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मप्र-बिहार चुनाव / लोकप्रिय नेता के नाम पर लोक-लुभावने वायदों का सच

साल 1992 यानी उदारीकरण के ठीक एक साल बाद का समय इस दौरान हिंदी सिनेमा की एक यादगार फिल्म रिलीज हुई। नाम था ‘दिल का क्या कसूर’ इस फिल्म में वैसे तो एक से ज्यादा गाने थे लेकिन एक गाना यह भी था ‘मिलने की तुम कोशिश करना, वादा कभी ना करना, वादा तो टूट जाता है।’

यह गीत भले ही प्रेमिका अपने प्रेमी के लिए गा रही हो लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष्य में यह सटीक बैठता है। नेता वायदे करते हैं लेकिन वो पांच साल बाद ही जनता के सामने साक्षात् पहुंचते हैं। दौर बदला है तो राजनीतिक पार्टियों की कार्यशैली भी बदली है। राजनीति अब पूरी तरह से एक प्रोफेशन बन चुका है जहां सैलरी के साथ पद भी मिलता है। भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे ज्यादा कार्यकर्ताओं वाली पार्टी है। यहां प्रोफेशनलिज्म है। रणनीतिक तरीकों से चुनाव जीतने की जद्दोजहद चुनाव जीतने के साथ ही अगले चुनाव के लिए शुरू हो जाती है।

कांग्रेस इस तरह का नया नवाचार नहीं कर सकी इसलिए वो सत्ता की कुर्सी पर नहीं बैठ पाई। उनकी अपनी रणनीति है लेकिन उनकी रणनीति अभी भी मुफ्त में काम कराकर कार्यकर्ताओं को कार्यकर्ता बने रहने पर मजबूर कर देती है, तब कार्यकर्ता अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए कभी बीजेपी तो कभी किसी ओर पार्टी जो सत्ता की कुर्सी के बेहद नजदीक पहुंच रही होती है उनमें दल-बदल कर शामिल हो जाते हैं।

इस समय उत्तर-भारत में सर्द मौसम की दस्तक शुरू हो चुकी है, चुनावी हवाएं चल रही हैं। यह हवाएं बिहार, मध्यप्रदेश में अपना डेरा डाले हुए हैं। अलबत्ता, बात की शुरूआत मध्यप्रदेश से करें तो मध्य प्रदेश में 16 साल में 30 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, लेकिन 15वीं विधानसभा का यह साल ऐसा होगा, जब प्रदेश में पहली बार एक साथ 27 सीटों पर उपचुनाव होंगे। यहां असल चुनावी मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस ही है। इन दोनों ही राजनीतिक पार्टियों में पलड़ा किसका भारी रहा ये तो वक्त बताएगा लेकिन इतना तय है जो भी इस बार सत्ता में आएगा उसका पांचों अंगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में में होगा।

वजह कई हैं, जैसे भोपाल-इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट, कोरोना संक्रमण के दौरान योजनाएं और बाद में वैक्सीन यदि आ जाती है तो उसे लगवाने का महाअभियान ये दो ऐसे विकल्प है जहां नेता बिना भ्रष्टाचार किए नहीं रह पाएंगे, इस दौरान उनके आगे-पीछे घूमने वाले छुटभैय्ये नेता और आला अफसर भी बहती गंगा में हाथ धोना चाहेंगे। मध्यप्रदेश में ऐसे कई बड़े घोटाले हुए हैं जिन्हें अता-पता-लापता कर दिया गया मसलन व्यापमं घोटाला, डम्फर घोटाला और भी अनेक लेकिन ये चुनावी मुद्दा नहीं रहे।

मध्यप्रदेश उप-विधानसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा नेताओं की आपसी मतभेद और खींचतान है दूसरे पायदान पर किसान हैं, कोरोना में मुफ्त दवा देने का वायदा नया है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी के उन मामलों को उठा रही है, जिनके प्रमाण उनके पास भी नहीं है। कांग्रेस यह भूल रही है कि उसे यदि भाजपा का सामना करना है तो सबसे पहले अपने घर, जमीन और बुनियाद को मजबूत करना होगा। उनके एक वरिष्ठ नेता पिछले कुछ महीने पहले जब भाजपा में शामिल हुए तभी से उन्हें अपनी रणनीति में फेर-बदल करने की जरूरत थी। वो उनके स्टार प्रचारक थे, लेकिन वो अति-महत्वाकाक्षी भी थे। हार बर्दास्त नहीं कर सके और वो फिर से राज्यसभा के उच्च सदन तक पहुंच गए।

