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आर्थिक मंदी / अर्थव्यवस्था की सेहत खराब, क्यों बनी ये स्थिति?

सरकारी बैंक एसबीआई ने हाल ही में ये कहकर हैरान कर दिया कि अर्थव्यवस्था की विकास दर दूसरी तिमाही में गिरकर 4.2 फीसदी रह जाएगी। मूडीज की रिपोर्ट के बाद यह सोचने वाली बात इसलिए भी है कि एक ओर जहां सरकार अर्थव्यवस्था को नहीं संभाल पा रही है। दूसरी एसबीआई ये रिपोर्ट जारी कर उस ओर इंगित कर रहा है जिस ओर देश में मंदी दस्तक दे रही है?

अधिकारियों के खराब रवैए और बेहतर सुविधाएं न देने के बावजूद एसबीआई की ये रिपोर्ट इसलिए भी मायने रखती है कि वो एक सरकारी बैंक है। जिसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि, ‘इस साल की दूसरी तिमाही में जीडीपी की विकास दर 4.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है और अगले वित्त वर्ष के लिए विकास दर का अनुमान भी 6.1 सेटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है।’

क्यों बन रही है ये स्थिति

बैंकिंग क्षेत्र से विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल इकॉनामिक स्लोडाउन, लो ऑटो सेल्स, कंस्ट्रक्शन और इन्फ्रास्ट्रक्चर में इनवेस्टमेंट की कमी, कोर सेक्टर में ग्रोथ की गिरावट और एयर ट्रैफिक मूवमेंट में कमी के कारण ये स्थिति पैदा हो रही है।

एसबीआई रिपोर्ट से साफ है कि पिछले दो महीनों में अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए जो बड़े फैसले सरकार ने किये उनका जमीन पर कोई कारगर असर होता नहीं दिख रहा है और केंद्र सरकार को अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए नए सिरे से और बड़े फैसले लेने होंगे।

कब से सुनी जा रही है मंदी का आहट

आर्थिक मंदी का आहट दुनियाभर में है। भारत में भी लोगों की परचेजिंग पॉवर घट रही है। कंपनियों ने लागत घटाने के लिए छंटनी का सहारा लेना शुरू कर दिया। देश का ऑटो सेक्टर रिवर्स गियर में चला गया है। जुलाई 2019 में कार और बाइक की बिक्री में 31 फीसदी की गिरावट आई है। इसके चलते ऑटो सेक्टर से जुड़े साढ़े तीन लाख से ज्यादा कर्मचारियों की नौकरी चली गई। इतना ही नहीं करीब 10 लाख लोगों की नौकरियां खतरे में हैं। कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल सेक्टर) की भी हालत खराब है।

बात सन् 1991 और 2008 की

आजादी के बाद से भारत को प्रमुख रूप से दो बार आर्थिक मंदी से झटका लगा है. यह साल थे साल 1991 और 2008 साल 1991 में आई आर्थिक मंदी के पीछे आंतरिक कारण थे। लेकिन 2008 में वैश्विक मंदी के चलते भारत की अर्थव्यस्था पर आंच आई थी। 1991 में भारत के आर्थिक संकट में फंसने की सबसे बड़ी वजह भुगतान संकट था. इस दौरान आयात में भारी कमी आई थी, जिससे देश दोतरफा घाटे में था।

उस समय देश का व्यापार संतुलन गड़बड़ा चुका था। सरकार बड़े राजकोषीय घाटे पर चल रही थी। खाड़ी युद्ध में 1990 के अंत तक, स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल से तीन सप्ताह के आयात लायक बचा था। सरकार कर्ज चुकाने में असमर्थ थी। विदेशी मुद्रा भंडार घटने से रुपए में तेज गिरावट आई जिससे घाटे का संकट बढ़ गया। पूर्व प्रधानंत्री चंद्रशेखर की सरकार फरवरी 1991 बजट पेश नहीं कर सकी। इसी दौरान अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत को डाउनग्रेड कर दिया था। कई वैश्विक क्रेडिट-रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत को डाउनग्रेड कर दिया। विश्व बैंक और आईएमएफ ने भी अपनी सहायता रोक दी, जिससे सरकार को भुगतान पर चूक से बचने के लिए देश के सोने को गिरवी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

1991 में आए आर्थिक संकट की मुख्य वजह रुपए की कीमत तेजी से घटना, देश का बढ़ता चालू खाता घाटा, निवेशकों का भारत के प्रति घटता भरोसा और रुपए की विनिमय दर में कमी थी। 1980 के दशक के अंत तक, भारत गंभीर आर्थिक संकट में था। तो वहीं, एक दशक बाद 2008 में आई आर्थिक मंदी से भारत की अर्थव्यस्था को उतना नुकसान नही झेलना पड़ा था जितना अन्य देशों के अर्थव्यवस्थाओं को झेलना पड़ा था। 2008 की मंदी के दौरान भारत का व्यापार वैश्विक जगत के साथ व्यापार काफी घट गया था। आर्थिक ग्रोथ घटकर 6 फीसदी से नीचे चली गई थी।

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