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प्रेरणा / कठिन चुनौतियों के बीच, ऐसे रखें ‘मन को शांत’

प्रतीकात्मक चित्र।

  • संकलन : अमित कुमार सेन।

हम एक ऐसी दुनिया, या कहें एक ऐसे क्षण में रह रहे हैं जहां ज्ञान, करुणा, आशावाद, लचीलापन, साहस और स्पष्ट नज़रिए की बेहद जरूरत है। हमें इन गुणों को अपने अंदर जागृत करने की जरूरत है। यह हम तभी कर सकते हैं, जब हम स्वयं जागरुक हों और हमें जागरुक होना ही होगा क्योंकि यही इस दौर में जीने का तरीका है।

यह आलेख प्रश्नोत्तर पर आधारित है जिसमें प्रश्नकर्ता पिको अय्यर, दलाई लामा से जिज्ञासाओं का समाधान पूछ रहे हैं जिनका पूरा नाम सिद्धार्थ पिको राघवन अय्यर है, वह एक ब्रिटिश मूल के निबंधकार और उपन्यासकार हैं जो अपनी यात्रा लेखन के लिए जाने जाते हैं। वह ‘काठमांडू, द लेडी एंड द मॉन्क’ और ‘द ग्लोबल सोल इन वीडियो नाइट’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं।

पिको अय्यर : ‘उम्मीद’ का क्या अर्थ है?

दलाई लामा : हमारा जीवन चीजों को अच्छी तरह से बदलने की इच्छा से संबंधित है जो उम्मीदों पर आधारित है। गर्भ में भी मां की मन की शांति शिशु को प्रभावित करती है। उम्मीद का संबंध भविष्य से है। हालांकि, भविष्य के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है, फिर भी हम आशान्वित रहते हैं जो निराशावादी होने से कहीं बेहतर है। वैश्विक स्तर पर भी हमारे पास उम्मीदों के लिए आधार हैं।

हम सभी अपनी मां से ही जन्म लेते हैं। हम उसकी देखरेख में बढ़ते हैं। उनकी करुणा और दया की सराहना करना, जिसके बिना हम जीवित नहीं रह सकते थे, एक आधार है जिसमें करुणा को देखा जा सकता है। मां की कृपा का अनुभव हमें उम्मीद बंधाता है। जिन बच्चों की मां बचपन में गुजर जाती हैं, अगर हम उन बच्चों के बारे में जानने समझने की कोशिश करें तो कुछ भावनात्मक चीजें सीखने को मिलेंगी।

हमारा जीवन उम्मीदों पर टिका है। यदि आप उम्मीदों के सहारे हैं, तो आप अपने सामने आने वाली हर समस्याओं को दूर करने में सक्षम होंगे। लेकिन अगर आप उम्मीदों से रहित हैं, तो आपकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी। उम्मीद करुणा और प्रेमपूर्ण दया से जुड़ी हुई है। मैंने (दलाई लामा) अपने जीवन में हर तरह की मुश्किलों का सामना किया है, लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। इसके अलावा, सच्चा और ईमानदार होना भी उम्मीद और आत्मविश्वास का आधार है। सच्चा और ईमानदार होना झूठी उम्मीदों का प्रतिकार है। सच्चाई और ईमानदारी पर आधारित आशा मजबूत और शक्तिशाली होती है।

पिको अय्यर : क्या हम अपनी उम्मीदों के बारे में अधिक यथार्थवादी होने के लिए खुद को प्रशिक्षित कर सकते हैं?

दलाई लामा : हमारा मस्तिष्क, हमारी बुद्धि, हमें केवल हमारी तात्कालिक जरूरतों के बारे में न सोचकर, दीर्घकालिक हितों के बारे में सोचने के लिए सक्षम बनाती है। हम एक व्यापक दृष्टिकोण अपना सकते हैं और विचार कर सकते हैं कि हमारे दीर्घकालिक हित क्या है। उदाहरण के लिए, बौद्ध साधना के संदर्भ में हम यु्गों- युगों के बारे में बात करते हैं और सभी भव्य प्राणियों की सेवा करते हैं, जो हमारे आत्मविश्वास को मजबूत करता है। यह अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग हो सकता है।

पिको अय्यर : क्या उम्मीद का संबंध धर्म से नहीं है?

