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अपराध / हाथरस में ‘गुपचुप पंचायत’ आरोपी के साथ 12 गांव के सवर्ण?

चित्र : प्रशासन ने जब अमानवीयता की हद पार करते हुए पीड़ित लड़की का शव आधी रात को जला दिया। 

21वी सदी में विकास, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत से इतर भी एक भारत है। यह भारत लोगों के दिलों में बसता है, यहां हर धर्म, जाति, संप्रदाय के लोग हैं, जो भेदभाव भी करते हैं और साथ में भी रहते हैं।

हम यहां सिर्फ जातिवाद की बात करें तो कई सवाल और चुनौतियां सामने आती हैं, हालांकि जातिवाद को बढ़ाने में मौजूदा राजनीतिक दलों की महत्वपूर्ण भूमिका है और यह सब कुछ वोट बैंक के लिए होता है।

जातिवाद का दंश है हाथरस की घटना

निर्भया केस की बात थमी ही नहीं की हाथरस में उससे भी ज्यादा गंभीर घटना सामने आई। लड़की दलित थी, कई लोग उसके ही चरित्र पर उंगली उठा रहे हैं। ये बेहद शर्मनाक और निंदनीय है। आलम यह है कि हाथरस जिले के कलेक्टर मृत पी़ड़िता के घर जाते हैं और उनके परिवार को ही धमकाते हैं। ऐसी कई मीडिया रिपोर्टस में खुलासा हुआ है। प्रशासनिक अमला इस पूरे मामले के लेकर गंभीर तो था लेकिन साक्ष्य मिटाए जा रहे थे। लड़की का दोबारा पोस्ट-मार्टम ना हो सके उसे देर रात जला दिया जाता है। मृतक लड़की के परिजन चीखते-चिल्लाते रहे, कोई सुनवाई नहीं हुई और मामला तूल पकड़ता जा रहा है।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता के गांव के सभी सवर्ण एकजुट हो गए हैं, इनमें ठाकुर और ब्राह्मण भी शामिल है, गांव में दलितों के गिने-चुने घर ही हैं, अब वो बिलकुल अलग-थलग हो जाएंगे हालही में बघना गांव में हुई पंचायत में मामले की सीबीआई जांच की मांग करने और आरोपियों को न्याय दिलाने का आह्वान किया गया।

सवर्ण लोगों का कहना है कि जब मेडिकल रिपोर्ट में गैंगरेप की पुष्टि ही नहीं हुई है तब आरोपियों को किस आधार पर निशाना बनाया गया है। इस घटना की सीबीआई जांच की मांग करते हुए दोनों पक्षों के नार्कों टेस्ट कराए जाने की मांग की है। साथ ही ये फैसला भी लिया गया कि पीड़िता के गांव में किसी बाहरी को घुसने नहीं दिया जाएगा। कल ही ठाकुर समाज से संबंध रखने वाले एक पूर्व विधायक ने बयान दिया था कि लड़की की हत्या में उसके परिजन ही शामिल हैं। इस तरह की खबरों से पीड़िता के परिजनों की बेचैनी और बढ़ रही हैं।

इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक कहते हैं, हाथरस में हुए बलात्कार के कारण देश में वैसा ही रोष पैदा हो रहा है, जैसा कि निर्भया-कांड के समय हुआ था। यदि यह कोरोना महामारी का वक्त नहीं होता तो लाखों लोग सारे देश में सड़कों पर निकल आते और सरकारों को लेने के देने पड़ जाते।

यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मुस्तैद किया है और योगी ने तुरंत सारे मामले की जांच के लिए विशेष कमेटी बिठा दी है लेकिन सारे मामले में हाथरस की पुलिस और डाक्टरों के रवैए ने सरकार की प्रतिष्ठा को भी दांव पर लगा दिया है।

पुलिस और सूचना विभाग के कुछ अधिकारियों के विरुद्ध भी कुछ कार्रवाई हुई है लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ पुलिस अधिकारियों ने जो बर्ताव किया, उसके कारण इन दोनों भाई-बहनों की छवि तो चमकी ही, प्रशासन के रवैए पर भी कई प्रश्न चिन्ह भी लग गए।

सबसे पहले तो यही प्रश्न उठा कि एक सप्ताह तक इस बलात्कार की शिकायत पुलिस ने दर्ज क्यों नहीं की? स्थानीय अस्पताल ने उस युवती के इलाज में इतनी लापरवाही क्यों बरती? दिल्ली के एक अस्पताल में उसका निधन हो जाने पर पुलिस ने उसकी लाश को रात में ही फूंक डाला और उसके परिवार से कोई सहमति तक नहीं ली गई। किस डर के मारे पुलिस ने यह अमानवीय कृत्य किया गया कर? सबसे शर्मनाक बात यह हुई कि पीड़िता की जांच के बाद कहा जा रहा है कि उसके साथ बलात्कार के कोई प्रमाण नहीं मिले। उस युवती ने खुद बलात्कार की बात कही और उन नर-पशुओं के नाम बताए। क्या मरने के पहले उसने जो बयान दिया, उस पर संदेह किया जा रहा है?

उन नर-पशुओं ने उस युवती की कमर की हड्डी तोड़ दी, जुबान काट ली और उसके अधमरे शरीर को उसके दुपट्टे से घसीटा गया। उसकी लाश पर घासलेट डालकर उसको जला दिया गया और उसकी अस्थियां अभी तक वहीं पड़ी हुई हैं। उसके परिवार को नजरबंद कर दिया गया। उनके मोबाइल फोन पुलिसवालों ने जब्त कर लिए, ताकि वे बाहर के लोगों से बात न कर सकें।

उस परिवार से किसी भी पत्रकार को नहीं मिलने दिया गया। पुलिसवालों का कहना है कि जांच कमेटी काम कर रही है। इसीलिए न तो पत्रकारों को वहां जाने दिया गया और न ही परिवार के किसी सदस्य को बाहर आने दिया गया।

ऐसा लगता है कि हाथरस की पुलिस और प्रशासन स्वयंभू है, संप्रभु है, सर्वोच्च है। यह स्थिति उप्र सरकार की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रही है। यदि योगी सरकार अपनी घोषणा के मुताबिक अपनी पुलिस के खिलाफ अत्यंत सख्त कदम नहीं उठाएगी तो वह न सिर्फ अपने लिए खतरा पैदा कर लेगी बल्कि सारी भाजपा सरकारों के भविष्य को खटाई में डाल देगी।

यह योगी की सबसे गंभीर परीक्षा का समय है। योगी से आशा की जाती है कि वे बलात्कारियों और पुलिस के विरुद्ध इतनी सख्त कार्रवाई करेंगे कि वह दूसरे मुख्यमंत्रियों के लिए मिसाल बन जाए।

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