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श्वेत क्रांति / धरती पर मौजूद है अमृत, लोग इधर-उधर भटक रहे हैं

हमारी परंपरा और देशज ज्ञान ने हमें गौ-सेवा को लेकर बहुत कुछ बताया है। यही कारण है कि गाय आज भी भारतीय लोकजीवन का सबसे आदरणीय प्राणी है। अथर्ववेद में कहा गया है। ‘धेनु: सदनम् रचीयाम्’ यानी ‘गाय संपत्तियों का भंडार है।

हम गाय को केंद्र में रखकर देखें, तो गांव की तस्वीर कुछ ऐसी बनती है कि गाय से जुड़ा है हमारा किसान, किसान से जुड़ी है खेती और खेती से जुड़ी है देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और भारत इसी ग्रामीण अर्थरचना की नींव पर खड़ा है, जिसकी प्रथम कड़ी गाय है। समग्रता में गाय हमारे आर्थिक जीवन की ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं सामाजिक जीवन की भी आधारशिला है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र को देखें, तो आप पाएंगे कि उस समय में गायों की समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए एक विशेष विभाग चलाया जाता था। भगवान श्रीकृष्ण के समय भी गायों की अधिक संख्या, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं ऐश्वर्य का प्रतीक मानी जाती थी। नंद, उपनंद, नंदराज, वृषभानु, वृषभानुवर आदि उपाधियां गोसंपत्ति के आधार पर ही दी जाती थीं। गर्ग संहिता के गोलोक खंड में ये लिखा गया है कि जिस गोपाल के पास पांच लाख गाय हों, उसे उपनंद और जिसके पास 9 लाख गायें हो उसे नंद कहते हैं। यानी ‘गाय’ द्वापर युग से ही हमारे अर्थतंत्र का मुख्य आधार रही है।

महाभारत में देखें तो युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न ‘अमृत किम्?’ यानी ‘अमृत क्या है?’ के उत्तर में कहा था कि ‘गवाऽमृतम्’ यानी ‘गाय का दूध’। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘देश की सुख-समृद्धि गाय के साथ ही जुड़ी हुई है।’ दुनिया में जो पशु सूर्य की किरण को सर्वाधिक आत्मा में ग्रहण करता है, वह है ‘गाय’ और यह दूध के माध्यम से हमें भरपूर सौर ऊर्जा देती है और यदि इस दूध को हम पीते हैं तो उससे हमारी बुद्धि तेज होगी और हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका धनात्मक प्रभाव जरूर पड़ेगा।

क्या आपने कभी सोचा कि आज पश्चिम के देश क्यों उन्नति कर रहे हैं? आप विदेशों में चले जाइये, आपको कहीं भैंस नहीं मिलेगी, सब जगह आपको गाय मिलेगी। पिछले दो दशक से पश्चिमी देशों में एक श्वेत क्रांति चल रही है। उस क्रांति का उद्देश्य है, अधिक से अधिक गाय पालो, गाय के दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करो। आज एक अमेरिकन व्यक्ति प्रतिदिन एक से दो लीटर गाय का दूध पीता है और मक्खन खाता है, जबकि भारतीय व्यक्ति को औसतन मात्र 200 ग्राम दूध भी मुश्किल से प्राप्त होता है।

एक रोचक किस्सा है कि जब पहली बार कोलंबस 1492 में अमेरिका गया, तब वहां एक भी गाय नहीं थी। सिर्फ जंगली भैसों का पालन होता था। लोग उसे दुहते नहीं थे, लेकिन मांस और चमड़े के लिये उसकी हत्या करते थे। कोलंबस जब दूसरी बार अमेरिका गया, तब अपने साथ 40 गायों को लेकर गया, जिससे दूध की जरुरत पूरी हो सके। सन् 1640 में ये 40 गायें बढ़कर 30,000 हो गयीं। 1840 तक ये गायें बढ़कर ड़ेढ करोड़ और सन् 1900 में 4 करोड़ हो गईं। 1930 में इनकी संख्या 6 करोड़ 40 लाख थी तथा मात्र पांच वर्ष पश्चात सन् 1935 में इनकी संख्या बढ़कर 7 करोड़ 18 लाख हो गई।

