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नामुमकिन कुछ नहीं / वो महिलाएं जिन्होंने सरपंच बनकर किए कई बड़े काम

यूं तो भारत में पंचायती राज की शुरूआत वैदिक काल से हो चुकी थी। उस समय महिलाओं की स्थिति बेहतर थी, जिसके चलते वह सरपंच भी बनती थीं, लेकिन समय के साथ काफी कुछ बदलता गया और कई सैकड़ों साल तक महिलाओं की स्थिति गंभीर रहीं।

अब यह स्थितियां समय के साथ धीरे-धीरे बेहतर हो रही हैं। महिलाएं आज हर क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान कायम कर रही हैं। ऐसा ही एक क्षेत्र है पंचायत, जहां महिलाएं भी सरपंच बनकर गांव के विकास में योगदान दे रह हैं और लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।

ये हैं भारत की सफल महिला सरपंच

छवी राजवत, राजस्थान: भारत में महिला सरपंच की फेहरिस्त में छवि राजावत का नाम सबस पहले आता है। वह जयपुर से 60 किलोमीटर दूर टोंक जिले के छोटे से गांव सोड़ा की सरपंच हैं। वह नवंबर 2013 में स्थापित भारतीय महिला बैंक की निदेशक (डायरेक्टर) भी हैं। ग्रामीण राजस्थान के बदलते चेहरे के रूप में सम्मानित छवी ने 2011 में संयुक्त राष्ट्र के 11 वें इन्फोपॉवर्टी वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस में प्रतिनिधियों को संबोधित किया।

भक्ति शर्मा, मध्य प्रदेश: भक्ति शर्मा भोपाल के पास बरखेड़ी अब्दुल्ला गांव में सरपंच हैं। वह साल 2012 में नौकरी करने के लिए अमेरिका के टैक्सस शहर (Texas City of USA) चली गईं। कुछ दिन बाद भक्ति शर्मा के पिता ने उन्हें भावनात्मक रूप से समझाया कि अपने देश की सेवा करने का जो सुख है वो कहीं दूसरी जगह नहीं मिल सकता। पिता की इस बात ने उनकी जिंदगी बदल दी और नौकरी छोड़ साल वह साल 2013 में भारत वापस लौट आईं। साल 2016 में, उन्हें भारत में शीर्ष 100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था।

शहनाज खान, हरियाणा: हरियाणा के भरतपुर में गढ़जन गांव के गांव वालों ने मार्च 2018 में अपने सरपंच के रूप में 24 साल की शहनाज खान को चुना है। वह एमबीबीएस की छात्रा हैं। वह क्षेत्र की पहली महिला सरपंच हैं। शाहनाज बीमारियों को रोकने और जीवन बचाने के लिए स्वच्छता और स्वच्छता के बारे में जागरूकता फैलाने की योजना बना रहा है।

सुषमा भाडु, हरियाणा: 36 साल की सुषमा भादू 2010 हरियाणा के फतेहाबाद जिले के ढाणी मियां खां की सरपंच बनी थीं। 2012 में उन्होंने अपने और पंचायत में आने वाले दो अन्य गांवों चपलामोरी व सालमखेड़ा में पर्दा प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयों को खत्म करने का बीड़ा उठाया।

आज उनकी कोशिश का ही नतीजा है कि तकरीबन सभी महिलाओं ने घूंघट करना छोड़ दिया है। इसके लिए सुषमा ने गांव की महिलाओं को शपथ दिलाई। उन्हें जागरूक करने के लिए कार्यक्रम किए। दिलचस्प है कि समाज के पुरुषों ने भी उनका सहयोग किया।

आरती देवी, ओडिशा: पूर्व निवेश बैंकर, आरती देवी ने ओडिशा में अपने गांव धंकापारा के विकास के लिए अपनी आलीशान नौकरी छोड़ दी। आरती ने अपने गांव में पारंपरिक लोक कला को बढ़ावा देने का एक अभियान शुरू किया और यह भी सुनिश्चित किया कि तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ उन लोगों तक पहुंच जाए, जिनकी आवश्यकता लोगों को सबसे ज्यादा है। सरकार में पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्व पर बात करने के लिए अमेरिकी वाणिज्य दूतावास द्वारा अंतर्राष्ट्रीय आगंतुक नेतृत्व कार्यक्रम में सम्मानित किया गया। इस तरह आरती के काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

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