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भारत-चीन / अभी बहुत कुछ बाकी है!

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूर्वी-लद्दाख की मौजूदा स्थिति को लेकर संसद में बयान दिया। उन्होंने कहा कि मुझे सदन को यह बताते हुए खुशी हो रही है कि हमारे दृढ़ इरादे और टिकाऊ बातचीत के फलस्वरूप चीन के साथ पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिणी तट पर सेना के पीछे हटने का समझौता हो गया है। 

दरअसल, पूर्वी-लद्दाख में भारत-चीन सीमा (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर दोनों देशों के बीच करीब दस महीने से तनाव रहा है। इस सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच अब तक नौ दौर की उच्च स्तरीय सैन्य वार्ता हो चुकी है और इस बीच, भारत सरकार लगातार ये कहती रही है कि वो बातचीत के ज़रिए शांति बहाली का प्रयास कर रही है। 

पिछले साल मई में जब चीन के साथ हमारी मुठभेड़ हुई थी, तब टकराव पांच क्षेत्रों में हुआ था। दोनों देशों के बीच की जो वास्तविक नियंत्रण रेखा है, उसके आस-पास के वे चार इलाके ये हैं पहला गोगरा पोस्ट का पेट्रोलिंग पांइट 17 ए दूसरा पीपी के पास हॉट स्प्रिंग तीसरा गलवान घाटी और चौथा देपसांग प्लेस! इन पर अभी समझौता होना बाकी है। इन इलाकों में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ कर ली थी।

द हिन्दू अख़बार के चीन संवाददाता और भारत-चीन संबंधों पर क़िताब लिख चुके अनंत कृष्णन ने ट्विटर पर लिखा है कि दोनों देशों ने समझौता किया है। भारत फ़िंगर 8 तक गश्त कर सकेगा जबकि चीन ने फ़िंगर 4 तक अपना वर्चस्व क़ायम रखा है। यानी दोनों देशों ने अपने क़दम पीछे खींच लिये हैं। पैंगोंग झील के दक्षिण को लेकर भारत सरकार ने जो कदम उठाया, वो महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा है, क्योंकि उसी की वजह से शायद दोनों पक्षों में इस समझौते पर सहमति बन पाई।

भारतीय और चीनी सैनिकों की मुठभेड़ में हमारे 20 जवान शहीद हुए और यह समझा जाता है कि चीनियों के लगभग 50 जवान मारे गए। अब रक्षा मंत्री राजनाथसिंह का संसद में बयान आया है कि चीन ने भारतीय जमीन खाली करना शुरु कर दिया है। वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष डॉ. वेदप्रताप वैदिक द फीचर टाइम्स को बताते हैं कि यदि राजनाथ सिंह की यह बात ठीक है तो मानना पड़ेगा कि नरेंद्र मोदी का यह बयान बिल्कुल गलत था कि चीन के फौजियों ने हमारी एक इंच जमीन पर भी कब्जा नहीं किया है। यदि ऐसा है तो क्या वे अपनी ही जमीन से पीछे हट रहे हैं और उस पर हमारे कब्जे को स्वीकार कर रहे हैं? अभी तो सिर्फ पेंगांग झील क्षेत्र से दोनों सेनाओं ने पीछे हटने पर हां भरी है। 

देखा जाए तो यह प्रारंभिक पहल भी ठीक से पूरी होती है कि नहीं? वास्तव में ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (एलएसी) अवास्तविक है। उसे बताने के लिए न तो कोई दीवार खड़ी है, न तार लगे हैं, न कोई खाई है और न ही कोई नदी है। साल मैं सैकड़ों बार दोनों तरफ के सैनिक उसका उल्लंघन जाने-अनजाने करते रहते हैं। फिर भी 1962 के बाद से अब तक उस रेखा पर कभी कोई गंभीर मुठभेड़ नहीं हुई है। 

अब जो भारत-चीन समझौते की शुरूआत हुई है, शेष सभी नुक़्तों पर भी समझौता हो जाएगा, क्योंकि चीन पर अमेरिका के बाइडन-प्रशासन का दबाव बढ़ता जा रहा है और चीनी सरकार पर वे चीनी कंपनियां भी दबाव डाल रही हैं, जो भारत से हर साल करोड़ों-अरबों रुपया कमाती हैं। गौर करें कि लद्दाख मुठभेड़ पर मोदी ने जब-जब भाषण दिए, उनमें चीन का एक बार भी नाम नहीं लिया। क्या चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने मोदी के इस शी-प्रेम पर ध्यान नहीं दिया होगा? क्या ही अच्छा हो कि दोनों मित्र सीधी बात करें और भारत-चीन संबंधों को पुनः पटरी पर ले आएं।

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