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टिप्पणी / आत्मनिर्भर बनें, ‘सुशासन’ केवल भाषणों तक सीमित

शुरूआत से शुरू करते हैं, तो उन्होंने कहा था, ‘अच्छे दिन आएंगे’, हमने (भारतीय जनता) उनकी बात को शिरोधार्य किया और उन्हें पहला मौका दिया। उन्होंने नोटबंदी, जीएसटी और कई योजनाओं के जरिए कुछ अच्छा तो कुछ बहुत खराब कर दिया। किसी ने कुछ कहा, कोई चुप रहा, कोई बिना पलक झपकाए, गुमसुम देखता ही रह गया।

हमने उन्हें एक बार फिर भारी बहुमत से चुना। हमने चुना है, तो सवाल भी हम करेंगे। उनको जवाब भी देना होगा। वो जवाब नहीं देगें तो आलोचनाओं को भी सुनना होगा, यदि वो दमन करेंगे तो हम कैसे चुप रहेंगे? हमें बार-बार और हर बार याद दिलाना होगा कि आज वो जहां हैं उन्हें हमारी मदद करनी होगी, जिसमें वो अभी तक विफल रहे हैं।

यहां हम निराशा की बात नहीं करेंगे, हमें आशा है कि वो हमारी मदद करेंगे और कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने जो किया उसे हम माफ भी नहीं कर सकते। इसका जवाब हम चुनाव के समय देंगे? कौन किस तरह से जवाब देगा यह पूछना और बताना मुनासिब नहीं, क्योंकि भारतीय जनता को उनसे काफी अपेक्षाएं थीं, हैं और रहेंगी। यदि आप एक गाय के पास जाते हैं, तो आपको दूध, गौ-मूत्र, या गोबर मिलेगा और आप ये उम्मीद करते हैं कि कलयुग में कामधेनू गाय के पास जाएंगे और आपको बना-बनाया स्वादिष्ट पकवान मिलेगा, तो यह गलती किसकी है, आपकी या गाय की?

बहरहाल, मिस्ड कॉल से समर्थन जुटा लेने वाली दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी आपको मिस्ड कॉल पर ऑक्सीन या दवाएं नहीं दे सकती है? यहां पढ़ते समय आप यह बिल्कुल ना सोचें कि हम केवल उनकी ही बात क्यों कर हैं? तो, आप यह जान लें, देश हमारा है। मौजूदा समय में भारतीय जनता ने उन्हें चुना है तो सवाल भी उन्हीं से किया जाएगा। उनके समर्थक निराश ना हों, क्योंकि कई समर्थकों ने अपनों को खोया है। काश! वो उस समय हिंदू-मुस्लिम, पाक-चीन और और भी कई बातों की वकालात ना करते हुए यह पूछते कि आप देश के लिए क्या कर रहे हैं, तो आलम कुछ ओर होता जिसका परिणाम आज मिल सकता था? फिर भी हम उन मुद्दों पर बात करते जा रहे हैं, हम उन मुद्दों पर बात या सवाल क्यों नहीं करते हैं? जो देशहित में जरूरी हैं।

डिजिटल इंडिया के दौर मे, घर-घर जनसंपर्क

उन्होंने कहा था कि वो भारत में डिजिटल इंडिया के जरिए हर गांव में इंटरनेट की पहुंच बनाएंगे, दुनिया में कोरोना की दहशत है और भारतीय गांव में इंटरनेट तो दूर, कोरोना की सही जानकारी देनें में केंद्र और राज्य सरकार विफल रही हैं आज कोरोना को ग्रामीण अंचल में मामूली सर्दी-जुकाम का रोग समझा जा रहा है! यहां तक कि, मध्यप्रदेश सरकार द्वारा गांव में किल कोरोना अभियान चलाना पड़ रहा है क्योंकि ग्रामीणों तक कोरोना क्या है? यह बात पहुंच ही नहीं पाई है? कार्य जारी हैं, फल मिलेगा लेकिन बहुत देर बाद जब कई लोग अपनों को खो चुके होंगे।

छद्म उम्मीद देते, साहेब के हजारों भाषण

भारत के प्रधानमंत्री ने पिछले 7 साल में हजारों भाषण दिए हैं। क्या उन्होंने कभी ‘टीकाकरण वाले भारत’ की बात की है? गरीबों के हित में प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत एक मात्र ऐसी योजना है, जिसका फायदा गरीबों को स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए मिल रहा है, लेकिन अभी भी इसकी पहुंच जो वास्तविक गरीब हैं उन-तक नहीं हैं। जंगल से लकड़ी चुन कर शहर में बेचेने वाले, शहरी गरीब मजदूर और छोटे शहरों में रहने वाले वो लोग जिन्हें इस योजना का लाभ मिलना चाहिए, यह योजना अभी उन तक नहीं पहुंची है। उन तक सरकार को पहुंचना होगा। ठीक इसी तरह, साहेब के भाषणों में वो विपक्ष की आलोचनाओं, या चुनावी गणित के जोड़-घटाने में व्यस्त रहे।

