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राष्ट्र / अमेरिका के सामने, भारत का कूटनीतिक असमंजस

  • डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हटने के बावजूद भारत-अमेरिका घनिष्टता बढ़ रही है। पिछले साढ़े तीन महीनों में दोनों राष्ट्रों ने टोक्यो में क्वाड की बैठक की, अमेरिका के रक्षा मंत्री और जलवायु राजदूत भारत आए और दोनों राष्ट्र अफगान मामले में भी एक-दूसरे का सहयोग करते दिख रहे हैं, लेकिन पिछले हफ्ते अमेरिका की नौसेना ने लक्षद्वीप के पास अपना जंगी जहाजी बेड़ा भेजकर भारत के लिए नया कूटनीतिक असमंजस खड़ा कर दिया है।

ऐसा नहीं है कि अमेरिका के सातवें बेड़े का जहाज भारत के ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्र’ में पहली बार आया है। यह 2015, 2016, 2017 और 2019 में भी वहां घूम चुका है, लेकिन उसने तब अभी जैसा आक्रामक बयान जारी नहीं किया था। इस बार उसने 7 अप्रैल को कहा कि उसने भारत से अनुमति लिए बिना उसके अनन्य आर्थिक क्षेत्र में 130 किमी के अंदर जहाज भेजा है। ऐसा करके उसने मुक्त नौपरिवहन की स्वतंत्रता का उपभोग किया है। उसने किसी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं किया।

भारत सरकार ने कहा कि यह अमेरिकी बेड़ा बिना उसकी अनुमति भारत के सुपरिभाषित आर्थिक क्षेत्र में घुसकर सामरिक गतिविधियां चला रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं हैं। इस पर अमेरिकी नौसेना ने कहा कि भारतीय दावा अनाप-शनाप है, अमेरिकी कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं हुआ।

उसने 1982 के संयुक्त राष्ट्र संघ के समुद्री कानून की धारा 58 को उद्धृत कर बताया कि किसी भी तटवर्ती देश से किसी को अनुमति लेने की जरूरत तभी होती है जब वह उसकी 12 समुद्री मील की समुद्री सीमा में प्रवेश करना चाहे। भारत ने इस कानून पर 1995 में मुहर लगाई थी।

इस कानून का अमेरिका ने अभी तक पुष्टिकरण नहीं किया है लेकिन आश्चर्य है कि वह भारत को इसकी पट्टी पढ़ा रहा है। दुनिया के 168 देशों ने इस कानून पर मुहर लगा दी है। भारत ने अमेरिकी नौसेना को जवाब दिया है कि संयुक्त राष्ट्र का समुद्री कानून किसी राष्ट्र को यह छूट नहीं देता है कि किसी तटवर्ती देश के ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्र’ में वह उसकी सहमति के बिना फौजी कवायद करे।

भारत सरकार ने 1976 में पारित समुद्री कानून में स्पष्ट लिखा है कि उसके अनन्य आर्थिक क्षेत्र की 200 किमी सीमा में की जानेवाली बाहरी गतिविधियों के लिए भारत की सहमति जरूरी है। भारत के इस आशय की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून की धारा 88 से भी होती है।

उसके अनुसार ‘खुला समुद्र शांतिपूर्ण गतिविधियों के लिए सुरक्षित’ रहना चाहिए लेकिन अमेरिकी नौसेना का कहना है कि यदि अमेरिका भारत के दावे को स्वीकार कर ले तो दुनिया के कुल सामुद्रिक क्षेत्र का 38% हिस्सा मुक्त अंतरराष्ट्रीय नौपरिवहन के लायक ही नहीं रहेगा। सारा विश्व व्यापार ठप्प हो जाएगा। इसीलिए अमेरिका ने इस कानून पर दस्तखत नहीं किए। भारत व चीन ने इस पर दस्तखत किए हैं लेकिन कई किंतु-परंतु के साथ!

अमेरिका का कहना है कि उसने इस कानून को औपचारिक मान्यता नहीं दी है लेकिन वह इसे वैसे ही मानता है, जैसे दस्तखत नहीं करने के बावजूद भारत परमाणु अप्रसार संधि को मानता है। दूसरे शब्दों में अमेरिका दुनिया के समुद्रों में अपनी निर्बाध गतिविधियां चलाने के लिए इस कानून का फायदा उठा रहा है। 28 देशों ने ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्रों’ में ऐसे बाहरी अतिक्रमणों और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों की दादागीरी रोकने की इच्छा जताई है।

2001 में ब्रिटेन ने भारत के सामुद्रिक क्षेत्र में ऐसी दादागीरी की कोशिश की थी, जिसका तगड़ा प्रतिरोध हमारे रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस ने किया था। कुछ दिन पहले अंडमान द्वीप के पास से एक चीनी जंगी जहाज को भी भारत ने खदेड़ दिया था।

अमेरिका ने इस बार भारत के सामुद्रिक क्षेत्र में घुसने का जो प्रचार किया है, उसका लक्ष्य शायद चीन को बताना रहा हो कि दक्षिण चीनी समुद्र में उसने पिछले चार साल में जो 27 बार घुसपैठ की, वह सामान्य-सी घटना है, चीन की अवहेलना नहीं। शायद इसीलिए भारत ने न तो अभी तक कोई सख्त कूटनीतिक विवाद खड़ा किया और न ही अमेरिकी जहाज को खदेड़ने की कोशिश की।

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