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वन अधिकार / देश के इस राज्य में ‘कानून’ लागू होने से, कुछ ऐसी है ‘फ़िज़ा की धूंधली तस्वीर’

जम्मू-कश्मीर के गुज्जर आदिवासी का एक परिवार। ये पशुपालक होते हैं और जंगल में मौजूद घास के मैदानों पर सदियों से पूरी तरह आश्रित हैं। तस्वीर– संदीपा चेतन/फ्लिकर

सत्यम श्रीवास्तव।

  • धारा 370 हटाने से स्थानीय आदिवासी समाज को वन-अधिकार कानून लागू होने की उम्मीद थी पर 18 महीने बीतने के बाद भी तस्वीर स्पष्ट नहीं है। जागरूकता के अभाव में वन आश्रित समुदाय के लोग भ्रम और संशय की स्थिति में हैं।
  • वन अधिकार कानून की मौजूदगी में भी जंगलों से बेदखली की घटनाओं ने एक तरफ वन विभाग को मजबूत किया और दूसरी तरफ इससे वन आश्रित समुदायों की उम्मीदें कमजोर हुई हैं।
  • इसके मूल में हैं गृह मंत्रालय द्वारा 18 मार्च 2020 को भारतीय वन कानून, 1927 को जम्मू-कश्मीर में लागू करना। विशेषज्ञों की मानें तो वर्तमान स्वरूप में यह कानून, वन अधिकार कानून, 2006 की मूल भावना को ठेस पहुंचाता है।

कैपरान, अनंतनाग जिले का एक सरहदी कस्बाई गांव है जो चारों तरफ से पहाड़ों और घास के मैदानों से घिरा है। यहां आस-पास के तकरीबन दस गांवों के बाशिंदों के जमावड़े में, एक गांव बूगम के सरपंच मोहम्मद बशीर अहमद धारा 370 हटने का स्वागत केवल इसलिए किया था क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसा होने से उन्हें और उनके जैसे समुदायों को वनों पर स्थायी अधिकार मिल जाएंगे।

वो कहते हैं कि हमें बताया गया था कि यहां के आदिवासी मुसलमानों को जो पशुपालक हैं और जंगल में मौजूद घास के मैदानों पर सदियों से पूरी तरह आश्रित हैं, धारा 370 हटते ही सारे अधिकार खुद ब खुद मिल जाएंगे। आज अठारह महीने बीत जाने के बाद हमसे कई तरह के सबूत मांगे जा रहे हैं। हमें यह भी बताया जा रहा है कि जिनके पास मिल्कियत (राजस्व) की ज़मीनें हैं उन्हें ये अधिकार नहीं मिलेंगे।

अपना संदेह बताते हुए उन्होंने कहा कि वन अधिकार देने के लिए हमें मिल्कियत की ज़मीनें छोड़नी होंगीं और सरकार मिल्कियत के बदले ही जंगल की ज़मीन देगी। यह हम नहीं चाहते। अन्य लोगों को भी यही डर सता रहा है कि सरकार उनकी पुश्तैनी ज़मीनों को भी जंगलात में शामिल करवाना चाहती है। फिर इन सारी जमीनों पर टैक्स वसूल किया जाएगा।

हालांकि ग्रामीणों के इस डर को ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल के डिप्युटी चेयरमैन शाहबाज़ शाह महज भ्रम करार देते हैं। सही जानकारी किसी के पास नहीं है। छोटी-बड़ी तमाम वजहें-इसके लिए जिम्मेदार हैं। जैसे, जाति -प्रमाणपत्र जारी करने का काम राजस्व विभाग का है जो ऐसे लोगों को दिया जाता है जिनके पास मिल्कियत की ज़मीनों के रिकार्ड हों।

वन अधिकार के दावे भरने के लिए जाति-प्रमाणपत्र ज़रूरी है। पटवारी, इनसे जाति प्रमाणपत्र बनाने के लिए मिल्कियत के रिकार्ड मांगता है। इन दो बातों को ये एक साथ जोड़कर इस तरह देखते हैं कि इनकी मिल्कियत की ज़मीनों के बदले ही जंगलों पर अधिकार मिलेंगे।

जम्मू-कश्मीर में वनाधिकार के विशेषज्ञ जावेद राही ने बताया कि जन प्रतिनिधियों और ग्राम सभाओं तक अभी इस कानून को लेकर बुनियादी जानकारी भी नहीं पहुंची है। कानून के क्रियान्वयन में शामिल विभागों मसलन वन विभाग, जनजाति विभाग और पंचायत विभाग के बीच भी समन्वय नहीं बन पाया है। जागरूकता के अभाव में हर गाँव में ऐसे ही सवाल लोगों के दिमाग में घूम रहे हैं।

बेदखली और प्लांटेशन से खफा हैं समुदाय  

विडंबना यह कि जब आदिवासी समाज के ये लोग (धारा 370 हटने के बाद) इस आस में बैठे थे कि स्वतः वन अधिकार कानून लागू होगा तभी कुछ एकदम विपरीत हो गय 23 अक्टूबर 2020 को पहलगाम और 10 नवंबर 2020 में सूबे के बडगाम जिलों में वन विभाग ने जंगल की ज़मीन पर बसे समुदायों को बेदखली के नोटिस जारी कर दिए गए। यह मामला पूरे केंद्रशासित प्रदेश में चर्चा का मुद्दा बन गया।

