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भावनाएं / अहंकार का अर्थ ‘ईगो’ नहीं, यह आपकी पहचान है

अहंकार ईगो नहीं, स्वयं धारण की हुई पहचान है। मन के दूसरे आयाम को अहंकार कहा जाता है। इसका अर्थ उस पहचान से है, जो आपने धारण कर रखी है। आमतौर पर अंग्रेजी भाषा में लोग अहंकार को ‘ईगो’ समझ लेते हैं। यह ईगो नहीं है, यह आपकी पहचान है।

दरअसल, आपकी बुद्धि हमेशा आपकी पहचान की गुलाम होती है। आप जिस चीज के साथ भी अपनी पहचान बना लेते हैं, यह उसी के इर्द-गिर्द काम करती है। लोग अपनी पहचान ऐसी चीजों के साथ स्थापित करते हैं, जिन्हें उन्होंने कभी देखा भी नहीं है, और उनके भाव इन्हीं चीज़ों से जुड़ जाते हैं। यही चीजें उनके जीवन की दिशा तय करती हैं।

उदाहरण के लिए हम सभी किसी न किसी देश से जुड़े हैं। सौ साल पहले एक ऐसा वक्त भी था, जब बहुत सारे लोग ऐसे थे जो किसी भी देश से ताल्लुक नहीं रखते थे, लेकिन आज हर किसी का एक देश है। बस डेढ़-दो सौ साल से ही राष्ट्रीयता का इतना जबर्दस्त भाव हमारे यहां आया है। हमने अपनी नस्लीय, जातीय और दूसरी तरह की पहचानों को राष्ट्रीय पहचान की ओर जाने दिया है।

जैसे ही आपके मन में आता है कि मैं इस देश का हूं तो उस देश का झंडा, राष्ट्रीय चिह्न, राष्ट्र गान आपके भीतर एक भाव जगाते हैं। इसमें कोई दिखावा नहीं होता, यह सब वास्तविक होता है। यह वास्तविक है, क्योंकि लोग इसके लिए जान देने को भी तैयार हैं, लेकिन ये सब बस एक पहचान ही तो है। आप इसे कभी भी बदल सकते हैं। आप किसी दूसरे देश में जाकर बस सकते हैं और फिर वह आपका बन सकता है। जिस पल आप अपनी पहचान किसी चीज के साथ स्थापित कर लेते हैं, आपकी बुद्धि पूरी तरह से और हमेशा इस पहचान की रक्षा करती है और इसी के इर्द-गिर्द काम करती है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं कि अहंकार को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक पहचान आपकी बुद्धि से आती है और एक आपकी भावनाओं से जुड़ी होती है ये दो तरह की पहचान होती है। आपकी पहचान जिन भी चीजों के साथ है, उनमें से कुछ बौद्धिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, कुछ भावनात्मक रूप से।

तो क्या आपकी दुनिया खत्म हो गई

अगर आपने बौद्धिक रूप से किसी चीज के साथ पहचान स्थापित की हुई है, तो आप अपने चारों ओर मुश्किलों का एक भयंकर जाल महसूस करेंगे और उसमें फंसे रहेंगे। अगर आपने भावनाओं के आधार पर पहचान स्थापित की हुई है तो आपकी पहचान एक मकसद का, एक जुड़ाव का अनुभव कराएगी, लेकिन जैसे ही आपकी भावनात्मक पहचान के साथ समस्या आ जाती है आपका मरने का मन करने लगता है।

हमेशा ऐसा ही होता है, क्योंकि आपको लगने लगता है कि अब दुनिया में कुछ नहीं बचा। हो सकता है, कुछ समय बाद आप इस भाव से उबर जाएं, लेकिन उस पल तो आपको यही महसूस होगा कि आपकी दुनिया खत्म हो गई। तर्क सीधी रेखा में होते हैं। इसलिए इनसे जाल बनाने के लिए आपको कई-कई रेखाएं बनानी होंगी, जिसमें आप फंस सकें, लेकिन भाव आपस में ऐसे उलझे होते हैं कि जब भी उन्हें खतरा महसूस होता है, तो ऐसा लगता है जैसे यह दुनिया का अंत है।

ढीले कपड़े की तरह होनी चाहिए पहचान

अगर आप किसी चीज के साथ भावनात्मक रूप से पहचान बनाते हैं तो या तो यह आपको बना देती है या तोड़ देती है। यह आपको जबर्दस्त शक्ति देती है, लेकिन जरा सी भी गड़बड़ हुई और सब खत्म।तो पहचान ढीली ही रखनी चाहिए। जब हम किसी खास मकसद के लिए कुछ कर रहे हैं, तो हमें पहचान की जरूरत होती है। हम उसके साथ ऐसे चलते हैं जैसे हमारा जीवन उसी पर निर्भर है, लेकिन हमारे भीतर इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि हम इसे हटाकर एक तरफ रख सकें।

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योग में कहा जाता है, आपको अपनी पहचान एक ढीले कपड़े की तरह रखनी चाहिए। ताकि जब आप इसे उतारना चाहें, आप इसे आसानी से उतार सकें। अगर आप यह नहीं जानते कि अपनी पहचान को कैसे उतारें, तो धीरे-धीरे आपकी बुद्धि आपकी सुरक्षा के लिए काम करना शुरू कर देगी और आत्मरक्षा की दीवारें बनाने लगेगीं।

ये है अहंकार का बेहतर उपयोग

अगर आप अपनी रक्षा के लिए अपने आसपास एक दीवार बना लेते हैं, तो कुछ समय बाद यही दीवार आपको कैद कर लेती है। पहचान को जागरूकता के साथ धारण करना, उसका होकर न रह जाना, बल्कि उस पहचान के साथ खेलना, अगर कोई ऐसा करता है तो बुद्धि उसके खिलाफ काम नहीं करेगी। लेकिन आप तो अपनी पहचान में फंस गए हैं।

आप उसे लेकर नहीं चल रहे हैं, बल्कि वह आपको चला रही है, आप उसमें फंस गए हैं। एक बार अगर आप इसमें फंस गए तो आपकी बुद्धि आपके खिलाफ काम करना शुरू कर देगी। ऐसा लगता है जैसे हर चीज आपको परेशान कर रही है। जीवन में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि किसी ने बाहर से आपको कोई चीज चुभाई हो। बाहर से आपको शारीरिक रूप से कितना कष्ट पहुंचाया गया है? मुश्किल से एकाध बार या बिल्कुल भी नहीं। आप खुद ही अपने को दुखाते हैं, आपकी पहचान आपसे चिपक गई है।

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बुद्धि का सबसे अच्छा उपयोग तभी हो सकता है, जब आप अपनी पहचान को अपने से थोड़ा सा दूर रखकर धारण करें। जब तक आप चाहें इसके साथ खेलें और जब नहीं खेलना हो तो इसे दूर रख सकें। जब आपके पास इतनी आजादी होगी, तो आप देखेंगे कि आपकी बुद्धि आपके लिए परेशानी का कारण नहीं बनेगी।

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