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राष्ट्रीय संकट / हर तरफ चीत्कार, ये रणनीति हो सकती है ‘जीवन रक्षक’

भारत में कोरोना महामारी की गिरफ्त में जनता बेबस और लाचार है। सांसद, विधायक और पार्षद जिन्हें मदद करनी चाहिए वो ज्यादातर नदारद हैं। कोरोना के कारण अपनों से बिछड़ते या उन्हें इस महामारी में स्वस्थ्य करने की जद्दोजहद में लोग परेशान हैं, उनकी मदद सरकार के उन नुमाइंदो को करना चाहिए थी जिनको मतदान कर उन्होंने चुना लेकिन ये काम ज्यादातर एनजीओ और स्वयंसेवी संस्थाएं कर रही हैं।

दिल्ली हो या मुंबई, भोपाल हो या लखनऊ हर तरफ चेहरे पर ग़म और आंखों में आंसू हैं। सुनने वाला कोई नहीं, ये हाल दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों का है छोटे शहरों और कस्बों की क्या स्थिति है आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। मध्यप्रदेश में इन दिनों जोर-शोर से अस्थायी कोरोना शिविर बनाए जा रहे हैं। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यदि समय रहते कोरोना महामारी की भयावह दशा की स्थिति भांप सकते तो शायद उन्हें प्यास लगने पर कुआं खोदने वाली स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता, बहरहाल प्रदेश में स्थिति को स्थिर बनाए रखने के हर संभव कोशिश की जा रही है।

उत्तरप्रदेश की स्थिति मप्र से थोड़ी अलग है क्योंकि यहां असुविधाओं का अंबार लगा हुआ है प्रशासन खास तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी नाकामी से झल्लाए हुए हैं वह सिस्टम पर सवाल उठाने वाले हर उस व्यक्ति को जेल का भय दिखाकर चुप कराने की पूरी कोशिश में हैं, जो वहां चिताओं की आग देखकर सवाल पूछ रहा है।

मौजूदा हालात बेहद गंभीर है। दुनिया से भारत को मदद मिलना शुरू हो गई है लेकिन यह मदद ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन की कम भारत में कोरोना मरीजों की मौत का एक बड़ा कारण है। यह बात दिल्ली एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया भी मानते हैं।

जीवन रक्षक साबित हो सकती है ये रणनीति

इंडियन एक्सप्रेस के दिए एक साक्षात्कार में डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि देश में बीते नौ दिनों से लगातार संक्रमण के तीन लाख से अधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए हम ट्राइगेजिंग नाम की एक रणनीति पर काम कर रहे हैं। जैसे कि अगर किसी मरीज की स्थिति बेहतर है और उसे ऑक्सीजन सिलिंडर की जरूरत नहीं है तो उसे बिना ऑक्सीजन वाले बेड में शिफ्ट किया जाए और उसे निगरानी में रखा जाए। अस्पताल को दो हिस्सों में बांटा जाए, पहला उन मरीज़ों के लिए जिन्हें अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत है और दूसरा उन मरीज़ों के लिए जिन्हें कम ऑक्सीजन की ज़रूरत है।

यदि इस रणनीति पर देस के सभी राज्य काम करें तो कोरोना को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे में बेड और ऑक्सीज सिलेंडर की कमी होते हुए भी लोगों की जान बचाई जा सकती है।

वैज्ञानिकों की चेतावनी को मोदी सरकार ने किया नजरअंदाज

समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए चार वैज्ञानिकों ने कहा कि चेतावनी के बावजूद केंद्र सरकार ने वायरस के फैलाव को रोकने के लिए बड़े स्तर पर प्रतिबंध नहीं लगाए गए। सरकार की ओर से गठित वैज्ञानिक सलाहकारों के एक फोरम ने मार्च की शुरुआत में भारतीय अधिकारियों को देश में एक नए और ज्यादा संक्रामक वेरिएंट के फैलने की चेतावनी दी थी।

इसके बावजूद, बिना मास्क पहने लाखों लोगों ने धार्मिक आयोजन और राजनीतिक रैलियों में हिस्सा लिया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी नेताओं ने कीं। तो वहीं, प्रधानमंत्री मोदी के कृषि संबंधी बदलावों को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर हज़ारों किसानों ने अपना प्रदर्शन जारी रखा.

डॉ. फाउची ने कहा, ‘बेकाबू हैं हालात, लॉकडाउन है जरूरी’

अमेरिका राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन चिकित्सा सलाहकार और दुनिया के जाने-माने महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर एंथनी फाउची ने भारत में बेकाबू होते कोरोना को रोकने के लिए तुरंत कुछ सप्ताह के लॉकडाउन को जरूरी बताया है।

उन्होने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा कि कोई देश ख़ुद को बंद नहीं करना चाहता लेकिन भारत में तुरंत कुछ हफ्तों का लॉकडाउन संक्रमण के चक्र को तोड़ सकता है। वैक्सीन लगाना एक उपाय हो सकता, ये अत्यंत जरूरी भी है लेकिन ये फिलहाल लोगों की ऑक्सीजन, अस्पताल में भर्ती होने और इलाज की जरूरत की मौजूदा समस्या को कम नहीं करेगा क्योंकि वैक्सीन का असर होने में समय लगता है।

ऐसी विषम परिस्तितियों में एक आयोग या आपात समूह बनाना चाहिए जो ऑक्सीजन प्राप्त करने, अन्य आपूर्तियां करने, मेडिकल उपकरण और दवाइयां प्राप्त करने को लेकर योजना बना सके। इसके लिए अन्य देशों और विश्व स्वास्थ्य संगठन की मदद ली जा सकती है।

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