हालांकि प्रशासन ने बताया कि यह कार्यवाही ‘सेव एनिमल वैल्यू एनवायरमेंट’ द्वारा जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में दाखिल एक जनहित याचिका और ‘हरचरन सिंह बनाम स्टेट ऑफ जम्मू-कश्मीर’ द्वारा दाखिल जनहित याचिका की संयुक्त सुनवाई के दौरान दिए गए एक आदेश के हवाले से हुई।

इस आदेश में वनों में बसे अवैध कब्ज़ेधारियों की शिनाख्त करते हुए बेदखल करने के लिए प्रशासन को कहा गया था। दिलचस्प है कि इस बेदखली की कार्यवाही के लिए जम्मू-कश्मीर के वन विभाग ने संशोधित भारतीय वन कानून, 1927 की धारा 79 ए को कानूनी आधार बनाया गया। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने न्यायालय को बताया कि कुल 63000 ऐसे लोग हैं जो अवैध रूप से जंगलों में बसे हैं।

इन कार्यवाहियों की खबरें भी बशीर अहमद और कैपरन के लोगों को लगी। ये लोग खुद को इन 63,000 लोगों में गिनते हैं और इन्हें डर सता रहा है कि उन्हें या तो जंगलों से महरूम कर दिया जाएगा या मिल्कियत की ज़मीनों से।

क्या कानून सम्मत है आदिवासियों को बेदखल करना!

विशेषज्ञों से बात करने पर तो एकदम अलग ही तस्वीर उभरती है। वन अधिकार कानून के अध्येयता तुषार दास बेदखली की इस कार्यवाही को 28 फरवरी 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के उल्लंघन के रूप में देखते हैं।

बेदखली की इस घटना को ‘फॉरेस्ट राइट्स एलायंस जम्मू कश्मीर कैम्पेन’ से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. शेख गुलाम रसूल भी गैर-कानूनी मानते हैं। उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने हालांकि इस कार्यवाही के पीछे जम्मू-हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन बताया लेकिन तब तक यहां सैद्धान्तिक रूप से वन अधिकार कानून, 2006 लागू हो चुका था। यह कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि जंगल पर आश्रित व्यक्तियों या समुदायों को अतिक्रमणकारी नहीं माना जा सकता।

रसूल कहते हैं कि हालांकि बेदखली के इस प्रयास का एक सकारात्मक पक्ष भी रहा। वन विभाग की इस कार्यवाही ने सूबे में वन अधिकार कानून लागू करने के लिए  राजनैतिक माहौल बनाया। क्योंकि लोग गुस्से में थे और सरकार पर दबाव भी बना। इससे जम्मू-कश्मीर प्रशासन को वन अधिकार कानून लागू करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इसके बाद नवंबर 2020 में कानून को लागू किए जाने की आधिकारिक घोषणा हुई और जनवरी 2021 से इसके क्रियान्वयन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल शुरू हुई।

डॉ. शेख कहते हैं कि हालांकि वन विभाग के तेवर सख्त ही हुए हैं, जिसकी वजह है कि भारतीय वन कानून, 1927 की अधिसूचना 18 मार्च 2020 को ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के माध्यम से जारी हो गयी थी और जिससे वन विभाग को ज़्यादा शक्तियां हासिल हो गईं। डॉ. शेख एक नए पहलू पर रोशनी डालते हैं कि यहां रहने वाले समुदाय मूलत: पशुपालक हैं। जिनकी ज़िंदगी जंगलों, पहाड़ों और घास के मैदानों पर टिकी है। घुमंतू होना इनके रोजगार और पेशे की ज़रूरत है और ये सालाना कैलेंडर के हिसाब से अपनी गुजर-बसर करते हैं।

ऐसे में इन्हें अगर जंगलों से बेदखल करने की कार्यवाही हो रही है या क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए इनके घास के मैदानों में ही वृक्षारोपण (प्लांटेशन) किया जा रहा है या इनके पुश्तैनी रास्तों को बंद कर दिया जा रहा है तो इनकी ज़िंदगी चल नहीं पाएगी। लेकिन हो यही रहा है। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के मंत्रालय के ई-ग्रीन वॉच पोर्टल के मुताबिक महज़ 2020-21 में ही जम्मू-कश्मीर में 533.18 लाख रुपयों की राशि भेजी गयी जिसके तहत 8027 हेक्टेयर ज़मीन 38 लोकेशन पर क्षतिपूर्ति वनीकरण का काम शुरू हुआ।

