो ऐसे/ऐसी ही हैं – कोई बात नहीं,’ तो इसका मतलब है कि आपके पति नहीं बदले हैं, मगर आप एक खास तरह के व्यवहार या उनकी जो चीज आपको इरीटेड करती थी, उसके लिए आप अपनी नापसंदगी से ऊपर उठ गई/गए हैं।

अगर आप इसके लिए कड़वाहट पाल लेती/लेते हैं या यह कहते हुए हार मान लेती/लेते हैं कि मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है, मुझे ये चीजें बर्दाश्त करनी ही होंगी, तो परिवार के लोगों के साथ रहने की सारी पीड़ा और संघर्ष का कोई फल नहीं मिलेगा। लेकिन अगर आप ऐसा कहते हैं हां, ये लोग ऐसे ही हैं, मगर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे इन लोगों के साथ आनंदपूर्वक रहना है। तो आप पूरी चेतनता के साथ अपनी नापसंद से परे चली/चले जाएंगे।

जब आप अपनी पसंद और नापसंद से ऊपर उठ जाते हैं, तो अनजाने में आप चेतन हो जाते हैं। अनजाने में, आप आध्यात्मिक हो जाते हैं, जो आध्यात्मिक होने का सबसे अच्छा तरीका है। आप यह नहीं कहते कि मैं आध्यात्मिक मार्ग पर चलने जा रहा हूं बल्कि एक जीवन के रूप में आप इतने चेतन हो जाते हैं कि अपनी सीमाओं, अपनी पसंद-नापसंद से ऊपर उठ जाते हैं और ‘आध्यात्मिक’ शब्द से जुडे बिना आध्यात्मिक हो जाते हैं।

(आप हमें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, लिंक्डिन और यूट्यूब  पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।)

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