यह बहुत दिलचस्प है कि सन् 1985 में अमेरिका में 94 प्रतिशत लोगों के पास गायें थीं और हर किसान के पास दस से पंद्रह गायें होती थीं। इसी कारण आज अमेरिका में दूध की नदियां इस तरह बह रही हैं, जैसे कभी भारत में बहती थीं। विश्वविख्यात पशु विशेषज्ञ डॉ.राइट ने 1935 में कहा था कि ‘गोवंश से होने वाली वार्षिक आय 11 अरब रुपये से अधिक है।’ यह गणना 1935 के वस्तुओं के भावों के अनुसार लगाई गयी थी। आज सन् 1935 की उपेक्षा वस्तुओं के भाव कई गुना अधिक बढ़ गये हैं। संभव है कि गोवंश से होने वाली आय लगभग 100 अरब रुपये से अधिक है।

भारत में पूरे वर्ष में केवल साढ़े तीन माह ही वर्षा होती है और वह भी अनिश्चितता लिए हुए होती है। इस अनिश्चितता में किसान किसका सहारा ले? इसलिए प्रत्येक किसान को गो-पालन को पूरक व्यवसाय बनाना चाहिए, ताकि जब कभी प्रकृति माता उस पर क्रोधित होगी, तब उसे गौ-माता मदद करेगी। शायद इसीलिए महर्षि दयानंद सरस्वती ने कहा था कि गाय है तो हम हैं, गाय नहीं तो हम नहीं। गाय मरी तो बचेगा कौन? और गाय बची तो मरेगा कौन?

हमारे आज के राजनीतिक वातावरण में गाय दोराहे पर खड़ी है। जहां कुछ लोग उसे संरक्षण के योग्य मानते हैं, तो कुछ भक्षण की वस्तु मानते हैं। देहरादून में नवधान्य संस्था के कार्यालय में लटके एक पोस्टर में गौ-पशुओं को चित्रित करते हुए लिखा गया था कि अगर भारत के सभी गौ-पशुओं को एक कतार में खड़ा कर दिया जाए, तो ये कतार चांद तक पहुंच जाएगी। गौ-पशुओं की 20 करोड़ से भी अधिक संख्या के साथ भारत दुनिया में प्रथम स्थान पर है और विश्व की गौपशुओं की कुल आबादी का 33.39 प्रतिशत उसके पास है। 22.64% के साथ ब्राज़ील और 10.03% के साथ चीन दुनिया के गौपशुओं की आबादी की दृष्टि से क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर है।

भारतीयो को गर्व की अनुभूति होनी चाहिए कि हम दुनिया में दूध के सबसे बड़े उत्पादक हैं। वर्ष 2017 में भारत का कुल दूध उत्पादन लगभग 155 मिलियन टन था, जो 2022 में बढ़कर 210 मिलियन टन होने की संभावना है। यह भारत की गायों की आबादी के कारण ही है कि हम पिछले 10 वर्षों से दुग्ध उत्पादन में 4% की वार्षिक वृद्धि कर रहे हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड को अगले कुछ वर्षों के दौरान 7.8% की वार्षिक वृद्धि की उम्मीद है।

तटस्थ मूल्यांकन करें तो पता चलता है कि श्वेत क्रांति, हरित क्रांति से अधिक टिकाऊ रही है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध उत्पादन भी 1991 के मात्र 178 ग्राम से बढ़कर 2015 में 337 ग्राम हो गया था और कुछ वर्षों में यह बढ़कर 500 ग्राम हो जाएगा। इस प्रकार, भारत की खाद्य सुरक्षा में पशुधन का, विशेष रूप से गौवंश का, बहुत बड़ा योगदान है, जो हमें गर्व से भर देता है। भारत में गाय की कोई 30 नस्लें अच्छी तरह से वर्णित हैं। प्रत्येक नस्ल में कई विशिष्ट गुण हैं, जैसे दूध देने की क्षमता एवं खेती कार्यों की क्षमता।

कुछ भारतीय नस्लें, जैसे साहीवाल, गिर, लाल सिंधी, थारपारकर और राठी दुधारू नस्लों में से हैं। कंकरेज, लाल कंधारी, मालवी, निमाड़ी, नगोरी, आदि बैलों की जानी मानी नस्लें हैं। हरियाणा राज्य की ‘हरियाणा बैल’ नस्ल दुनिया में सबसे मजबूत कद-काठी वाली नस्लों में से एक मानी जाती है। केरल में पाई जाने वाली वेंचुर नस्ल दुनिया की सबसे छोटी मवेशी नस्ल है। इसे एक मेज पर खड़ा करके दुहा जा सकता है, और वेंचुर गाय बहुत अच्छे और मूल्यवान बैल पैदा करती है।

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