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ऐसा क्यों / भीमराव रामजी आंबेडकर ने कहा था ‘भारत में लोकतंत्र कामयाब नहीं’

भीमराव रामजी आंबेडकर ने कहा था, ‘मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है।’ ये बात है 127 साल पुरानी जब  बीआर आंबेडकर का जन्म हुआ, तब स्थितियां बिल्कुल भी ठीक नहीं थीं। छुआछूत प्रथा अपने चरम पर थी। एक विशेष वर्ग को स्पर्श कर लेने के कारण, एक विशेष वर्ग का धर्म भ्रष्ट हो जाता था। कुछ ऐसी ही सोच थी इंसान की इंसान के बारे में, ऐसा करना सही था या गलत यह आप तय कीजिए।

बीआर आंबेडकर के बचपन का नाम ‘रामजी’ सकपाल था। 14 अप्रैल, 1891 को आंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव महू में हुआ था, जो इंदौर जिले में है। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और मां का नाम भीमाबाई सकपाल था। यही कारण है कि उनके नाम में भीम शब्द मां के नाम से और रामजी शब्द पिता के नाम से लिया गया है। 6 दिसंबर, 1956 को वह पंचतत्व में विलीन हो गए।

कौन थे कृष्णा महादेव

उनके नाम के पीछे आंबेडकर कैसे जुड़ा इसके पीछे की कहानी यह है कि जब उनके पिता रामजी सकपाल ने स्कूल में अपने बेटे भीमराव का उपनाम ‘सकपाल’ की बजाए ‘आंबडवेकर’ लिखवाया, क्योंकि उस समय कोंकण प्रांत में लोग अपना उपनाम गांव के नाम से लगा देते थे, इसलिए भीमराव का मूल अंबाडवे गांव से अंबावडेकर उपनाम स्कूल में दर्ज किया गया। बाद में एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर जो भीमराव से विशेष स्नेह रखते थे, उन्होंने उनके नाम से ‘अंबाडवेकर’ हटाकर अपना सरल नाम ‘आंबेडकर’ उपनाम को तौर पर जोड़ दिया। इस तरह उनका पूरा नाम भीमराव रामजी आंबेडकर के नाम से आज हम जानते हैं।

भारत में लोकतंत्र कामयाब नहीं

सन् 1953 में बीबीसी ने भीमराव रामजी आंबेडकर का एक इंटरव्यू  लिया था। इसी इंटरव्यू में जब पत्रकार ने पूछा, क्या आपको लगता है कि भारत में लोकतंत्र कामयाब होगा? तब उन्होंने कहा था किनहीं, ये औपचारिकता मात्रा है। चुनाव होते हैं, प्रधानमंत्री चुने जाते हैं।  इसके बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या चुनाव होना बेहद जरूरी हैं? तब आंबेडकर ने कहा था नहीं, चुनाव की उपयोगिता तभी है जब अच्छे लोग चुनकर आएं। उन्होंने भारत में लोकतंत्र की अपेक्षा साम्यवाद एक तरीका हो सकता है।  इस बारे में अपनी राय उस समय दिए इंटरव्यू में दी थी।

आंबेडकर, कश्मीर और पाकिस्तान

आंबेडकर ने 10 अक्टूबर 1951 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देते हुए अपने भाषण में कहा था कि, ‘पाकिस्तान के साथ हमारा झगड़ा हमारी विदेश नीति का हिस्सा है, जिसके बारे में, मैं गहरा असंतोष महसूस करता हूं। पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्तों में खटास दो कारणों से है एक है कश्मीर और दूसरा है पूर्वी बंगाल में हमारे लोगों के हालात। मुझे लगता है कि हमें कश्मीर के बजाए पूर्वी बंगाल पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए जैसा कि हमें अखबारों से पता चल रहा है, हमारे लोग असहनीय स्थिति में जी रहे हैं। मेरा विचार हमेशा से यही रहा है कि कश्मीर का विभाजन ही सही समाधान है। हिंदू और बौद्ध हिस्से भारत को दे दिए जाएं और मुस्लिम हिस्सा पाकिस्तान को जैसा कि हमने भारत के मामले में किया। कश्मीर के मुस्लिम भाग से हमारा कोई लेनादेना नहीं है। यह कश्मीर के मुसलमानों और पाकिस्तान का मामला है। वे जैसा चाहें, वैसा तय करें। यदि आप चाहें तो इसे तीन भागों में बांट दें, युद्धविराम क्षेत्र, घाटी और जम्मू-लद्दाख का इलाका और जनमत संग्रह केवल घाटी में कराएं।’

(अंग्रेजी भाषा में पूरा आर्टिकल यहां पढ़ें)

DR. AMBEDKAR’S RESIGNATION SPEECH

उस समय कैंसर की तरह फैला था छुआछूत

वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी बताते हैं, ‘इन 90 सालों में भारत की कोख ने अनगिनत सपूत पैदा किए। हम अभी सिर्फ आंबेडकर की बात करते हैं। आज अनुसूचित जाति या जनजाति का कोई भी व्यक्ति उस दौर और उस समाज की कल्पना भी नहीं कर सकता, जिसमें भीमराव ने आंखें खोली होंगी। तब हमारी सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था में छुआछूत का कैंसर बुरी तरह फैला हुआ था। अछूत माने गए समुदायों में पैदा होने वाले किसी भी बच्चे का कोई भविष्य नहीं था। उसे वही करना था, जो तय था। ब्रिटिश राज में कुछ चीजें बदली थीं और भीमराव के पिता को अंग्रेजों की सेवा में सूबेदार की हैसियत मिल गई थी। बहुत मुमकिन है कि इससे उन्हें सामाजिक रूप से अछूत होने के दंश से बहुत मुक्ति नहीं ही मिली होगी।’

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