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जज्बा / Whatsapp पर लिखी किताब, कैदी को मिला 6.4 करोड़ का पुरस्कार

Pic Courtesy: Behrouz Boochani/theguardian

बेहरोज बूचानी वो शख्स हैं जो सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) के पापुआ न्यू गिनी के मानुस आईलैंड के डिटेनशन सेंटर में कैदी का जीवन बिता रहे हैं। वह यहां पिछले पिछले छह साल से हैं। बूचानी ने वॉट्सऐप पर ‘नो फ्रैंड बट द माउंटेन्स’ नाम से किताब लिखी है।

हालही में बूचानी को 6.4 करोड़ यानी 125000 ऑस्ट्रेलियन डॉलर का पुरस्कार मिला है। जिस समय समारोह में उसे पुरस्कार दिया जा रहा था, वह जेल में था। कुर्दिश-ईरानी शरणार्थी बेहरोज बूचानी उन लेखकों के इतिहास से जुड़ चुके हैं, जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब जेल में लिखीं। जूलियस फ्यूचिक ने नात्सी जल्लादों की कैद के बीच रहकर ‘फांसी के तख्ते से’ जैसी किताब लिखी थी।

जूलियस फ़्यूचिक ने नात्सी जेल में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर पेंसिल से अपनी किताब लिखी थी, जिन्हें फ़्यूचिक ने एक-एक करके प्राग की पैंक्रेट्स गेस्टापो जेल से एक हमदर्द चेक सन्तरी की मदद से छिपाकर बाहर भेजा था। फ़्यूचिक एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपने-आपको धोखा देने से घृणा करते थे और यह जानते थे कि इस रचना को पूरा करने के लिए वह जीवित न रहेंगे और यह कभी भी बीच में ही रुक जाएगी।

पुस्तक : ‘नो फ्रैंड बट द माउंटेन्स’

दरअसल, बेहरोज बूचानी मूलतः लेखक, फिल्म मेकर और पत्रकार है। उसकी इस किताब को हाल में विक्टोरियन प्राइज फॉर लिटरेचर अवॉर्ड 2019 के लिए चुना गया। साल 2012 में ईरान में कई लेखकों, पत्रकारों और फिल्मकारों को गिरफ्तार कर लिया गया था। उस दौरान बूचानी वहां से तो निकलने में कामयाब रहे लेकिन समुद्र के रास्ते ऑस्ट्रेलिया में घुसते समय ऑस्ट्रेलियन नेवी ने उनकी बोट को कब्जे में ले लिया। बाद में उन्हें 2013 में मानुस आईलैंड के डिटेनशन सेंटर भेज दिया गया। डिटेंशन सेंटर में रहते हुए भी पत्र-पत्रिकाओं में उनके लिखे लेख छपते रहे हैं।

उनकी पुस्तक ‘नो फ्रैंड बट द माउंटेन्स’ डिटेनशन सेंटर के उनके अनुभवों पर ही आधारित है। इसके लिए वे अपने मोबाइल पर फारसी में एक-एक चैप्टर पूरा करते और फिर इसे अपने अनुवादक दोस्त ओमिड टोफिगियान को भेज दिया करते। सेंटर के सुरक्षाकर्मी बैरक की तलाशी के दौरान कैदियों के सामान जब्त कर लेते हैं। लेकिन वो मोबाइल को बचाकर रखते थे।

मीडिया रिपोर्ट्स में जूरी ने बयान को प्रमुखता से लिया, जिसमें कहा गया कि, ‘ऑस्ट्रेलिया की कहानी के तौर पर स्वीकारा है।’ तो वहीं, बूचानी कहते हैं कि ‘उन्हे खुशी हो रही है, क्योंकि यह मेरे और मेरे जैसे शरणार्थियों के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह सिस्टम के खिलाफ बड़ी जीत है।’

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