खैर, यह लाज़मी है राजनीति भी करनी है। छद्म राष्ट्रवाद भी तैयार करना है, अपने और अपने लोगों के हितों की भी रक्षा करनी हैं। कई लोग साहेब की तरफ एकटक देखते हैं, कि वो उनका कुछ भला करेंगे, वह करते हैं या नहीं यह आप तय कीजिए।

वैसे, क्या आपने सोचा है कि अचानक ऑक्सीजन की कमी होने से लोगों मे ‘राष्ट्रीय जुनून’ कैसे आया, इसके पीछे कौन सी विदेशी एजेंसी है? क्या यह आईएसआई है? या कोई ओर? या फिर यह ट्विटर है? दरअसल, ट्विटर, फेसबुक के जरिए लोगों ने ऑक्सीजन की कमी को लेकर बहुत कुछ लिखा। यहां लोगों ने निजी स्तर पर मदद की। सूद फाउंडेशन, के सोनू सूद हर संभव प्रयास करते हैं। यहां सरकार का सुशासन कहां है? सुशासन केवल भाषणों का एक हिस्सा रहता है जो केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने हिसाब से तय करती हैं और उन्हें सरकारी और निजी माध्यमों के जरिए प्रचारित करती हैं।

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जब सुशासन गायब था तो केंद्र और राज्य सरकार को कई बार सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट की डांट सुननी पड़ी और उन्होंने बाद में ऑक्सीजन मुहैया करवाने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास शुरू किए। दिल्ली, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और देश के कई राज्यों में ऑक्सीजन समय पर नहीं मिलने से कई लोगों की मौत हुईं, जिसकी जवाबदेही वैसे तो प्रधानमंत्री की है लेकिन उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा ना देते हुए विषम परिस्थितियों को बेहतर करने की कोशिश करने की राह चुनी।

देश की छवि का ख्याल रखें

सरकार चाहती है कि आप एक देशभक्त बनें। उनकी अपनी जीवन प्रत्याशा जनता से ज्यादा है, इसीलिए संसद भवन होने के वाबजूद सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के जरिए नया संसद भवन, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नए आवास तैयार किए जा रहे हैं। शुरूआत कांग्रेस ने की थी, तैयार करने का मौका मौजूदा केंद्र सरकार(बीजेपी) को मिला, वो 20 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं, इतना ही पैसा अब तक चर्चित प्रोजेक्ट में खर्च हो चुका है। यह समय कोरोना महामारी से आई, राष्ट्रीय आपदा का है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उनके रायपुर के नजदीक बन रहे नवां रायपुर प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी है। क्या केंद्र सरकार सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर रोक लगा सकती है, इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं है।

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ऐसे में सरकार से देशभर के सभी नागरिकों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देने की ‘उम्मीद’ कैसे कर सकते हैं? सरकार राष्ट्रवाद की बात करती है, तो आप एक राष्ट्रभक्त बनिए, देश की छबि का ध्यान रखिए चाहे आपकी जान चली जाए। आखिर, भविष्य में यह हर भारतीय के लिए गर्व की बात होगी कि हमारे प्रधानमंत्री का घर जनता के टैक्स द्वारा वित्त पोषित करके अधिक शानदार और राजसी बनाया गया है? और यह तब बनाया जा रहा था, जब भारत में कोरोना महामारी ने आम लोगों की जिंदगी को हर स्तर पर तबाह कर रही थी?

प्रधानमंत्री का आग्रह, आत्मनिर्भर बनें

भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उच्च शिक्षित बुद्धिजीवी भी सरकार से निराश होने का दावा करते हैं। लेकिन, वो खुलकर नही कहते हैं, कहने के लिए साहस चाहिए। वो अपना बहुत कुछ एक पल में खत्म नहीं करना नहीं चाहते हैं, जो कहते हैं वो चर्चाओं में बने रहते हैं। कई महीनों से या यूं कहें कि भारत में कोरोनोवायरस के पहले से ही हमारे प्रधानमंत्री बार-बार भारतीयों से आग्रह किया कि आत्मनिर्भर बनें, और उन्होंने यह स्पष्ट रूप से सुनिश्चित कर दिया कि हम महामारी के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।

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शायद आप आत्मानिर्भर का अर्थ समझते होंगे? इसका मतलब है कि सरकार से आप कोई उम्मीद ना रखिए ना रोजगार, ना बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और जो भी केंद्र और राज्य सरकार कर रही है वो सिर्फ प्रचार तंत्र का हिस्सा है। भारतीय नेता इस समय अपनी छबि चमकाने में व्यस्त हैं। याद रखिए मुफ्त घर, मुफ्त अनाज देकर सरकार आने वाले दिनों में इन्हीं मुद्दों पर वोट मांगेगी? तय आपको करना है। मोदी ब्रांड अब फेल हो चुका है। भविष्य में होने वाले चुनाव में उन्हें चुनें, जो आपके बुरे वक्त में साथ हैं, नफरत फैलाने और सिर्फ वोट लेकर छू-मंतर होने वाले नेताओं से बचें, फिर चाहे वो किसी भी भारतीय राजनीतिक पार्टी का ही क्यों ना हो?

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