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सुझाव / ‘आत्मनिर्भरता’ के चरखे से कब घूमेगा ‘अर्थव्यवस्था का पहिया’

उत्तर भारत में गर्म मौसम शुरू हो गया है। गर्मी की तपिश ने जहां एक ओर लोगों को बेहाल कर दिया है, तो वहीं दूसरी ओर महंगाई लोगों को परेशान कर रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर तो है लेकिन गति धीमी है। लॉकडाउन और कोरोना इन दो बड़ी वजहों से दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है लेकिन कोशिश जारी है, भारत एक बार फिर उठ कर खड़े हो जाने के लिए तैयार है ताकि बीमार अर्थव्यवस्था को स्वस्थ्य बनाया जा सके।

हालही में मध्यप्रदेश सरकार ने बजट जारी किया, उन्होंने बजट को आत्मनिर्भर बजट कहा, जोकि कई मायनों में है भी, और नहीं भी। कहने का मतलब है कि देश की राज्य सरकार भी आत्मनिर्भता के चरखे से भारतीय अर्थव्यवस्था के पहिए को चलाने की कोशिश कर रही हैं।

बात जब देश की है तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने हालही में कहा है कि 2016 में मोदी सरकार द्वारा नोटबंदी के फैसले से देश में बेरोजगारी चरम पर है और अनौपचारिक क्षेत्र खस्ताहाल हैं। उन्होंने यह बात आर्थिक विषयों के ‘थिंक टैंक’ राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज द्वारा डिजिटल माध्यम से आयोजित एक विकास सम्मेलन का उदघाटन में कहीं।

इस समय, केंद्र और राज्य सरकार को देश की प्रगति के लिए हर स्तर पर कार्य करने की जरूरत है। यदि किसी सेक्टर को छोड़ रहे हैं, और सरकार व्यक्तिगत जागरुकता लाने का प्रयास करे तो यह कार्य काफी वक्त बाद सफल होगा। ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश बजट का है जहां कृषि क्षेत्र में बजट ज्यादा दिया गया जब कि वन विभाग को सबसे कम हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रतिदिन एक पौधा रोपित करने के संकल्प पर कायम हैं। यह उनकी सार्थक पहल है लेकिन यह वन और पर्यावरण जैसे सबसे चुनौतीपूर्ण सेक्टर के लिए काफी नहीं है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को सरकार पटरी पर कैसे ला सकती है? यह वो सवाल है जो हर दूसरा व्यक्ति जानना चाहता है। हालही में जब देश के एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार चैनल ने वैश्विक स्तर पर कार्य करने वाले अर्थशास्त्रियों से बात की। तो उनके इन सुझाव पर गौर करना सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को जरूरी हो जाता है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि यदि कोरोनावायरस का प्रभाव कम रहा तो भारत के लिए यह साल बेहतरीन साबित होगा। यह सही बात है कि हम उस स्थिति तक नहीं पहुंच पाएंगे, जहां कोरोना महामारी की शुरुआत के पहले थे लेकिन निश्चित रूप से पिछले साल हमने जो गंवाया था, उसे काफी हद तक पाने में कामयाब रहेंगे। नोटबंदी ने मजबूत होती विकास दर को रोक दिया था। वैश्विक मंदी के बाद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था वापसी के दौर में थी लेकिन नोटबंदी ने इस गति को थाम दिया।

प्रोफेसर कौशिक बसु कहते हैं कि भले ही आप महामारी को एक तरफ रख दें, 2016 से पिछले पांच वर्षों में हर साल पिछले वर्ष की तुलना में बुरा हुआ है, जो पहले कभी नहीं हुआ। पहली चीज जो हमें करनी चाहिए, वह डेटा को देखें, इसका अवलोकन करें। इसके लिए, देश की खातिर बेहतरीन समझ वाले लोगों को लाएं।

नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी कहते हैं कि जब चीन विश्‍वस्‍तरीय शिक्षा की ओर बढ़ रहा था। हमने इस बारे में बात तो बहुत की लेकिन इस पर काफी कम पैसा लगाया। मेरा एक दोस्‍त शिंगुआ का डीन था। उसे यह कहा गया था कि आपका काम है नौकरी के लिए लोगों को हायर करना। चीनी मूल के लोग बेहद प्रतिभाशाली हैं। आप उन्‍हें सैलरी ऑफर करके ले आओ। आज शिंगुआ कुछ तकनीकी के मामले में दुनिया में नंबर दो पर है। हमें ऐसा कुछ करने की जरूरत है, जो शिंगुआ और चीनी गवर्नमेंट ने किया। आप अपने डीन को ब्‍लैंक चैक देकर उनसे कहें कि अच्‍छे और क्षमतावान लोगों को लेकर आएं।

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