Press "Enter" to skip to content

ऑपरेशन फ्लड / गाय के बारे में वो तथ्य, जो शायद! आप नहीं जानते?

भारत के कुछ क्षेत्रों में, विशेषकर हिमालय के पहाड़ों और अन्य पर्वत श्रृंखलाओं में, मवेशियों विशेषतौर पर गाय और बेल के बिना कृषि की कल्पना भी नहीं कर सकते है। पूरी दुनिया में लगभग सभी पर्वतीय समुदाय पशुधन पर निर्भर हैं। पशु शक्ति पर आधारित खेती में पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों की भी आवश्यकता नहीं होती, जैसा कि ट्रेक्टर और अन्य मशीनों पर निर्भर खेती में होती है। इस प्रकार, पशुधन-आधारित खेती कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करती है।

गुणों की खान होने के बावजूद गाय को लेकर इतना विवाद है तो इसकी वजह है गाय की धार्मिक पहचान। इसी का नतीजा है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में तो दुधारू गाय का कत्ल पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन भारत में ऐसे कदम उठाने पर धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ जाती है। वक्त की मांग है कि हम गाय को धार्मिक नजरिए के बजाए उसके औषधीय महत्व को देखें। देसी गायों के दूध में ए-2 नामक औषधीय तत्व पाया जाता है, जो मोटापा, आर्थराइटिस, टाइप-1 डाइबिटीज व मानसिक तनाव को रोकता है। इसी को देखते हुए विदेशों में भारतीय नस्ल की गायों का संरक्षण किया जा रहा है।

ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में तो ए-2 कार्पोरेशन नामक संस्था बनाकर भारतीय नस्ल की गायों के दूध को ऊंची कीमत पर बेचा जाता है। दूसरी ओर हॉलस्टीन व जर्सी जैसी विदेशी नस्ल की गायों में यह प्रोटीन नहीं पाया जाता है। गाय के अर्थशास्त्र को नष्ट करने में देसी नस्लों के साथ विदेशी नस्लों की क्रॉस ब्रीडिंग की अहम भूमिका रही है। ‘ऑपरेशन फ्लड’ के दौरान यूरोपीय नस्ल की गायों को आयात कर उनके साथ देसी नस्लों की क्रॉस ब्रीडिंग का नतीजा ये हुआ कि जहां भारत में देसी नस्लें खत्म होती जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय मूल की ‘गिर गाय’ ब्राजील में दूध उत्पादन का रिकार्ड बना रही है।

वर्षों पहले ब्राजील ने मांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए भारत से 3000 गिर गायों का आयात किया था, लेकिन जब उसने इनके दूध के औषधीय महत्व को देखा तो वह दूध उत्पादन के लिए इन्हें बढ़ावा देने लगा। इसी तरह आस्ट्रेलिया में भारतीय नस्ल के ‘ब्राह्मी बैलों’ का डंका बज रहा है। क्या इसे दुर्भाग्य नहीं कहेंगे कि भारतीय नस्ल की गायों का उन्नत दूध विदेशी पी रहे हैं और हम विदेशी नस्लों का जहरीला दूध।

गो-हत्या पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर तथाकथित धर्म-निरपेक्षतावादियों ने बहुत विलाप किया है। उन्हें तथ्यों और आंकड़ों पर विश्वास नहीं, न सत्य से कोई सरोकार है, और न ही उन्हें राष्ट्रीय भावनाओं से कोई मोह है। जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या की गंभीरता से भी उन्हें कोई मतलब नहीं। उनके कुतर्क केवल राजनीतिक रंग में रंगे होते हैं। आप देखिए कि मांस उद्योग सबसे क्रूर जलवायु खलनायकों में से एक है, जो वायुमंडल में बहुत बड़े कार्बन पदचिन्ह छोड़ रहा है।

औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से जब दुनिया ने जीवाश्म ईंधन को जलाना शुरू किया, हमने दुनिया को 0.8 डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर दिया है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अतीत और पूर्वानुमानित कार्बन उत्सर्जन के कारण दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस गर्म हो जाएगी। दिसंबर 2016 की पेरिस जलवायु वार्ता में विश्वव्यापी तापक्रम बढ़ोत्तरी का लक्ष्य 2 डिग्री सेल्सियस तय किया गया। 2 डिग्री सेल्सियस का आंकड़ा देखने में छोटा लगता है, लेकिन इसका जीवन और जीवित ग्रह पर अभूतपूर्व नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

खानपान की आदतें यूं तो एक व्यक्तिगत मामला है, जिस पर प्रश्न उठाना अटपटा-सा लगता है, लेकिन हमारी जलवायु पर सबसे बड़ी और सबसे विस्फोटक मार मांसाहार की प्रवृत्ति से पड़ रही है। मांस आहार, विशेष रूप से गोमांस से बना आहार, पर्यावरण पर सबसे बुरा प्रभाव डालता है। एक रिपोर्ट से पता चलता है कि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों के कारण सबसे बड़ा कार्बन पदचिन्ह गो-मांस के कारण होता है, जो बीन्स, मटर और सोयाबीन यानी शाकाहारी आहार की तुलना में लगभग 60 गुना बड़ा है।

यदि हम इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटते हैं, तो पता चलता है कि बाबरनामा में दर्ज एक पत्र में बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को नसीहत देते हुए कहा था कि तुम्हें गौ-हत्या से दूर रहना चाहिए। ऐसा करने से तुम हिन्दुस्तान की जनता में प्रिय रहोगे। इस देश के लोग तुम्हारे आभारी रहेंगे और तुम्हारे साथ उनका रिश्ता भी मजबूत हो जाएगा।

आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र ने भी 28 जुलाई 1857 को बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था। साथ ही यह भी चेतावनी दी थी कि जो भी गौ-हत्या करने या कराने का दोषी पाया जाएगा उसे मौत की सज़ा दी जाएगी। उस समय गौ-हत्या के खिलाफ अलख जगाने का काम करने वाले उर्दू पत्रकार मोहम्मद बाकर को बगावती तेवरों के लिए मौत की सजा सुनाई गयी थी।

मानव प्रजाति द्वारा मांस भक्षण धरती और धरती के जीवन के लिए एक अभिशाप है, ऐसा दुनिया के अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं और हाल ही में अमेरिका की नव-नियुक्त उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी कहा है कि ‘मांस धरती को नष्ट कर रहा है।’ गौ संरक्षण पूर्णरूपेण राष्ट्रहित में है, और यह पर्यावरणीय, पारिस्थितिक एवं सामाजिक और आर्थिक न्याय के अनुरूप है। गाय को भारत के विकास का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाना चाहिए। गौ-शक्ति से संपन्न भारत वास्तव में एक खुशहाल और संपोषित भारत होगा।

आप हमें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, लिंक्डिन और टेलीग्राम  पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।

More from सोशल हलचलMore posts in सोशल हलचल »

Be First to Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *