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रिपोर्ट / जलवायु परिवर्तन के संघर्ष में, ‘लोगों को साथ लेकर चलने की’ कोशिश

विंड टरबाइन की पृष्ठभूमि में तालाब में खेलते बच्चे। भारत ने वर्ष 2030 तक अक्षय ऊर्जा की अपनी क्षमता 450 मेगावाट करने की ठानी है। प्रतीकात्मक चित्र- वेस्तास/याहू/फ्लिकर

कुंदन पांडे।

  • जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नई नीतियां बनाई जा रही हैं। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की बात की जा रही है। इस परिवर्तन में बहुत बड़ी संख्या में लोग भी हाशिये पर जाएंगे। उनका रोजगार छीनेगा, उनकी आजीविका पर असर होगा।
  • जीवाश्म ईंधन से नवीन ऊर्जा की तरफ अर्थव्यवस्था के इस परिवर्तन के नफा-नुकसान का लेखा-जोखा करना जरूरी है ताकि होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके। साथ ही जलवायु परिवर्तन से निपटने के उद्देश्य की तरफ तेजी से बढ़ा जा सके। जस्ट ट्रांजिशन इन्हीं मुद्दों को समेटता हुआ एक विचार है।

एक अनुमान के मुताबिक देश के कुल 718 जिलों में से 120 जिलों में अच्छी-खासी मात्रा में जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) से जुड़े उद्योग हैं। इसमें कोयला खनन से लेकर, तेल और गैस का उत्पादन, ताप विद्युत सयंत्र, रिफाइनरी, स्टील, सीमेंट, खाद (यूरिया) और ऑटोमोबाइल जैसे उद्योग शामिल है। इन जिलों में करीब 33 करोड़ लोग रहते हैं यानी भारत की कुल जनसंख्या की 25 फीसदी आबादी।

विशेषज्ञों की मानें तो जब यह परिवर्तन होगा तो तगड़ा आघात लगेगा। अंग्रेजी में इसे शॉक वैल्यू कहेंगे। अगर सरकारें अभी से इसकी तैयारी नहीं करती हैं तो उनके लिए उस आघात को संभालना मुश्किल होगा। विकसित देशों ने इस परिवर्तन के लिए सालों तैयारी की है।

क्या है जस्ट ट्रांजिशन (जेटी)?

आज के समय की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती है जलवायु परिवर्तन। इसका असर बढ़ता ही जा रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन को कम से कमतर करने की पुरजोर कोशिश हो रही है। ऊर्जा क्षेत्र में भी निरंतर बदलाव हो रहे हैं। जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) जैसे कोयला, पेट्रोल-डीजल इत्यादि पर निर्भरता कम करने की कोशिश हो रही है तो नवीन ऊर्जा के क्षेत्र, जैसे सौर, पवन ऊर्जा इत्यादि को विस्तार देने की कोशिश हो रही है।  

कई देशों में कम कार्बन उत्सर्जन करने वाली ऊर्जा की तरफ परिवर्तन तेजी से हो रहा है। भविष्य में भी इस परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है और भविष्य में अभी और तेजी आने का अनुमान है। इसके लिए कई महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किये हैं। जैसे 2030 तक कुल ऊर्जा खपत में स्वच्छ ऊर्जा (क्लीन एनर्जी) का योगदान 40 फीसदी सुनिश्चित करना।  

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यह जरूरी माना जा रहा है। जैसे पेरिस समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए कोयले पर वैश्विक निर्भरता कम की जानी है। 2020 में कोयले पर वैश्विक निर्भरता 32 फीसदी रही और 2050 तक इसे घटाकर 0.5 फीसदी किया जाना है। इस लक्ष्य को हासिल करने में भारत की महती भूमिका रहने वाली है। क्योंकि भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोग करने वाला देश है। भविष्य में देश की ऊर्जा जरूरतें बढ़नी ही हैं। वर्तमान में कोयले पर देश की निर्भरता कुछ अधिक ही है। करीब 45 फीसदी प्राथमिक ऊर्जा तथा 70 फीसदी बिजली उत्पादन के लिए कोयले का इस्तेमाल होता है।  