कानूनों के विरोधाभास और वन विभाग की बढ़ी शक्तियां  

वन अधिकार कानून के अध्येयता तुषार दास का कहना है कि वन अधिकार कानून, 2006 के ऊपर भारतीय वन कानून, 1927 को प्राथमिकता देना और उसे लागू किया जाना समुदायों के हक़-हुकुकों पर नकारात्मक असर डालेगा। उनका मानना है कि ये दोनों कानून अपनी अवधारणा व उद्देश्यों में परस्पर विरोधाभासी हैं। वन अधिकार कानून केवल भूतलक्षी (रेट्रोस्पेक्टिव) या अतीत की ऐतिहासिक गलतियों को ही दुरुस्त नहीं करता बल्कि लागू होने के बाद से यह भावी (प्रोस्पेक्टिव) गलतियों को होने से बचाता भी है। 

2011 की जनगणना के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में 11.9 प्रतिशत आबादी शामिल है। ये मूलत: मुसलमान हैं जो कई पीढ़ियों से पशुपालक हैं। इन्हें उम्मीद थी और है कि जंगलों और घास के मैदानों के साथ इनके रिहायश और पहाड़ों के ऊपर बने अस्थायी डेरों (कोठों) पर इन्हें पूरे अधिकार मिल जाएंगे और कोई शुल्क नहीं देना होगा। जंगलात विभाग द्वारा जबरन वसूली और रोक-टोक से भी राहत मिलेगी।

हालांकि इन 18 महीनों में इसके उलट होते हुए देखकर इनकी उम्मीदें कमजोर पड़ी हैं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि भारतीय वन कानून, 1927 को जिस स्वरूप में लागू किया गया है वो उचित नहीं है बल्कि इससे वन अधिकार कानून, 2006 की मूल भावना को ठेस पहुंचती है। एडवोकेट अनिल गर्ग, 18 मार्च 2020 की गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना पर ही सवाल उठाते हैं जिसके मार्फत जम्मू-कश्मीर में भारतीय वन कानून,1927 को लागू किया गया। भारतीय वन कानून, 1927 संविधान की समवर्ती सूची में है जिसमें संशोधनों के अधिकार राज्यों को हैं।

लगभग सारे राज्यों की विधायिका ने 1965 के बाद से अपनी जरूरत के हिसाब से इसमें परिवर्तन कर लिया है पर जम्मू-कश्मीर में यह अपने मूल रूप में लागू की जा रही है। अनिल गर्ग कहते हैं कि संशोधन कर के इस कानून को जम्मू-कश्मीर में लागू कर दिया गया। इन संशोधनों को समुदायों के हितों और वन अधिकार कानून, 2006 से मिले कानूनी संरक्षण के खिलाफ हैं।

जैसे इस कानून की धारा 20 में जोड़ी गई अतिरिक्त धारा को लेकर इनका कहना है कि इसके तहत किसी सीमांकित वन को आरक्षित (रिज़र्व) वन मान लिया जाना सामुदायिक हितों के खिलाफ है। वो बताते हैं कि बाकी राज्यों में इसके लिए कानून में ही एक चरणबद्ध प्रक्रिया दी गयी है। यह समुदायों के परंपरागत अधिकारों को दर्ज़ किए बिना संभव नहीं है।

इस एक धारा पर ही ज़ोर देते हुए वो आगे बताते हैं कि पूरे देश में इसी एक धारा की वजह से जंगलों पर आश्रित समुदायों को ऐतिहासिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा है जिसका इज़हार खुद भारत की संसद ने वन अधिकार कानून की प्रस्तावना में किया है। तुषार दास का मानना है कि ऐसे ही तकरीबन 30 विशेष संशोधनों के साथ भारतीय वन कानून, 1927 को यहां लागू किया गया है। इन संशोधनों के माध्यम से वन विभाग और उसकी नौकरशाही को अतिरिक्त शक्तियां प्रदान की गईं हैं।

यह विडंबना ही है कि मार्च, 2019 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे ही संशोधन करने के प्रयास किए जिसकी काफी मुखालफत हुई। आखिरकार सरकार को इस मसौदे को वापस लेना पड़ा। लेकिन जम्मू-कश्मीर में इन्हें अमल में लाया जा रहा है विशेष रूप से वन अपराधों से जुड़ी तमाम धाराएं स्थानीय समुदायों को फिर से अतिक्रमणकारी साबित कर सकती हैं। जैसे वन विभाग को ही वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लिए ‘नोडल एजेंसी’ बनाया जाना। इससे परिस्थितियां न केवल जटिल हो जाएंगीं बल्कि मंत्रालयों के बीच काम के विभाजन को लेकर तय हुए नियम का उल्लंघन भी होगा।

मूल रूप में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लिए नोडल एजेंसी जनजाति कार्य मंत्रालय होता है। ऐसा करने के पीछे के तर्क था कि वन विभाग की औपनिवेशिक संरचना और कार्य-पद्धति सामुदायिक अधिकारों को तवज्जो नहीं देती। पर जम्मू-कश्मीर में यही हो रहा है। जम्मू-कश्मीर में इसे यह कहकर लागू किया जा रहा है कि जनजाति कल्याण विभाग में पर्याप्त कार्य-बल नहीं है, जावेद राही बताते हैं। लेकिन यह व्यवस्था न तो कानून सम्मत है और न ही इससे वन अधिकार कानून के मूल मकसद हासिल होंगे।

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