दलाई लामा : आम तौर पर, धर्म आस्था का सवाल है, लेकिन जब हम अपनी मां के स्नेह में डूब जाते हैं, तो इसमें कोई आस्था का सवाल नहीं होता है। आस्था एक ऐसी चीज है जिसे इंसानों ने बनाया है। सभी प्रमुख धार्मिक परंपराएं दया और प्रेम के महत्व को सिखाती हैं। कुछ कहते हैं कि एक ईश्वर है, दूसरे इसे नकारते हैं। कुछ कहते हैं कि हम एक जन्म के बाद दूसरा जन्म लेते रहते हैं, लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि हम केवल एक ही जन्म तक रहते हैं। ये परंपराएं विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करती हैं, लेकिन वे प्रेमपूर्ण दयालुता का संदेश देने में एक समान हैं।

ईसाई धर्म जैसे आस्तिक परंपराएं सिखाती हैं कि हम सभी ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं, जो एक पिता की तरह अनंत प्रेम का प्रतीक हैं। यह एक प्रभावी विचार है जो हमें दयालु होने के महत्व को पहचानने में मदद कर सकता है।

हम सामाजिक प्राणी हैं, अपने समुदाय पर आश्रित हैं। एक समुदाय के सदस्य के रूप में यहां तक ​​कि बिना आस्था या विश्वास वाले लोग भी विचारशील, सच्चे और ईमानदार होकर अपने मन की शांति बनाए रख सकते हैं। ईमानदार और करुणामय होना जरूरी नहीं कि धार्मिक गुण हों, लेकिन वे हमें सुखी जीवन जीने में योगदान करते हैं। अपने समुदाय के बारे में चिंतित होना हमारे अपने अस्तित्व को स्वीकार करना है। प्रमुख कारक करुणा है। क्रोध इसके विपरीत है। क्रोध सुख और सद्भाव को नष्ट कर देता है।’

हमें मानवता में एकता की भावना को विकसित करने की जरूरत है। हम सात अरब मनुष्य अनिवार्य रूप से एक जैसे हैं। हमारे बीच राष्ट्रीयता, रंग, आस्था और सामाजिक स्थिति में अंतर तो है, लेकिन केवल उन पर ध्यान केंद्रित करना अपने लिए समस्याएं पैदा करना है।

चित्र : दलाई लामा, पिको अय्यर से वर्चुअल संवाद करते हुए।

कल्पना कीजिए कि आप किसी आपदा से बच गए हैं और अपने आप को बिल्कुल अकेला पाते हैं। यदि आप किसी को दूर से आते हुए देखते हैं, तो आपको उनकी राष्ट्रीयता, जाति या धर्म की परवाह नहीं होगी, आपको किसी अन्य इंसान से मिलकर खुशी होगी। कठिन परिस्थितियां हमें मानवता की एकता को पहचानने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

अतीत में बहुत सारे युद्ध और हिंसा हुई हैं। आजकल जब जलवायु संकट के कारण गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है तो हमें एक-दूसरे की मदद करनी पड़ती है। जब तक हम रह सकते हैं, हमें खुशी-खुशी एक साथ रहने का प्रयास करना होगा।

पिको अय्यर: जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौती का सामना करने में हम आशान्वित कैसे रह सकते हैं?

दलाई लामा : ग्लोबल वार्मिंग या कहें जलवायु परिवर्तन मनुष्यों के बीच विवाद न करने का एक अच्छा कारण है। हमें साथ रहना सीखना चाहिए। हम सभी इंसान हैं और हम सभी इस एक ग्रह पर रह रहे हैं। हम केवल ‘मेरा देश’, ‘मेरा समुदाय’ की सोच रखकर पुराने रुख पर टिके नहीं रह सकते हैं, हमें पूरी मानवता का ध्यान रखना होगा।

पिको अय्यर: क्या आपको कभी उम्मीद खोने की चिंता या अहसास हुआ है?