यद्यपि भारत सरकार अभी भी कोयला आधारित बिजली उत्पादन को प्रोत्साहित कर रही है पर कई अनुमान बताते हैं कि देश की ऊर्जा जरूरतों में कोयला पर निर्भरता कम होने वाली है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने अनुमान लगाया है कि 2040 तक भारत की कोयला पर निर्भरता 70 प्रतिशत से घटकर 30 प्रतिशत हो जानी है।  

फॉसिल फ्यूल आधारित अर्थव्यवस्था से क्लीन एनर्जी आधारित अर्थव्यवस्था की तरफ जाने की इस प्रक्रिया में कई बदलाव आने वाले हैं। कई चुनौतियां पेश आने वाली हैं। इस परिवर्तन को अगर सोच-समझ कर किया जाए, बेहतर रणनीति बनाई जाए तो इसके नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है। साथ ही इस परिवर्तन के मूल उद्देश्य को बेहतर तरीके से हासिल किया जा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए जलवायु परिवर्तन पर हुए पेरिस समझौते में जस्ट ट्रांजिशन को एक महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया है। 

ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो मानव समाज और अर्थव्यवस्था ने कई परिवर्तन देखें हैं। अर्थव्यवस्था के मद्देनजर देखा जाए तो तकनीकी सुधार हो या ऑटोमेशन, या फिर उद्योगों का एक जगह से दूसरी जगह चले जाना हो। ऐसे परिवर्तन से रोजगार के संकट के साथ-साथ आर्थिक चुनौतियां भी सामने आयी। इस वजह से यह डर और प्रासंगिक हो जाता है कि यह ऊर्जा क्षेत्र में किये जा रहे इस परिवर्तन का अनुभव भी कड़वा रहने वाला है। यहीं पर जस्ट ट्रांजिशन की भूमिका आती है। 

ब्रिटिश कोलम्बिया के इंस्टिट्यूट फॉर रिसोर्सस, एनवायरनमेंट एण्ड सस्टैनबिलिटी से जुड़े संदीप पाई कहते हैं कि वैश्विक स्तर पर या भारत में जस्ट ट्रांजिशन को कई तरीके से परिभाषित किया जाता है। कुछ लोग इसे पूरी सामाजिक संरचना या अर्थव्यवस्था में सम्पूर्ण परिवर्तन के तौर पर परिभाषित करते हैं। कुछ लोग इसका मतलब यह निकालते हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के दौरान बदलती अर्थव्यवस्था में उन मजदूरों और कर्मचारियों को पुनः रोजगार मिले जो जीवाश्म ईंधन से जुड़े उद्योग में लगे हैं। पर मेरे विचार में इसका तात्पर्य है- न्यायोचित परिवर्तन। खासकर उन समूह और लोगों के लिए जो अभी जीवाश्म ईंधन से संचालित अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं और अपनी आजीविका चला रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की मार से  बचने के लिए जब बड़े कदम उठाए जाएंगे तो उनका नुकसान होगा। मान लीजिए कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जीवाश्म ईंधन पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता को कम किया जाए और स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जाए तो पुरानी व्यवस्था में लगे मजदूर, पेंशनभोगी लोग तथा अन्य समुदाय के लोग इससे प्रभावित होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें उनलोगों के बारे में भी सोचना होगा जो इस परिवर्तन की वजह से हाशिये पर चले जाएंगे।

जस्ट ट्रांजिशन की पृष्ठभूमि

जस्ट ट्रांजिशन का विचार पहली बार 70 के दशक में अमेरिका में आया जब टोनी मज़्जोंची नाम के एक मजदूर नेता ने पर्यावरण के लिए काम करने वाले लोगों से मदद मांगी। टोनी तेल, केमिकल और परमाणु क्षेत्र में लगे मजदूरों के संघ के नेता थे। उन्होंने मजदूरों के सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निजात पाने के लिए मदद की गुहार की। इनके साथ अन्य मजदूर संघ से जुड़े लोगों ने मजदूरों की आजीविका के साथ-साथ स्वास्थ्य और सुरक्षा के मुद्दे उठाए। साथ ही वातावरण को बचाने की भी वकालत की। 

1990 के दशक में, उत्तर अमेरिकी यूनियनों ने न्यायोचित परिवर्तन पर विचार-विमर्श शुरू किया। शुरुआत में मजदूर संघों ने इसे ऐसे लिया कि यह पर्यावरण संरक्षण नीतियों के कारण अपनी नौकरी गंवाने वाले श्रमिकों को मदद पहुंचाने के लिए है। आज भी कई जगह जस्ट ट्रांजिशन को ऐसे ही परिभाषित किया जाता है। हालांकि धीरे-धीरे लोगों को इसके बड़े फलक का एहसास होने लगा है। अनाबेला रोजेमबर्ग ने 2010 में प्रकाशित एक अध्ययन में लिखा कि रोजगार खत्म होना जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नीतियों का स्वतः होने वाला परिणाम नहीं है। बल्कि कम निवेश, सामाजिक नीतियां और भविष्य न पढ़ पाने के नतीजे के तौर पर इस तरह की बेरोजगारी सामने आती है। 

समय के साथ जस्ट ट्रांजिशन के बड़े फलक की बात लोगों को समझ आने लगी और यह भी कि इसमें मजदूर संघ और सहयोगी संस्थाओं की बड़ी भूमिका रहने वाली है। इस परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कम करने और फ़ायदों में इजाफा के लिए सोच-समझ कर निवेश किया जाए ताकि स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार और अर्थव्यवस्था का विकास किया जा सके। समझ बढ़ने के साथ-साथ, मजदूर संघ, जस्ट ट्रांजिशन को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बन रही अंतरराष्ट्रीय समझौतों में शामिल करने की मांग करने लगें। जैसे यूनाईटेड नेशनस फ्रेमवर्क कॉन्वेंशन ऑफ क्लाइमेट चेंज। वर्ष 2015 में हुए पेरिस समझौते में जस्ट ट्रांजिशन का विशेष ख्याल रखा गया।  

क्यों जरूरी है जस्ट ट्रांजिशन

नई दिल्ली स्थिति जलवायु परिवर्तन और नवीन ऊर्जा पर काम करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था आईफॉरेस्ट नाम की संस्था ने हाल ही में ‘फाइव आर’ नाम से जस्ट ट्रांजिशन पर एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि देश के कुल 718 जिलों में से 120 जिलों में अच्छी-खासी मात्रा में फॉसिल फ्यूल से जुड़े उद्योग हैं। इसमें कोयला खनन से लेकर, तेल और गैस का उत्पादन, ताप विद्युत सयंत्र, रिफाइनरी, स्टील, सीमेंट, खाद (यूरिया) और ऑटोमोबाइल सेक्टर शामिल है।

इन जिलों में करीब 33 करोड़ लोग रहते हैं यानी भारत की कुल जनसंख्या की 25 फीसदी आबादी। इस रिपोर्ट के अनुसार इन 120 जिलों में 60 जिले ऐसे हैं जहां से देश का 95 फीसदी कोयला और इग्नाइट का खनन होता है। यहां 60 फीसदी ताप विद्युत सयंत्र की क्षमता स्थापित है तो ऑटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े 90 प्रतिशत कलपुर्जों का उत्पादन यहां होता है। ऐसे जिले झारखंड में सबसे अधिक हैं। यहां ऐसे जिलों की संख्या आठ है। इसके मुकाबले महाराष्ट्र में छः, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में पांच-पांच जिले हैं। करीब एक-तिहाई जिले झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कोयले वाले क्षेत्र में आते हैं।  

क्या हैं चुनौतियां?

आईफॉरेस्ट की उसी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में असंगठित मजदूरों की संख्या काफी अधिक है। कुल कार्यबल का करीब 90 फीसदी। फॉसिल फ्यूल के क्षेत्र में भी कमोबेश यही स्थिति है। इस वजह से इस क्षेत्र में सक्रिय लोगों का कोई समुचित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। संगठित क्षेत्र के कुछ आंकड़े मिलते हैं। कई रिपोर्ट की मदद से आईफॉरेस्ट की रपट ने अनुमान लगाया है कि कम से कम 2 करोड़ 15 लाख लोग फॉसिल फ्यूल और इसे जुड़ी अर्थव्यवस्था से रोजगार पाते हैं। ऑटोमोबाइल, लौह, स्टील और कोयला क्षेत्र से रोजगार के वास्ते बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं। इन सारे उद्योगों में संगठित क्षेत्र के मुकाबले असंगठित क्षेत्र में चार गुना लोग सक्रिय हैं। 

