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कूटनीति / अरब-इजराइल विवाद को सुलझाने में ‘भारत की पहल’

  • डॉ. वेदप्रताप वैदिक।

इजराइल और फलस्तीनियों के संगठन हमास के बीच पिछले 11 दिनों तक युद्ध चलता रहा। अब मिस्र और अमेरिका के प्रयत्नों से वह युद्ध ऊपरी तौर पर शांत हो गया है लेकिन बुनियादी झगड़ा जहां का तहां बना हुआ है।

अल-अक्सा मस्जिद, जो कि दुनिया के मुसलमानों का पवित्र तीर्थ-स्थल है, उसमें इजरालियों का जाना-आना ज्यों का त्यों बना हुआ है और शेख ज़र्रा नामक पूर्वी यरुशलम से फलस्तीनियों को खदेड़ना जारी है। इन दोनों मसलों के कारण ही यह युद्ध छिड़ा था। इन दोनों से भी बड़ा और असली मुद्दा है, उस फलस्तीनी भूमि पर दो राष्ट्रों का स्थापित होना।

सन् 1948 में इजराइल वहां स्थापित हो गया। उसकी स्थापना में ब्रिटेन और अमेरिका ने जबर्दस्त भूमिका निभाई लेकिन फलस्तीनियों का राज्य बनना अभी तक संभव नहीं हुआ है जबकि उसकी स्थापना के लिए संयुक्तराष्ट्र संघ ने प्रस्ताव पारित कर रखा है। सभी पश्चिमी राष्ट्र और यहां तक कि अरब राष्ट्र भी इस मामले में जबानी जमा-खर्च करके चुप हो जाते हैं।

इजराइल में रहने वाले अरबों की दुर्गति तो सबको पता ही है, फलिस्तीनी इलाकों की गरीबी, अशिक्षा और असुरक्षा शब्दों के परे हैं। इसके अलावा पिछले अरब-इजराइली युद्धों में इस्राइल ने जिन अरब इलाकों पर कब्जा कर लिया था, उनमें रहने वाले अरबों की हालत गुलामों जैसी है। वे अपने ही घर में बेगानों की तरह रहते हैं।

एक जमाना था, जब दुनिया के मालदार इस्लामी राष्ट्र इन शरणार्थियों की खुलकर मदद करते थे लेकिन अब ईरान के अलावा कोई राष्ट्र खुलकर इनकी मदद के लिए सामने नहीं आता। तुर्की और मलेशिया जैसे राष्ट्र जबानी बंदूकें चलाने में उस्ताद हैं लेकिन परेशान फलस्तीनियों की ठोस मदद करने वाला आज कोई भी नहीं है।

खुद फलस्तीनी कई गुटों में बंट गए हैं। अल-फतह और हमास ये दो तो उनके जाने-पहचाने चेहरे हैं। छोटे-मोटे कई गुट सक्रिय हैं जबकि उनके विरुद्ध पूरा का पूरा इजराइल एक चट्टान की तरह खड़ा होता है। इजराइल की पीठ पर अमेरिका की सशक्त यहूदी लॉबी का हाथ है।

भारत एक ऐसा देश है, जिसका इजराइल और फलिस्तीन, दोनों से घनिष्ट संबंध है। भारत ने वर्तमान विवाद में अपनी भूमिका के असंतुलन को सुधारा है और निष्पक्ष राय जाहिर की है। वह किसी का पक्षपात करने के लिए मजबूर नहीं है।

फलस्तीनियों के प्रसिद्ध नेता यासिर अराफत कई बार भारत आते रहे और भारत सरकार खुलकर उनका समर्थन करती रही है। नरसिंहराव सरकार ने इजराइल के साथ सक्रिय सहयोग शुरु किया था, जो आज काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। अन्य अरब देश भी भारत का बहुत सम्मान करते हैं।

इजराइल सुरक्षित रहे लेकिन साथ-साथ अरबों को भी न्याय मिले, इस दिशा में भारत का प्रयत्न बहुत सार्थक हो सकता है। भारत कोरे बयान जारी करके अपना दायित्व पूरा हुआ, यह न समझे बल्कि दोनों पक्षों से खुलकर बात करे तो वह अमेरिका जो प्रयत्न कर रहा है, उसे सफल बना सकता है।

इस युद्ध-विराम का श्रेय बहुत हद तक अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन को भी है। उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से 11 दिन में 6 बार बात की और युद्ध-विराम के लिए प्रेरित किया। पहले 5-6 दिन तो ऐसा लगा कि इजराइल पर बाइडेन और ट्रम्प की नीति में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि बाइडेन बार-बार दोहरा रहे थे कि इजराइल को आत्मरक्षा का पूर्ण अधिकार है।

उन्होंने सुरक्षा परिषद को भी कोई पहल नहीं करने दी, लेकिन उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने इजराइल के अतिवाद पर उंगली उठाई और बाइडेन पर दबाव बनाया। बाइडेन ने अपनी लकीर बदली और कहना शुरू किया कि इजराइल और फिलीस्तीनी, दोनों को जिंदा रहने का अधिकार है।

अब अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकन की कोशिश है कि इजराइली हमलों से उजड़े गाजा-क्षेत्र में पुनर्निर्माण हो। बाइडेन प्रशासन कोशिश करेगा कि जैसे ओबामा ने राष्ट्रपति बनते ही अरब-इजराइल संवाद शुरू करवाया था, वैसा ही राजनयिक क्रम फिर शुरू हो। आज कई अरब राष्ट्रों से अमेरिका घनिष्ट संबंध हैं, उनका लाभ उठाकर वह मुस्लिम राष्ट्रों को फिलीस्तीन मसले के स्थायी हल के लिए तैयार कर सकता है।

वैसे इस्लामिक सहयोग संगठन के 57 सदस्यों ने इजरायली हमले की भर्त्सना की, लेकिन सिर्फ जुबानी जमा-खर्च करके रह गया। कई प्रमुख इस्लामी राष्ट्रों ने इजरायल को कूटनीतिक मान्यता दी और उसके साथ राजनयिक संबंध भी स्थापित किए हैं।

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