दलाई लामा : केवल 17 मार्च 1959 को जब मैं ल्हासा छोड़ रहा था। मैं वास्तव में सोच रहा था कि क्या मैं अगला दिन देखने के लिए जीवित रहूंगा। फिर, अगली सुबह सूरज उग आया और मैंने सोचा, ‘मैं बच गया’। चीनी जनरलों में से एक को यह पता लगाने के लिए कहा गया था कि दलाई लामा नोरबुलिंगका में कहां रुके हुए हैं, ताकि वे उस गोलाबारी से बच सकें। मुझे नहीं पता कि वह वास्तव में मेरी रक्षा करना चाहता था या मुझे निशाना बनाना चाहता था। उस अवसर पर मुझे कुछ घबराहट महसूस हुई।

अगले दिन, जब हम चे-ला दर्रे पर पहुँचे, तो मेरे घोड़े के रखवाले ने मुझे बताया कि यह आखिरी जगह है, जहां से हम पोटाला पैलेस और ल्हासा शहर को देख सकते हैं। उसने मेरा घोड़ा घुमाया ताकि मैं आखिरी बार देख सकूं।

आखिरकार हम भारत पहुंचे, जो हमारे सभी ज्ञान का स्रोत है और जहां सीखने के लिए नालंदा विचारधारा है। मैं बचपन से ही तर्क और कारण के अनुप्रयोग के साथ अनुसंधान की इस परंपरा में डूबा हुआ था। तर्क में निहित आस्था मजबूत है। अन्यथा यह नाजुक है।

आज, वैज्ञानिक हमारे विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के कायल हो रहे हैं, जो हमारी चर्चाओं के लिए आधार प्रदान करता है। इसके अलावा, हम विश्लेषण के परिणामस्वरूप मन को एकाग्र और शांत करने के लिए समता और विपश्यना की साधना करते हैं। इन गुणों के अलावा हम अहिंसा और करुणा को तर्क के आधार पर विकसित करते हैं।

पिको अय्यर: कोविड महामारी के समय में हम मृत्यु और नुकसान से कैसे सामना कर सकते हैं?

दलाई लामा : मैं वास्तव में उन सभी डॉक्टरों और नर्सों के प्रयासों की सराहना करता हूं जिन्होंने बीमार लोगों की मदद की है और कर रहे हैं। एक बौद्ध के रूप में, मैं इस शरीर को इस रूप में देखता हूं जो हमें बीमार कर सकता है। लेकिन मन की शांति बनाए रखने से अलग बात हो जाती है। चिंता बस चीजों को और खराब करती है। यदि आपका मन शांत है और आप स्वीकार कर सकते हैं कि हम अपने कर्मों के परिणामस्वरूप बीमार पड़ते हैं, तो यह आपकी मदद कर सकता है।

पिको अय्यर : युवाओं पर आप अधिक विश्वास करते हैं। क्या वे आपकी उम्मीदों का आधार हैं?

दलाई लामा : बुजुर्ग लोग, लकीर के फकीर होते हैं, वो वही करते हैं जो भी परंपराएं चली आ रही होती हैं। युवा उनसे अधिक खुले विचार के होते हैं, मन में अधिक रुचि रखते हैं। आधुनिक शिक्षा की उत्पत्ति पश्चिम में हुई है, युव आधुनिक शिक्षा को आगे ले जाते हैं, लेकिन प्राचीन भारत ने मन और भावनाओं के कामकाज की व्यापक समझ विकसित की है। प्राचीन भारत ने पचास से अधिक प्रकार की भावनाओं को रेखांकित किया। भारत आज आधुनिक शिक्षा की भौतिकवादी सोच को, विनाशकारी भावनाओं को सुलझाने की समझ विकसित कर सकता है, यह युवा कर सकते हैं। जो प्राचीन भारतीय शिक्षा और आधुनिक शिक्षा के तालमेल से समझदारी पूर्ण निर्णय ले सकते हैं।

पिको अय्यर : मन की शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है?

दलाई लामा : भारत में आधुनिक शिक्षा की शुरुआत अंग्रेजों ने की थी। लेकिन मेरा मानना ​​​​है कि इसे मन के कामकाज की प्राचीन भारतीय समझ और मानसिक शांति प्राप्त करने के धर्मनिरपेक्ष तरीकों के साथ उपयोगी रूप से जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा, इसे विनाशकारी भावनाओं से निपटने के तरीकों के साथ जोड़ा जा सकता है। जब महामारी खत्म हो जाएगी, मैं भारतीय शिक्षकों के साथ चर्चा करने के लिए उत्सुक हूं कि यह कैसे किया जा सकता है। इस पर हम सभी एक साथ संवाद कर सकते हैं।

पिको अय्यर : आप 86 साल पहले पैदा हुए थे, क्या दुनिया तब से बेहतर हुई है?

