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सौर ऊर्जा / गुजरात के वो किसान जो सूर्य की रोशनी से बन रहे धनवान, लेकिन कैसे?

सोलर पैनल के नीचे कुछ किसान खेती भी करते हैं। तस्वीर- अतहर परवेज
– अतहर परवेज।
  • गुजरात के ढुंडी गांव में ग्रामीणों ने फसल की सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करना शुरू किया है। सिंचाई के बाद बची ऊर्जा को मध्य गुजरात बिजली कंपनी को बेचकर ग्रामीण पैसा भी कमा रहे हैं।
  • बिजली कंपनी और किसानों के बीच हुए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) के तहत यह संभव हुआ है। किसानो ने कृषि कार्य के लिए 25 वर्ष तक सिर्फ सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करने का अनुबंध किया है। इस अनुबंध के तहत सौर ऊर्जा से बची हुई बिजली कंपनी खरीद लेगी।
  • इस तरह के अनुबंध से पर्यावरण को काफी फायदा हो सकता है। जानकार मानते हैं कि बिजली का समुचित इस्तेमाल करने से किसानो को सीधे फायदा होगा और इससे भूजल का दोहन भी कम होगा।
  • भारत में वर्ष 1951 में कृषि कार्य के लिए बिजली से चलने वाले करीब 5000 पंप थे। वर्तमान में ऐसे पंप की संख्या 2 करोड़ 50 लाख के करीब है।

सूरज की रोशनी ढुंडी गांव के लिए नया सवेरा लेकर आया है। गुजरात के खेड़ा जिला स्थित इस गांव में महज तीन साल पहले तक बिजली का ग्रीड नहीं था। सिंचाई के लिए किसान डीजल से चलने वाले पंप पर आश्रित थे। धुएं और शोर से निजात के लिए गांव के लोग बिजली बाट की जोह रहे थे। बिजली तो नहीं आई लेकिन गांव में सिंचाई के लिए ऊर्जा का स्रोत बना सूरज। इस सौर ऊर्जा के जरिए ग्रामीण न सिर्फ आत्मनिर्भर बने, बल्कि कंपनी को बिजली बेचना भी शुरू कर दिया। 

इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (आईडब्लूएमआई) और सर रतन टाटा ट्रस्ट के साथ आईडब्लूएमआई- टाटा वाटर पॉलिसी रिसर्च प्रोग्राम (आईटीपी) जैसी संस्थाओं के साझा प्रयास की वजह से ढुंडी गांव के लोगों ने सौर ऊर्जा का इस्तेमाल शुरू किया। तीन-चार साल पहले तक गांव में डीजल से चलने वाले करीब पचास पंप थे। पर अब स्थिति बदल गई है, कहते हैं राहुल राठौड़ जो आईडब्लूएमआई के सलाहकार हैं।

राहुल बताते हैं कि किसानों को अब डीजल पंप के शोर से निजात मिल चुकी है। पंप से निकलने वाले धुएं का भी सामना नहीं करना पड़ता। पंप चलाने के बाद जो बिजली बचती है उसे गांव के लोग बिजली कंपनी को बेच भी रहे हैं। अनुबंध के मुताबिक मध्य गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (एमजीवीसीएल) इस्तेमाल के बाद बची हुई बिजली खरीद लेती है जो ग्रामीणों ने सौर ऊर्जा से बनाई है। किसानों को इस तरह दो तरीके फायदा हो जाता है। एक तो पंप चलाने में डीजल इत्यादि पर खर्च नहीं करना पड़ता। दूसरे, बिजली बेचकर भी कुछ आमदनी हो जाती है।

ढुंडी निवासी चंपा बेन बताती हैं कि आज हमारे गांव में डीजल जेनरेटर की आवाज नहीं आती। इस शोर से हमें आजादी मिली है जो हमारे लिए काफी सुखद बदलाव है।

 पर्यावरण के हित में है यह आमदनी

गांव के नौ किसानो के सहकारिता समूह सोलर पंप इरिगेटर्स कॉपरेटिव एंटरप्राइज (एसपीआईसीई) से इस सबकी शुरुआत होती है। इसे गांव में ढुंडी सौर उर्जा उत्पादक सहकारी मंडली के नाम से जानते हैं। इस समूह का काम बिजली कंपनी और बिजली उत्पादक किसानो के बीच समन्वय स्थापित करना है।

एमजीनीसीएल ने ऐसे मीटर लगाए हैं जिससे किसानों द्वारा कंपनी को दिए ऊर्जा का हिसाब-किताब रखा जा सके। गांव के बाहर निकलने वाली बिजली की जानकारी एक मुख्य मीटर के जरिए की जाती है। इसकी मदद से पूरे गांव द्वारा पैदा की गई बिजली का पैसा गांव में एक मुश्त भेजा जाता है। गांव के लोग अपने-अपने मीटर के मुताबिक उस पैसे को आपस में बांट लेते हैं।

ढुंडी में चल रहे सहकारिता समूह को देश में अपने आप में अनोखा माना जा रहा है। समूह के नौ सदस्यो ने बिजली कंपनी के साथ अनुबंध किया है जिसके मुताबिक वे अगले 15 वर्षों तक 4.63 रुपए प्रति किलोवाट की दर से कंपनी को बिजली सप्लाई करेंगे।

