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गलवान घाटी / संभव है, ‘बातचीत’ या इस तरह सुलझ सकता है पूरा मामला

  • डॉ. वेदप्रताप वैदिक।

भारत और चीन के सैनिकों की बीच हुई मुठभेड़ और उसके कारण हताहतों की खबर ने देश के कान खड़े कर दिए। भारतीय टीवी चैनलों को चीनी सैनिकों के मरने की खबर चीनी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ से मिली। अखबार के संपादक ने ट्वीट करके यह खबर भी दी कि चीन इस मामले को तूल नहीं देना चाहता है। वह बातचीत जारी रखेगा।

वैसे ‘ग्लोबल टाइम्स’ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का ऐसा अखबार है, जो बेहद आक्रामक और बड़बोला है लेकिन आज उसका स्वर थोड़ा नरम मालूम पड़ रहा है? इससे क्या अंदाज लगता है? देर रात सिर्फ यह बताया गया कि हमारे 20 फौजी मारे गए और कुछ घायल भी हुए। चीनी सैनिक कितने हताहत हुए, इसके बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया है लेकिन भारतीय चैनल और अखबार अंदाज लगा रहे हैं कि चीन के 40 से अधिक फौजी मारे गए।

मरनेवाले चीनियों की संख्या दुगुनी है, इस खबर से हमारे घावों पर थोड़ा मरहम जरुर लग सकता है लेकिन एक बात पक्की है। वह यह कि सीमांत पर डटे हुए दोनों देशों के फौजियों के सोच में और दोनों देशों के नेताओं के सोच में काफी फर्क मालूम पड़ रहा है। हमारे नेता तो चुप हैं लेकिन चीनी नेता भी कुछ नहीं बोल रहे हैं। दोनों तरफ के प्रवक्ता जरूर बोल रहे हैं। दोनों एक-दूसरे के फौजियों पर सीमा के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं।

यदि यह घटना बिल्कुल ऐसी ही है तो दोनों देशों की सरकारें इसे दुर्भाग्यपूर्ण दुःसंयोग कह कर आपस में बातचीत शुरु कर सकती हैं। यह मामला इतना गंभीर है कि भारत के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति को कल ही बात कर लेनी चाहिए थी। यदि कोरोना या अन्य छोटे-मोटे अवसरों के बहाने विदेशी नेताओं से हमारी बातें होती रहती हैं तो यह मुद्दा ऐसा है कि इस पर पूरा भारत उबलने लगा है। कोरोना के संकट में सरकार पहले से ही बेहाल है, अब विपक्ष को 56 इंच के सीने पर हमला बोलने का नया बहाना मिल गया है।

यदि सरकार यह मानती है कि गलवान घाटी के इस कांड के पीछे चीन के शीर्ष नेतृत्व का हाथ है और उसे इसका कोई पश्चाताप नहीं है तो अब उसे विदेश नीति पर एक नई धार चढ़ाने की जरुरत है। चीन से सरकारी स्तर पर व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध तो ज्यों के त्यों बनाए रखे जाएं लेकिन जनता सोच-समझकर चीनी माल का बहिष्कार शुरु करें।

हम हांगकांग, तिब्बत, ताइवान और सिंक्यांग (उइगर मुसलमानों) का मामला भी उठाएं। ब्रिक्स, एससीओ और आरआईसी जैसे तीन-चार राष्ट्रों के संगठनों में भी, जहां भारत और चीन उनके सदस्य हैं, भारत अपना तेवर तीखा रखे। पड़ौसी राष्ट्रों को ‘रेशम महापथ’ के जाल में फंसने और चीन के कर्जदार होने से बचाए। दलाई लामा पर लगे सभी प्रतिबंध हटाए।

चीन यदि अरुणाचल को खुद का बताता है तो हम तिब्बत, सिंक्यांग और इनर मंगोलिया को आजाद करने की बात क्यों नहीं कहें? चीन यदि हमारे अरुणाचलियों को वीज़ा नहीं देता है तो हम तिब्बत, सिंक्यांग और इनर मंगोलिया के हान चीनियों को वीज़ा देना बंद करें। भारत में चीन ने 26 बिलियन डॉलर की पूंजी लगा रखी है। उसे हतोत्साहित किया जाए। लेकिन इस तरह के उग्र कदम उठाने के पहले हमारे विदेश मंत्रालय को चीन के असली इरादों की पहचान जरुर होनी चाहिए।

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