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मुद्दा / 18 साल की वो लड़की जो ट्रेन के जनरल कोच से कभी नहीं उतरेगी!

देश में सवा सौ करोड़ जनता है। भीड़ बढ़ रही है। कोई गुम हो रहा है। कोई मर रहा है। 30 मई, 2019 ये वो तारीख है जब ढलती शाम में राष्ट्रपति भवन के बाहर मोदी सरकार 2.0 का शपथग्रहण समारोह चल रहा था, उस समय भीड़ बहुत थी। ये भीड़ आम नहीं थी, लेकिन जब समारोह खत्म होता है, तो हिंदी सिनेमा की मशहूर गायिका आशा भोसले भटक जाती हैं और उन्हें केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भीड़ से अलग ले जाती है।

देश में भीड़ बढ़ रही है। राजनेताओं के लिए ये वोट बैंक हैं तो आम आदमी के लिए मुसीबत। प्रधानमंत्री सवा सौ करोड़ लोगों के विश्वास को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं, यह कोशिश किस हद तक सही है, देश का आम आदमी नहीं जानता, लेकिन वो इतना जरूर जानता है। यह भीड़ कैसे होती है? बैंक की लाइन में हाथ में पैसा लिए लोग तो मोहल्ले के सार्वजनिक नल के पास खाली बाल्टी लिए खड़े लोग बेहतर जानते हैं, वैसे यह भीड़ उतनी खतरनाक नहीं जितनी भारतीय रेल के जनरल कोच की भीड़ होती है।

भविष्य में होगी बुलेट ट्रेन

हालही में एक खबर आई कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके से ट्रेन में सफर कर रही एक 18 साल की लड़की की जनरल कोच में मौत हो गई। वजह ट्रेन के जनरल कोच में भीड़ का अधिक होना बताया गया। इस वजह से लड़की का चलती ट्रेन में दम घुट गया और उसकी मौत हो गई। यहां यह बात जरूर ध्यान रखें कि हम भविष्य में बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहे हैं? लेकिन वास्तविकता कुछ अलग है। रेल यात्रियों के लिए भारतीय रेल के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं।

कहां जा रही थी वो लड़की

बांदा ज़िले से 18 साल की सीता अपने पिता राम प्रकाश अहिरवार और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ दिल्ली जा रही थी। वो बांदा से यूपी संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में सवार हुई थी, यह यात्रा उसकी आखिरी यात्रा बन गई, ऐसी कई घटनाएं भारतीय रेल के जनरल कोच में होती हैं। कुछ पता चलती हैं, कुछ भीड़ में खो जाती हैं। समाधान जरूरी है, निराकरण सरकार करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ ओर ही होती हैं।

सिस्टम इस बारे में नहीं सोचता

उत्तर मध्य रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ‘अगर ट्रेन में जनरल कोच की संख्या बड़ा दी जाए तो इस तरह की समस्या का सामना कम करना पड़ेगा। अभी एक ट्रेन में अमूमन 2 या 3 जनरल कोच होते हैं। हालांकि ये संभव है, लेकिन सिस्टम इस बारे में सोचता नहीं।’ गौर करने वाली बात यह भी है कि भारतीय रेल एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क और एकल सरकारी स्वामित्व वाला विश्व का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है।

याद हैं ना पिछले साल का रेलमंत्री का बयान

ठीक एक साल पहले रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था, ‘रेल व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सभी यात्री ट्रेनों में 22 कोच होंगे, प्लैटफॉर्म्स की लंबाई को बढ़ाया जाएगा और अन्य बदलाव भी किए जाएंगे। इंजिनियरिंग विभाग इस पर काम कर रहा है।’ अभी भारतीय ट्रेनों में दो तरह के कोच होते हैं ICF और LHBI डिमांड के मुताबिक ट्रेनों में अभी 12, 16, 18, 22 और 26 कोच होते हैं जिस कारण रेलवे किसी ट्रेन के लेट होने पर किसी और खड़ी ट्रेन को उसके नाम से नहीं चला पाती और मुख्य ट्रेन का आने का ही इंतजार करना पड़ता है। लेकिन उस समय भी यात्री रेल में जनरल कोच की संख्या बढ़ाने को लेकर रेल मंत्री ने कुछ नहीं कहा था।

एडजेस्टमेंट में जी रहे हैं हम

पेशे से बिजनेसमेन गौरव देश भर की यात्रा करते हैं वो कभी स्लीपर कोच तो कभी जनरल कोच में सफर करते हैं। वो बताते हैं, ‘भारतीय रेलवे की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब हम जनरल कोच में बैठते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि हम और हमारा भारत किस स्थिति में जी रहा। आजादी के कई साल बाद भी हम रेल यात्रा के दौरान एडजेस्टमेंट में जी रहे हैं। जो गरीब आदमी है वो स्लीपर का टिकट नहीं ले सकता है ऐसे में जनरल डिब्बे की न केवल संख्या में इजाफा करना चाहिए बल्कि लंबी दूरी तक चलने वाली ट्रेन में सफाई की व्यवस्था नियमित होना चाहिए।’

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