हालांकि, ग्रामीणों को 7.13 रुपए प्रति किलोवाट की कीमत मिलती है। इसमें 1.25 रुपया हरित ऊर्जा के लिए और 1.25 रुपया जल संरक्षण के लिए बोनस के तौर पर दिया जाता है। इस अनुबंध की एक शर्त यह कहती है कि किसान अगले 25 वर्षों तक सिंचाई के लिए बिजली कंपनी से कनेक्शन नहीं लेंगे।

आईडब्लूएमआई के सीनियर फेलो तुशार शाह कहते हैं कि आईटीपी ने किसान के साथ सौर ऊर्जा के उपलब्ध संसाधनों के बारे में चर्चा की। किसानों को आशंका थी कि सूरज की रोशनी से चलने वाले पंप सिंचाई के मामले में कारगर होंगे या नहीं। किसानों को बताया गया कि सौर ऊर्जा से न सिर्फ सिंचाई हो सकती है, बल्कि उन्हें बिजली बचाने के एवज में पैसा भी दिया जाएगा। 

किसानो ने बिजली उत्पादन के लिए सौर ऊर्जा के संयंत्र खरीदने के लिए पांच-पांच हजार रुपए की राशि जमा की। जनवरी 2016 में यह कार्यक्रम शुरू हुआ। सौर ऊर्जा के संयंत्र को बिजली विभाग के ग्रीड से जोड़ने में तीन महीने का समय लगा।

शाह बताते हैं कि जब यह संयंत्र चल पड़ा है तो हर किसी का संदेह खत्म हो गया। इस समूह से चार और किसान जुड़ गए हैं। प्रमा का कहना है कि इस समूह से जुड़े प्रवीण भाई प्रमा बताते हैं कि उनके पास एक एकड़ जमीन है। वह काफी समय से एक गाय खरीदना चाह रहे थे, लेकिन पैसों की कमी की वजह से यह संभव नहीं हो पा रहा था।

बिजली बेचने से एक साल में ही गाय खरीदने का मेरा सपना पूरा हो गया। एक साल में मैंने 90 हजार रुपए की बिजली बेची है। अब गाय का दूध भी बेच रहा हूं। गांव के दूसरे किसान उदय भाई कहते हैं कि पहले दो बीघा (एक बीघा यानी 1.7 एकड़ जमीन) सिंचाई के लिए 250 रुपए खर्च करने होते थे।

शाह के मुताबिक आईडब्लूएमआई को दूसरे गांव के किसान भी इस तरह का संयंत्र लगाने की गुजारिश कर रहे हैं। “किसान मानते हैं कि सौर ऊर्जा से बिजली बनाने में न खाद-बीज का खर्च है, न ही कीट लगने का खर्चा,” शाह कहते हैं।

सौर पंप है समय की जरूरत

देश में 1951 में ऊर्जा से चलने पंप की संख्या 5000 के करीब थी। आज के समय में यह संख्या 2.5 करोड़ के करीब है। भारत सरकार ने बिजली से चलने वाले पंप के लिए किसानो को काफी सब्सिडी उपलब्ध कराई है। अब सरकारों का रुझान सोलर पंप की तरफ है।

 गुजरात सरकार ने सूर्यशक्ति किसान योजना (एसकेवाई) के तहत लाखों किसानों को मदद की योजना बनायी है। वहीं केंद्र सरकार ने किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाअभियान (कुसुम) योजना के तहत 20 लाख से अधिक किसानो को सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप प्रदान करने की योजना की शुरुआत की है। दोनों योजनाओं में किसान को सौर ऊर्जा बिजली बेचने की सुविधा दी जाएगी।

शाह का कहना है कि किसानों को बिजली बेचने की सुविधा देने से ने सिर्फ ऊर्जा की बचत होगी, बल्कि भूजल का दोहन भी कम होगा। किसान ऊर्जा का कम से कम इस्तेमाल करना चाहेगा, ताकि अधिक से अधिक बचत कर लाभ कमा सके। इस समय भारत सरकार हर साल 70 हजार करोड़ रुपए सिंचाई के लिए बिजली और पंप सब्सिडी पर खर्च कर रही है। अगर सौर ऊर्जा से किसानो को जोड़ दिया गया तो वर्ष 2022 तक वैकल्पिक स्रोत से 100 गीगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य पूरा किया जा सकता है।

सोलर पंप की बढ़ती संख्या को देखकर कुछ जानकार भूजल के अतिरिक्त दोहन की चिंता जता रहे हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ रिसोर्स एनालिसिस एंड पॉलिसी में वर्ष 2017 में प्रकाशित एक शोधपत्र के मुताबिक यह कदम अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती है। सोलर पैनल अभी काफी महंगे हैं और तकनीक उन्नत होने तक सरकार को इंतजार करना चाहिए। इस तरह के कार्यक्रम में काफी पैसा खर्च होगा, और एकबार कार्यक्रम शुरू हो गया तो सरकार के लिए पीछे हटना मुश्किल होगा। सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से भूजल का दोहन भी बढ़ेगा।

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