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प्राकृतिक खेती / ये है आंध्रप्रदेश का ‘जीरो बजट खेती’ करने का तरीका!

मानसून में धान के खेत। प्राकृतिक खेती से खेतों में अच्छे कीट की संख्या भी बढ़ती है जो कि खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं। तस्वीर– अभिजीत कर गुप्ता/फ्लिकर

– मयंक अग्रवाल।

  • जीरो बजट रासायनिक खाद और कीटनाशक रहित खेती को बढ़ावा देने के लिए आंध्रप्रदेश सरकार प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित कर रही है। इस खेती को जीरो बजट यानी लागत रहित बनाने की योजना भी है।
  • फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाईजेशन जैसी संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं आंध्रप्रदेश के अलावा हिमाचल जैसे देश के दूसरे राज्य में भी प्राकृतिक खेती में मदद की पेशकश कर रही हैं।
  • भारत में कृषि की मौजूद व्यवस्था में कीटनाशक और गैरकानूनी दवाइयों का खासा दखल है, जिसको लेकर खाने की शुद्धता पर चिंता जताई जा रही है। प्राकृतिक तरीके से खेती की मांग देश में उठने लगी है।

भारत की खेती व्यवस्था में कीटनाशकों का प्रयोग काफी हो चला है। देश में उन कीटनाशकों का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है जो अन्य देशों में प्रतिबंधित हैं। खेतों में कीटनाशक के बेतहासा इस्तेमाल से हमारे खाने-पीने की चीजें भी अनेक हानिकारक रासायनों से प्रभावित हो गई हैं। इन समस्याओं का समाधान है सिर्फ प्राकृतिक खेती। 

आंध्रप्रदेश सरकार ने इस स्थिति से निपटने का यही रास्ता चुना है। इसके लिए जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (जेबीएनएफ) यानी बिना लागत के प्राकृतिक खेती के तरीके को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। सरकार की योजना है कि इस रसायन-रहित कृषि को वर्ष 2024 तक पूरे राज्य में फैलाया जाए। आंध्रप्रदेश में चल रही कोशिशों से प्रेरणा लेकर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्य भी इस तरह की योजना लेकर आ रहे हैं। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण और कुछ और संस्थाओं ने इस अभियान को समर्थन देने की मंशा जाहिर की है।

जेबीएनएफ के तहत बिना किसी रासायनिक के प्राकृतिक तरीके से खेती की जाती है और इस खेती में कोई भी सामान बाजार से नहीं खरीदा जाता है। इसलिए इसे जीरो बजट या बिना लागत की खेती कहते हैं।

भारत के पूर्व कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने संसद में एक सवाल के जवाब में कहा था कि जीरो-बजट खेती का मुख्य उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों से खेती को मुक्त करना है और खेती के काम में कीटनाशक के उपयोग पर नियंत्रण करना है। खेती के अच्छे तरीकों को वापस चलन में लाना इस कार्यक्रम का उद्देश्य है। पूर्व कृषि मंत्री का कहना है कि इस प्रयास से अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी और पर्यावरण के लिहाज से अच्छा और हानिकारक रसायन रहित खाना देश में उपज सकेगा।

उनके अनुसार मिट्टी की गुणवत्ता को वापस सही स्तर पर लाना भी कार्यक्रम के उद्देश्यों में से एक है। मिट्टी में जैविक पदार्थों की कमी और इसकी उर्वरा शक्ति का ह्रास रासायनिक खादों के इस्तेमाल से हुआ है, जिसे प्राकृतिक तरीकों से ही ठीक किया जा सकता है।

कर्नाटक में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाले कर्नाटक राज्य राइठा संघ से जुड़े विशेषज्ञ सुभाष पालेकर का कहना है कि राज्य में प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। आंध्रप्रदेश की योजना है कि 2024 तक भारत का पहला प्राकृतिक खेती वाला राज्य बनाया जाए और इस मुहीम से 60 लाख किसानों को जोड़ा जाए।

दायरा बढ़ाने के लिए निवेश की जरूरत

अनुमान है कि आंध्रप्रदेश सरकार को 2024 तक पूरे राज्य में प्राकृतिक खेती के प्रसार के लिए अगले कुछ वर्षों में 15,000 करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी। इस कार्यक्रम को राज्य में वर्ष 2018 के जून में शुरू किया गया था।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के कार्यकारी निदेशक एरिक सोल्हेम ने उद्घाटन कार्यक्रम में कहा था कि इस तरह की कोशिश जैव विविधता को बचाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की तरफ एक बड़ा कदम है। हमें उम्मीद है कि जीरो बजट खेती के जरिए दुनिया के दूसरे हिस्सों के किसानों को भी बेहतर जीवन सुलभ कराया जा सकता है।

अजीम प्रेमजी फिलन्थ्रापिक इनिसिएटीव  नामक संस्था ने इस योजना के लिए 100 करोड़ रुपए की राशि का सहयोग दिया है। नीति आयोग और अंतरराष्ट्रीय बैंकों का समूह बीएनपी परिबास ने भी इसमें रुचि ली है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन ने आंध्रप्रदेश सरकार को 1,50,000 डॉलर के सहयोग की पेशकश की है।

प्रदेश के विशेष मुख्य सचिव कृषि बी राजशेखर ने कहा कि सरकार ने वर्ष 2014 में ही इस विचार पर काम करना शुरू कर दिया था। कीट-नाशक मुक्त खेती से छोटे और सीमांत किसानों को सबसे अधिक लाभ होगा।

उनका कहना है कि देश में 1.6 लाख किसानों ने प्राकृतिक खेती शुरू कर दी है। इसे पहले पांच लाख और फिर 2024 तक 60 लाख किसानों तक पहुंचाया जाएगा। इस योजना में पैसों की व्यवस्था करने में सस्टेनेबल इंडिया फायनेंस फैसिलिटी नामक संस्था भी सहयोग कर रही है।

आंध्रप्रदेश पर  देश की नजर

आंध्रप्रदेश के प्रयास को देखकर नीति आयोग ने भी प्राकृतिक खेती में रुचि लेना शुरू किया है। कर्नाटक ने भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की घोषणा कर दी है और 50 करोड़ रुपए की राशि भी आवंटित करने की घोषणा कर दी। वर्ष 2018 में ही हिमाचल प्रदेश की सरकार ने इस तरफ कदम बढ़ाया था।

जानकार मानते हैं कि सरकारों के द्वारा किया जा रहा प्रयास इस समय की जरूरत है। इस समय किसान खेती पर अधिक लागत लगाने की हालत में नहीं हैं, ऐसे में बिना लागत से प्राकृतिक खेती उन्हें रास आएगी। इसके अलावा, कीटनाशक के प्रयोग से अनाज भी प्रदूषित होता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने देश में उपयोग होने वाले 85 तरह के कीटनाशकों के प्रयोग पर प्रतिबंध भी लगाया है।

एलायन्स फॉर सस्टैनबल एण्ड होलिस्टिक ऐग्रिकल्चर (आशा) की कविता कुरुगंती कहती हैं कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना और कीटनाशकों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करना- दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। अब समय आ गया है कि ऐसी कोशिशें तेज की जाएं। किसानों में प्राकृतिक खेती की समझ बनाना भी जरूरी है। एक किसान को देखकर दूसरे किसान जैविक खेती की तरफ रुख करेंगे।

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