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मध्यस्थता / हांगकांग में चीनी राग, भारत का क्या होगा नुकसान

  • डॉ. वेदप्रताप वैदिक।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत और चीन के सीमा-विवाद में मध्यस्थता करने के लिए उतावले हो रहे थे और अब वे हांगकांग को लेकर चीन से भिड़ गए हैं। कोरोना को लेकर चीन और उसके चहते विश्व स्वास्थ्य संगठन से ट्रंप पहले दो-दो हाथ कर चुके हैं, अब उन्होंने हांगकांग को लेकर ऐसी धमकी दे दी है कि अमेरिका और चीन के बीच शीत युद्ध की शुरुआत तो हो ही गयी है, इससे भारत को भी काफी नुकसान होने की संभावना है।

हांगकांग के साथ भारत का व्यापार लगभग 31 अरब डालर का है और लगभग 40 हजार भारतीय वहां वर्षों से रहते हैं। चीन और हांगकांग के बीच तनाव का मुख्य कारण चीनी सरकार का वह नया कानून है, जिसके अंतर्गत हांगकांग के अपराधियों को चीन को सौंपना पड़ेगा।

ऐसा क्यों? तो वो इसलिए कि चीन समझता है कि हांगकांग उसका हिस्सा है जबकि हांगकांग मानता है कि उसकी बहुसंख्या चीनी जरुर है लेकिन वह चीन के अन्य प्रांतों की तरह चीन का प्रांत नहीं है, क्योंकि जब 1997 में वह ब्रिटेन के डेढ़ सौ साल के राज से मुक्त हुआ तो इस शर्त पर कि ‘एक देश और दो व्यवस्थाएं’ चलेंगी याने वह चीन के साथ रहते हुए भी स्वायत्त रहेगा।

यह व्यवस्था 2047 तक चलेगी लेकिन अब चीन हांगकांग को अपने प्रांतों की तरह अपने आधीन बनाने पर तुला हुआ है। चीन की इस कार्रवाई को लेकर हांगकांग में जबर्दस्त जन-आंदोलन खड़ा हो गया है। लाखों लोग इन अहिंसक प्रदर्शनों में सड़क पर उतर आए हैं। यदि चीनी सरकार ने हांगकांग को अपने कब्जे में ले लिया तो अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने उसे जो विशेष दर्जा दे रखा है, उसे वे रद्द कर देंगे।

इससे हांगकांग की अर्थव्यवस्था ही चौपट नहीं हो जाएगी बल्कि वहां रहने वाले हजारों गैर-चीनी लोग भाग खड़े होंगे। भारत और अमेरिका के वीजा-इच्छुकों की लंबी कतारें लगनी अभी से शुरु हो गई हैं। जाहिर है कि इस विवाद में भारत किसी भी देश के साथ उलझना नहीं चाहेगा लेकिन यह भी शक है कि इन दिनों कोरोना की अंतरराष्ट्रीय बदनामी और अपनी अंदरुनी मुसीबतों से चीनी लोगों का ध्यान हटाने के लिए चीन ने हांगकांग और भारत-चीन सीमा-विवाद का नया राग छेड़ दिया हो।

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