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दिनचर्या / क्या ‘खुश रहने, इसी पल में जीने’ से समस्याएं खत्म होंगी?

  • सद्गुरु जग्गी वासुदेव।

आजकल जो बात बहुत सिखाई जाती है, वो है, ‘चिंता मत करो। खुश रहो। हर चीज़ बढ़िया है। बस मजे करो’! इस तरह की खुशी जरूर ही खत्म हो जाएगी और लोगों को मानसिक बीमारियां हो जाएंगी। पश्चिम में, मैं जो एक खास तौर से लोकप्रिय बात सुनता हूं, और जो अब भारत में भी तेजी से बढ़ रही है, वो है, ‘खुश रहो, इसी पल में जियो’।

क्या आप मुझे कहीं और जी कर बता सकते हैं? कुछ भी हो, आप इसी पल में हैं। आप और कहां हो सकते हैं? सभी लोग ये बात करते हैं क्योंकि इस विषय पर ऐसे लोगों के द्वारा बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं और बहुत सारे कार्यक्रम किए गए हैं जिन्हें इस बारे में न कोई अनुभव है न समझ।

अगर आप उन लोगों को देखें जो हमेशा ‘खुश रहिए’ कहते रहते हैं, तो उनकी जीवन शैली के आधार पर, वे कुछ ही सालों में हताश, डिप्रेस्ड हो जाते हैं। निश्चित रूप से ये आपको बहुत गहराई तक चोट पहुंचाएगा क्योंकि आपकी उर्जाएं आपके कर्म बंधनों की संरचना के अनुसार अलग-अलग संभावनाओं के लिए बंटी हुई रहती हैं। आपके दर्द, दुख, आनंद, प्यार वगैरह सब के लिये कुछ न कुछ है। इसे ‘प्रारब्ध कर्म’ कहते हैं।

ये सिर्फ आपके मन में ही नहीं है। कर्म डेटा की तरह है। आपकी ऊर्जा इस डेटा के अनुसार काम कर रही है। प्रारब्ध एक कुंडली बनी हुई स्प्रिंग की तरह है। इसको अपनी अभिव्यक्ति पानी ही है। अगर ये चीजें अभिव्यक्त नहीं होतीं, अगर आप इन्हें दबाते हैं तो वे बिल्कुल अलग रूप में जड़ पकड़ लेंगी।

ये बहुत ही महत्वपूर्ण है कि आप किसी चीज़ को वैसे ही देखें जैसी वो है। आप किसी चीज़ से इंकार न करें। अगर दुख आता है तो दुख। उदासी आती है तो उदासी। आनंद आता है तो आनंद। उल्लास होता है तो उल्लास। जब आप ये करते हैं, तो आप किसी चीज़ से इंकार नहीं कर रहे या किसी चीज़ को रोकने की कोशिश नहीं कर रहे। ऐसे में हर चीज़ हो रही है, पर आप उससे मुक्त हैं।

मन का स्वभाव ऐसा ही है कि अगर आप कहते हैं, ‘मैं ये नहीं चाहता’, तो आपके मन में सिर्फ वही बात होगी। जब आप कहते हैं, ‘मैं कोई नकारात्मक चीज़ नहीं चाहता’, तो सिर्फ वही बात होगी। आप सकारात्मक या नकारात्मक के बारे में बोल ही क्यों रहे हैं? आप चीजों को इस तरह से क्यों देखना चाहते हैं?

आप हर परिस्थिति को वैसे क्यों नहीं देखते जैसी वो है? उसे वैसे ही क्यों नहीं स्वीकारते जैसी वो है? और, उस परिस्थिति में जो सबसे अच्छा है, वो क्यों नहीं करते? कोई परिस्थिति सकारात्मक या नकारात्मक नहीं होती। किसी तरह के रवैये या किसी खास दार्शनिकता को बढ़ाने की कोशिश न करें। आप यहाँ बिना किसी खास रवैये के, बिना किसी खास दार्शनिकता के, सिर्फ जागरूक हो कर क्यों नहीं रह सकते? केवल जागरूक हो कर।

हर परिस्थिति को एक अलग प्रकार से संभालने की ज़रूरत होती है। अगर आप बस सकारात्मक सोच का रवैया अपनाते हैं तो ये एक प्रकार की परिस्थिति में अच्छा काम कर सकता है पर किसी दूसरी तरह की परिस्थिति में आप कुछ बेवकूफी ही करेंगे क्योंकि आपके विचार किसी पूर्वग्रह के असर में हैं कि आपको बस एक खास तरह से होना चाहिए।

आप अगर गलत जगहों पर सकारात्मक सोच अपनाते रहेंगे तो आपके साथ और भी खराब हो सकता है। सकारात्मक होने की कोई ज़रूरत नहीं है और नकारात्मक होने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। बस जागरूक रहें। अगर आप जागरूक हैं तो आप किसी परिस्थिति को वैसे ही समझेंगे, जैसी वो है। जब आप किसी परिस्थिति को वैसे ही समझेंगे जैसी वो है तो आप अपनी बुद्धि और योग्यता के सबसे अच्छे स्तर पर काम करेंगे। ये ऐसी ही सीधी, सरल बात है।

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