लेकिन वो गए तो ये उप-विधानसभा चुनाव की नींव भी तैयार करते गए उनके समर्थक साथियों ने इस्तीफा देकर भाजपा ज्वाइन की और कुछ बिना योग्यता के बाद भी मंत्री बन बैठे। बहरहाल, चुनाव में वायदो की बयार जारी है। कांग्रेस जहां, किसान, बिजली बिल, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे मुद्दों को बढ़ावा देने का वायदा कर रही है। हालांकि जब उन्हें सत्ता मिली तो सिर्फ उन्होंने कुछ किसानों और बिजली बिल को ही माफ किया। रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने में वो नाकाम रहे। तो वहीं, भाजपा अपने चुनावी वायदों में वो हर वायादा कर रही है जो वो केंद्र सरकारी की योजनाओं की मदद से पूरा कर सकती है। मसलन, बेहतर चिकित्सा, इंफ्रास्ट्रक्चर और काफी हद तक रोजगार भी शामिल है।

बात यदि बिहार की करें तो वहां चुनाव दंगल बन चुका है। मैदान में कई हैं, लेकिन विकास हमेशा से ही लापता रहा है। शिक्षा, रोजगार के मामले में बिहार के नेताओं के वायदे हमेशा चुटकुलों का पिटारा साबित हुए हैं। आलम यह है कि भाजपा का बिहारी दंगल जीतने के लिए कोरोना वैक्सीन फ्री में देने का वायदा करना पढ़ा। इस बात की गंभीरता को देखते हुए मप्र उप-विधानसभा चुनाव में भी यह वायदा दोहराया गया। बिहार में कई क्षेत्रीय दल के साथ कुछ राष्ट्रीय दल सीएम की कुर्सी पर नजर जमाए हुए हैं। ऐसे में हवा किसी की भी हो जीत बीजेपी के पाले में जाती ज्यादा दिखाई दे रही है। वैसे इस लिहाज से यह प्रधानमंत्री की लोकप्रियता की परीक्षा का भी चुनाव है। आख़िर वे इस चुनाव के पहले दौर में ही 12 रैलियां कर रहे हैं।

मोदी भाजपा के स्टार प्रचारक और लोकप्रिय नेता हैं, जिनके नाम पर भाजपा चुनाव जीतती आई है। चिराग पासवान को भी क्रेडिट देना होगा क्योंकि वे बहुत सफलतापूर्वक चुनावों को वास्तविक मुद्दों तक खींच लाए हैं। बिहार में रोजगार का सवाल अचानक केंद्रीय सवाल बन गया है। हालांकि बीजेपी ने अपनी ओर से इसके ध्रुवीकरण की थोड़ी-बहुत कोशिश की है। सुशांत मुद्दा टीवी चैनलों पर होने वाली बेतुकी बहस के साथ अब खत्म हो गया है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला चुनाव प्रचार के लिए बिहार दौरे पर हैं। एक दैनिक हिंदी अखबार को दिए साक्षात्कार में वो कहते हैं, प्रजातंत्र में व्यावहारिक होना और पार्टी के आगे ले जाने के अवसर निरंतर खोजना, किसी भी राजनीतिक दल का धर्म और कर्तव्य है। पिछले चुनाव में हम (बिहार-कांग्रेस) 41 सीट पर लड़े थे, इस बार 70 पर लड़ रहे हैं। पार्टी के लिए आज सबसे अहम बिहार की प्रगति है। इसलिए कुछ कुर्बानी राजद ने की, कुछ कांग्रेस ने। विकास की नई इबारत लिखने, नए तेज व वेग का महागठबंधन बनाया है। इसके विपरीत दूसरी तरफ टायर्ड व रिटायर्ड सरकार है।

मध्यप्रदेश उप-विधानसभा और बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा की सीएम की कुर्सी कौन-सी पार्टी का नेता संभालेगा लेकिन चुनावी वायदों को भारतीय जनता पार्टी के नेता स्वयं नकार चुके हैं, न्यूज चैनल एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए अमित शाह ने कहा था कि ये (चुनावी वायदा) चुनावी भाषण में वजन डालने के लिए बोली गई बात है क्योंकि किसी के अकाउंट में 15 लाख रुपए कभी नहीं जाते, ये बात जनता को भी मालूम है।

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