दलाई लामा : लोग अपने ही किए कार्यों या चीजों को गंभीरता से नहीं लेते हैं। वर्तमान की कोरोना महामारी और ग्लोबल वार्मिंग जैसी घटनाओं द्वारा पेश की जा रही चुनौतियां हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि हम उनसे कैसे निपट सकते हैं। कठिनाइयां हमारा दिमाग खोल सकती हैं और हमारी बुद्धि को उनसे निपटने में लगा सकती हैं। भारतीय बौद्ध आचार्य शांतिदेव ने हमें बताया है कि हम अपनी समस्याओं का परीक्षण करके देखें कि क्या उनका समाधान किया जा सकता है। अगर किया जा सकता है तो हमें यही करना होगा। चिंता करने से मदद नहीं मिलेगी। चुनौतियां हमें जगा सकती हैं।

पिको अय्यर : आज दुनिया में गुस्सा और हिंसा बढ़ रही है। क्या आप इससे सहमत हैं या आप फिर भी आशान्वित हैं?

दलाई लामा : पिछली सदी में इतना खून-खराबा हुआ था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, पूर्व दुश्मनों एडेनॉयर और डी गॉल ने यूरोपीय संघ की स्थापना की। तब से इसके सदस्य देशों के बीच कोई लड़ाई नहीं हुई है। पूरी दुनिया को मानवता की भलाई के लिए चिंता का ऐसा ही रवैया अपनाना चाहिए। संघर्ष और कठिन परिस्थितियां हमें सोचने के पुराने तरीकों की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं, लेकिन हमें एक नया और अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

मुझे लगता है कि अगर मैं ल्हासा में रहता, तो मैं जितना सोचता हूं उससे कहीं संकीर्ण दिमाग से सोचता। शरणार्थी के रूप में भारत आने से मेरा दिमाग खुला और विस्तृत हुआ है और इस परिस्थिति ने मुझे अपनी बुद्धि का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया है।

पिको अय्यर: हम तिब्बत की मदद कैसे कर सकते हैं और तिब्बती संस्कृति की रक्षा कैसे कर सकते हैं?

दलाई लामा : साल 2001 से मैं राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो गया हूं। लेकिन मैं अभी भी तिब्बती संस्कृति को संरक्षित करने की जिम्मेदारी महसूस करता हूं। आठवीं शताब्दी में तिब्बती सम्राट ने शांतरक्षित को आमंत्रित किया, जो एक महान दार्शनिक और उसी रूप में महान तर्कशास्त्री थे। उन्होंने नालंदा परंपरा की शुरुआत की, जिसमें वैज्ञानिक सोच के साथ बहुत कुछ है। यह एक तार्किक, खोजी दृष्टिकोण अपनाने पर आधारित है।

उस समय तिब्बत में चीनी बौद्ध शिक्षक थे, जिन्होंने जोर देकर कहा कि ध्यान का अभ्यास अध्ययन से अधिक महत्वपूर्ण था। शांतरक्षित के शिष्य कमलशील ने सम्राट के समक्ष चीनी और भारतीय दृष्टिकोण के गुणों को लेकर शास्त्रार्थ किया। भारतीय परंपरा की जीत हुई हुई और चीनी शिक्षकों को चीन लौट जाने के लिए कह दिया गया। तब से हमने तर्क को अपनाया है। कारण, तर्क और ज्ञानमीमांसा पर प्रमुख भारतीय ग्रंथों का तिब्बती में अनुवाद किया गया। यही नालंदा परंपरा की नींव है, जिसे हमने जीवित रखा है।

आजकल तिब्बत के सुदूर भागों में चीनी कम्युनिस्ट द्वारा इसका विरोध करने के प्रयासों के बावजूद इन परंपराओं का अध्ययन जारी है। भारत में हमने अपने प्रमुख शिक्षा केंद्रों को फिर से स्थापित किया है और 10,000 से अधिक मठवासी कठोर अध्ययन में लगे हुए हैं।

पिको अय्यर: क्या आप भावनात्मक स्वच्छता की व्याख्या कर सकते हैं?

दलाई लामा : मन की शांति को विध्वंसक करने का कारण क्रोध है। लेकिन उस क्रोध का मुकाबला दूसरों के लिए परोपकारिता और करुणा विकसित करके किया जा सकता है। एक और मानसिक पीड़ा है वो है अज्ञानता है जो हमारे लिए समस्याएं खड़ी करती है। इसे अध्ययन से कम किया जा सकता है। एक महान तिब्बती विद्वान ने एक बार टिप्पणी की थी कि भले ही मुझे कल मरना हो, फिर भी मैं आज भी अध्ययन ही करूंगा।

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