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जुनून / मुमकिन है! हर लड़की ला सकती है अपने आस-पास बदलाव

चित्र: पर्वतारोही मेघा परमार/फेसबुक

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, यह कहते हुए मेघा उन बातों जिक्र करती हैं, जिसकी वजह से वो दुनिया की तीन सबसे बड़ी पर्वत श्रृंखलाओं पर पहुंचीं। उन्होंने वहां पहुंचकर न केवल सुकून की सांस ली बल्कि अपने पैरों तले उस जज्बे को महसूस किया, जो वो पूरा करना चाहती थीं। सफर जारी है, जिंदगी थमने का नाम नहीं… कुछ इस तरह की एक प्रेरणा हैं ‘मेघा परमार’।

चित्र: पर्वतारोही मेघा परमार/फेसबुक

मध्यप्रदेश के भोपाल से करीब 50 किमी दूर सीहोर जिले के भोज नगर गांव में जन्मी मेघा की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही गवर्मेंट स्कूल में हुई। द फीचर टाइम्स से बात करते हुए वो कहती हैं, ‘जिंदगी में यदि आगे बढ़ना है तो रिस्क लीजिए। मुझे रिस्क लेना पसंद है। रिस्क नहीं, तो आगे कुछ नहीं। बचपन से ही मैं कुछ ऐसा करना चाहती थी, जो अपने आप मे एक मिसाल हो। जब आप कुछ ऐसा करने वाले हैं जो असंभव नहीं, बल्कि संभव भी इतना आसान ना हो तो चुनौतियां तो आती हैं। ऐसे में आप खुद को इन सभी चीजों में प्रूफ कैसे करते हैं। ये सिर्फ आप तय करते हैं। यदि आपमें किसी भी काम को पूरा करने का जुनून है तो आप लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं। ये मुमकिन है।’

सब कुछ संभव है लक्ष्य पर केंद्रित रहिए

हर एक पर्वत की अलग विशेषता होती है। मैं जब माउंट एवरेस्ट, अफ्रीका के किलिमंजारो की सबसे ऊंची चोटी ‘उहुरू बिंदु’ या फिर यूरोप का एल्ब्रुस पर्वत वहां कई तरह की चुनौतियां थीं, तेज हवा, भारी स्नोफॉल और भी कई… लेकिन मैं सोचती हूं कि जब आप कोई काम करना शुरू करते हैं तो पीछे नहीं हटना चाहिेए समस्याएं आएगीं बहुत सी आएंगी यदि आप अपने लक्ष्य पर केंद्रित हैं तो यह आपके लिए संभव है।

लोग क्या कहते हैं, ये क्यों सोचते हो

आप जो कर रहे हो उसे करते रहो। लोग क्या कहते हैं, इस बारे में यदि आप सोचोगे तो आप वो नहीं कर पाओगे जो आप सचमुच में करना चाहते हो। पिछले साल यानी 2018 में, मैं माउंट एवरेस्ट से करीब 700 मीटर पीछे रह गई थी। बाद में ट्रेनिंग के दौरान फ्रैक्चर के कारण मैं काफी टूट चुकी थी। आस-पास सिर्फ लोग ताने दे रहे थे। लेकिन मेरा मन उस समय कहता था कि मुझे मेरे लक्ष्य को हासिल करना है और मैनें किया।

हर एक कोशिश बदलाव लाती है

मेघा ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान की ब्रांड एंबेसेडर भी है। उनकी सफलता को देखते हुए, उनके गांव भोजपुर की लड़कियों को बहार निकलने का मौका मिला। उनकी सफलता सामाजिक बदलाव की तरह है। वो कहती हैं, ‘यदि गांव में एक लड़की नाम रोशन करती है तो और लड़कियों के माता-पिता भी उन्हें पढ़ाते हैं। मैं खुश हूं कि मेरी एक पहल से मेरे गांव में बदलाव आया है। ये एक सामाजिक बदलाव की शुरूआत है। मैं अपने आर्गन डोनेट कर चुकी हूं।’

ये आप खुद करें और आप ये कर सकते हो

एक पर्वतारोही के तौर पर अब अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद आत्मविश्वास आया है। अब मेरी पहचान है। इस सफर में मुझे मप्र सरकार की भी मदद मिली, उन्होंने मेरी कुछ आर्थिक मदद की। मैनें कोशिश की है, पर्वतारोहियों के लिए सरकार कुछ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स या कुछ बेहतर करे, लेकिन चीजें अभी स्पष्ट नहीं। और आखिर में एक बतौर पर्वतारोही यही कहूंगी। लक्ष्य डिसाइड करें। ये आप खुद करें और आप ये कर सकते हो। ये मुमिकन है।

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