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प्रकृति / कहीं खो न जाएं स्त्री के वो दिव्य गुण

प्रतीकात्मक चित्र।

चाहे पुरुष हों या स्त्री, हमारे जीवन में स्त्रैण या स्त्री प्रकृति के गुणों का होना जरूरी है। क्योंकि जहां पुरुष प्रकृति जीवन यापन से जुडी है, वहीं स्त्री प्रकृति के गुण संगीत, ध्यान, नृत्य, प्रेम जैसे जीवन के सुंदर पहलूओं से जुड़े हैं।

स्त्री और आर्य इन दोनों शब्दों का मूल ‘री’ यानी ऊर्जा है। स्त्री गुण यानी स्त्रैण को अभिव्यक्त करने के लिए मूल शब्द ‘री’ था। ‘री’ शब्द को अस्तित्व की जननी या देवी मां या मूल के रूप में जाना जाता था। वही ‘री’ शब्द बाद में आए ‘स्त्री’ शब्द का आधार है। ‘री’ का मतलब है, गति, संभावना या ऊर्जा। इसी शब्द से ‘आर्य’ शब्द की भी उत्पत्ति हुई।

‘आर्य’ का मतलब है एक सभ्यता, संस्कृति या प्रतीकात्मक रूप में यह व्यक्त करना कि जब पुरुष गुण प्रधान रहेगा तो वहां जीत के लिए संघर्ष होगा। सद्गुरु कहते हैं केवल जहां स्त्री गुण प्रधान होता है, वहीं सभ्यता होती है। स्त्रैण से मेरा मतलब स्त्री नहीं है। मैं यह कह रहा हूं कि प्रकृति का स्त्रैण गुण आपके लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपकी रोजी-रोटी का इंतजाम हो गया है, अब आप जीवन के दूसरे आयामों को पाना चाहते हैं। संगीत, ध्यान, नृत्य, कला, शिल्प, सुंदरता, प्रेम, ये सभी चीजें आपके लिए तभी महत्वपूर्ण होंगी, जब आपकी रोजी-रोटी की व्यवस्था हो जाए। यह एक स्त्रैण गुण है।

आज हमारे मूल्य स्त्री प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं हम स्त्रैण गुण को पूरी तरह नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे मूल्य कुछ ऐसे होते जा रहे हैं, हम ऐसी व्यवस्था विकसित करते जा रहे हैं जहां सिर्फ आर्थिक खुशहाली, आर्थिक कामयाबी ही मायने रखती है, बाकी कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है।

इस नजरिए को बदलना होगा। इसे पलटना बहुत मुश्किल है, क्योंकि आप एक बाजारवादी अर्थव्यवस्था में है और उसे पलटने का मतलब खुद को हराने जैसा है। इसके लिए बहुत सूक्ष्म कौशल की जरूरत है, हमारे पास एक पूरे समाज को उस तरह तैयार करने की कुशलता नहीं है। हम लोगों के छोटे समूहों में ऐसा कर सकते हैं।

आज हालात ये हैं कि महिलाएं खुद को पुरुषों की तरह तैयार करके चीजों को करने की कोशिश करती हैं, ‘हम इसे कर डालेंगे।’ यह एक स्त्री का तरीका नहीं है। स्त्री का तरीका ‘बस कर डालो’ वाला नहीं है, वह अपने तरीके से उसे करना चाहेगी। स्त्रैण प्रकृति इसीलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका संबंध किसी भी तरह कामयाबी पाने से नहीं, बल्कि एक खास तरीके से कामयाबी पाने से है जो हमारे जीवन को खूबसूरत बनाता है।

पुरुष का स्वभाव है किसी भी तरह मंजिल तक पहुंचना, जबकि स्त्री एक खास तरीके से ही वहां तक पहुंचना चाहती है। देखिए किस तरह हमारी शिल्पकला में बदलाव आया, हमारे कपड़ों में बदलाव आया। हम हर चीज को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत में सौभाग्य से अब भी चीजें मौजूद हैं। अगर आप पश्चिम में जाएं, तो आपको शायद ही कोई ऐसी महिला दिखेगी जिसने लहराने वाले कपड़े पहने हों। वे तीर की तरह होती हैं। वे ऐसा ही होना चाहती हैं, चुभने वाली, लहराने वाली नहीं, क्योंकि उनकी नजर में यह सब फालतू है, सारे झालर और लहराने-लटकने वाले कपड़े फालतू हैं, बस जितनी की जरूरत है, उतना ही होना चाहिए। क्योंकि यह उनकी उपयोगितावादी सोच है।

जब स्त्रैण गुण या स्त्री प्रकृति उपयोगिता के नजरिए से काम करने लगे, तो कुछ समय बाद सब कुछ बदसूरत हो जाता है। पुरुष प्रकृति से धर्म प्रबल होगा, पर स्त्री प्रकृति से अध्यात्म, आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए स्त्रियोचित गुण बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर हम किसी समाज में स्त्रैण गुणों को नष्ट करते हैं या उसे दबा कर रखते हैं, तो उस समाज की आध्यात्मिक संभावनाएं बहुत ही कम हो जाती हैं।

जब पुरुष प्रकृति प्रबल होगी, तो धर्म प्रबल होगा, लेकिन आध्यात्मिक प्रक्रिया तभी प्रबल हो सकती है, जब स्त्रैण प्रबल हो। आपको यूरोप का इतिहास पता है। वहां आध्यात्मिक प्रक्रिया बहुत व्यापक थी। वहां एक संगठित धर्म को स्थापित करने के लिए जान बूझकर बहुत सुनियोजित तरीके से आध्यात्मिक प्रक्रिया को उखाड़ कर फेंक दिया गया। जिन लाखों ‘डायनों’ को जलाया गया, वे बस ऐसी महिलाएं थीं जिनमें कुछ ऐसे गुण होते थे जो उस समाज के तर्कों पर खरे नहीं उतरते थे।

हमें ऐसी स्त्रियों की जरूरत है जो तर्कों से परे की क्षमता रखती हों। हमें ऐसे ही पुरुषों की भी जरूरत है। हमें ऐसे इंसानों की जरूरत है जो तर्क की भीषण सीमाओं से परे जीवन को देखने, समझने और अनुभव करने में समर्थ हों। तर्क जीवन-यापन के लिए अच्छा है, जीवन के भौतिक पहलुओं को चलाने के लिए अच्छा है। लेकिन अगर आप अपने जीवन को ही तर्क से चलाते हैं, तो आप ज्यादा जीवंत होने के बजाय लगातार निर्जीव होते चले जाएंगे। इसलिए भारत में हम नवरात्रि मनाते हैं जो स्त्रैण का उत्सव है, ये नौ दिन देवी के दिन होते हैं।

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