संदीप पाई कहते हैं कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह परिवर्तन कितना बड़ा होने वाला है और इसमें कितनी बड़ी संख्या में लोगों को नुकसान होगा। भारत में इस परिवर्तन के स्केल पर अभी अध्ययन नहीं हुआ है इसलिए यह काफी जटिल विषय है। अर्थव्यवस्था के इस बदलाव में संगठित और असंगठित क्षेत्र- दोनों में बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने का अनुमान है। 

श्रमिक वर्ग के लोगों को नई व्यवस्था के अनुरूप कौशल (स्किल) विकास करना होगा। इसके लिए पहले कौशल को परिभाषित करने की आवश्यकता है। भारत में कौशल की परिभाषा थोड़ी जटिल है। यदि हमारे पास मौजूदा कौशल का खांचा है और यह भी स्पष्ट है कि भविष्य के संभावित उद्योगों में किस तरह के कौशल की जरूरत पड़ने वाली है तो तैयारी करने में आसानी होगी। नई व्यवस्था के अनुरूप श्रमिकों को ट्रेनिंग देकर फिर से तैयार करना आसान होगा।

भविष्य का सफर 

पुरानी व्यवस्था से नई व्यवस्था की तरफ जब परिवर्तन होगा तो आघात तेज होगा। अंग्रेजी में इसे शॉक वैल्यू कहते हैं। यदि हम अभी इसकी तैयारी नहीं करते हैं तो उस शॉक को झेलना मुश्किल होगा। उस परिवर्तन को झेलने के लिए व्यवस्था को तैयार करने में दशकों लगने वाले हैं। 

संदीप पाई कहते हैं कि उस परिवर्तन के संदर्भ में मेरा सबसे बड़ा सवाल है कि हम अर्थव्यवस्था में विविधता कैसे ला सकते हैं? इसके लिए हमें पहले से तैयारी करनी होगी। यदि हम अभी इसकी योजना नहीं बनाते हैं, तो झारखंड जैसे राज्यों के लिए, जहां संसाधन की कमी है, आनन-फानन में यह विविधता लाना कठिन होगा। यहां तक कि विकसित देशों ने भी व्यवस्था के इस परिवर्तन को झेलने के लिए दशकों तक तैयारी की है और बहुत पैसा निवेश किया है फिर भी वहां न्यायोचित परिवर्तन को लेकर चिंता जाहिर की जा रही है। 

इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर सस्टैनबल डेवलपमेंट नाम की संस्था ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की जिसके लेखक संदीप पाई हैं। उस रिपोर्ट में भारत में संभावित जस्ट ट्रांजिशन के विभिन्न पहलू पर बात की गयी। इसमें बताया गया है कि शॉक वैल्यू से निपटने के लिए सरकार को कुछ खास क्षेत्र में काम करने के जरूरत है। इसमें दूरगामी नीतियां, मजदूर संघों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी, स्थानीय स्तर पर अर्थव्यवस्था में विविधता लाना और रोजगार उत्पन्न करने की कोशिश, बुजुर्ग होते कर्मचारियों को पेंशन तथा खानों को बहाल कर उस जमीन को खेती के लायक बनाना इत्यादि शामिल है। 

अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि जस्ट ट्रांजिशन का एक अहम हिस्सा है कि सरकार और अन्य भागीदार समूह मिलकर दूरगामी परिणाम के लिए नीतियों की तैयारी करना। जर्मनी का एक उदाहरण इसे समझने के लिए काफी है। इस देश के सारलैंड और रुहर क्षेत्र में खानों को बंद करना था। इसे बंद करने के सालों पहले वहां की केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन, मजदूर संघ और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनी ने मिलकर एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये। इसमें कई उपाय बताए गए जिसमें बुजुर्गों को पेंशन और युवाओं को रोजगार देने पर जोर दिया गया। जैसा कि उम्मीद जताई जा रही है कि कोयला की उपादेयता बहुत जल्दी खत्म होने वाली है ऐसे में भारत में भी जस्ट ट्रांजिशन को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाने की जरूरत है।

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