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किसान आंदोलन / ‘अधर’ में संवाद, सरकार की ‘मनमानी’ और किसानों का ‘धरना’

  • डॉ. वेदप्रताप वैदिक।

सरकार और किसानों का आठवां संवाद भी निष्फल रहा। इस संवाद के दौरान ज़रा साफगोई भी हुई और कटुता भी बढ़ी। थोड़ी देर के लिए बातचीत रुक भी गई। सरकार के मंत्रियों और किसान नेताओं ने अपनी-अपनी स्थिति का बयान दो-टूक शब्दों में कर दिया।

सरकार ने कह दिया कि वह तीनों कानून वापस नहीं लेगी और किसानों ने कह दिया कि यदि कानून वापस नहीं होंगे तो किसान भी वापस नहीं जाएंगे। धरने पर डटे रहेंगे। बल्कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में एक लाख ट्रेक्टरों की परेड करेंगे। किसानों ने इन कानूनों में संशोधन के लिए एक संयुक्त कमेटी के सरकारी प्रस्ताव को भी रद्द कर दिया है।

जितना समय बीतता जा रहा है, हरियाणा और पंजाब के इन किसानों की तकलीफें बढ़ती जा रही हैं। भयंकर ठंड में किसानों की मौत की खबरें रोज आ रही हैं। लेकिन उन्होंने अहिंसक सत्याग्रह का अनुपम उदाहरण पेश किया है। संतोष का विषय है कि इन दोनों प्रांतों के किसान काफी मालदार और दमदार हैं।

उन्होंने धरनाधारी किसानों, आढ़तियों और अपने मजदूरों के लिए दिल्ली की सीमा पर क्या-क्या सुविधाएं नहीं जुटाई हैं। यदि उन्हें यहां कुछ माह तक और टिकना पड़ेगा तो वे टिक पाएंगे। वे यदि इसी तरह से शांतिपूर्वक टिक रहते हैं तो टिके रहें। दो-चार माह में तंग आकर वे अपने आप लौट जाएंगे।

लेकिन यदि उन्होंने रास्ते रोके, तोड़-फोड़ की और यदि वे हिंसा पर उतारु हो गए तो सरकार को मजबूरन सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी। वैसी हालत में किसानों की जायज़ मांगें भी हवा में उड़ जाएंगी और जनता के बीच उनके प्रति जो थोड़ी-बहुत आत्मीयता दिखाई पड़ रही है, वह भी खत्म हो जाएगी।

इस कानून को बनाते वक्त सरकार ने जो लापरवाही बरती थी, वह भी जनता की नज़रों से ओझल हो जाएगी। कुछ किसान नेताओं का यह अहंकार कि वे संसद को भी अपने चरणों में झुकाकर रहेंगे, उन्हें काफी भारी पड़ सकता है। अब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आने-Dवाले फैसले को भी मानने से मना कर दिया है तो इसका अर्थ क्या है? अदालत में कौन गया है? सरकार या किसान? खुद किसान नेता गए हैं।

इसके बावजूद किसान नेता सरकार पर तोहमत लगा रहे हैं कि वह अदालत के जरिए किसानों को दबाना चाहती है। मुट्ठी भर किसान नेताओं का यह अहंकार और दुराग्रह देश के अन्नदाताओं को नुकसान पहुंचाए बिना नहीं रहेगा। उन्हें संयम और विवेक से काम लेना होगा।

देश के ज्यादातर गरीब और साधनहीन किसान दिल्ली में चल रही इन मालदार किसान नेताओं की इस नौटंकी पर हतप्रभ हैं। देश के 94 प्रतिशत गरीब किसानों की हालत सुधरे और हमारी खेती 4-6 गुना ज्यादा उत्पादन करे, इस लक्ष्य पर सरकार और किसानों को आज गहरा संवाद करने की जरुरत है।

गौर किया जाए तो आठवें दौर की बातचीत में जो कटुता बढ़ी है, वह दोनों पक्षों के आचरण में भी उतर आई है। करनाल और जालंधर जैसे शहरों से अब किसानों और पुलिस की मुठभेड़ की खबरें आने लगी हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि दिल्ली पर डटे हुए किसान संगठनों का भी धैर्य अब टूट जाए और वे भी तोड़-फोड़ पर उतारु हो जाएं।

यह अच्छा ही हुआ कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने करनाल के एक गांव में आयोजित किसानों की महापंचायत के जलसे को स्थगित कर दिया। यदि वे जलसा करने पर अड़े रहते तो निश्चय ही पुलिस को गोलियां चलानी पड़तीं, किसान संगठन भी परस्पर विरोधियों पर हमला करते और भयंकर रक्तपात होता। लेकिन किसान संगठनों ने भी कोई कमी नहीं रखी। उन्होंने सभा-स्थल पर लगाए गए बेरिकेड तोड़ दिए, मंच को तहस-नहस कर दिया और जिस हेलीपेड पर मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर उतरना था, उसे ध्वस्त कर दिया।

किसान नेता इस बात पर अपना सीना जरुर फुला सकते हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री को मार भगाया लेकिन वे यह क्यों नहीं समझते कि सरकार के पास उनसे कहीं ज्यादा ताकत है। यदि खट्टर की जगह कोई और मुख्यमंत्री होता तो पता नहीं आज हरयाणा का क्या हाल होता? करनाल में किसानों के नाम पर किन्हीं भी तत्वों ने जो कुछ किया, क्या उसे किसानों के हित में माना जाएगा? मुश्किल ही है।

क्योंकि अभी तक किसानों का आंदोलन गांधीवादी शैली में अहिंसक और अनुशासित रहा है और उसने नेताओं को भी आदर्श व्यवहार सिखाया है लेकिन अब यदि ऐसी मुठभेड़ें बढ़ती गईं तो किसानों की छवि बिगड़ती चली जाएगी। यदि किसान नेता अपने धरनों और वार्ता के जरिए अपना पक्ष पेश कर रहे हैं तो उन्हें चाहिए कि वे सरकार को भी अपना पक्ष पेश करने दें। लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष को अपनी बात कहने की समान छूट होनी चाहिए।

यह स्वाभाविक है कि कड़ाके की ठंड, आए दिन होनेवाली मौतों और आत्महत्याओं के कारण किसानों की बेचैनी बढ़ रही है लेकिन बातचीत के जरिए ही रास्ता निकालना ठीक है। यह समझ में नहीं आता कि सरकार भी क्यों अड़ी हुई है? या तो रास्ता निकलने तक वह कानून को स्थगित क्यों नहीं कर देती या राज्यों को उसे लागू करने की छूट वह क्यों नहीं दे देती?

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