Press "Enter" to skip to content

आरोग्य सेतु एप / निजता का हनन और आपकी सुरक्षा दोनों कैसे संभव?

निजता का अधिकार, आपका मौलिक अधिकार है और जब सरकार ही इसका हनन करे तो यह सवाल किस बुनियाद पर आप उठाएगें। देश में कोरोना संकट है। कुछ महीनों पहले आरोग्य सेतु एप लांच किया गया। कहा गया कि यह एप कोरोना संकट के समय काबू पाने में सफल होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ?

जब दुनियाभर के आईटी एक्सपर्ट्स ने जब एप की जांच की तो कई खामियां नजर आईं। हालांकि भारत सरकार ने उस समय यह स्पष्ट किया कि यह एप सुरक्षित है, लेकिन यह कितना सुरक्षित है इसे आप कुछ इस तरह समझिए और तय कीजिए क्या सरकार जो कह रही है वो सच है?

सबसे पहले बात हम संविधान के अनुच्छेद 21 की करें तो यह जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता देता है। साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार मानने की पूरी तरह से पुष्टि की, जो उसके पहले विवाद का विषय बनी हुई थी।

अब बात आरोग्य सेतु एप की तो पीआईबी की वेबसाइट पर इस एप से जुड़ी जो जानकारी दी गई है उनके अनुसार, यह एप कोविड-19 संक्रमण के प्रसार के जोखिम का आकलन करने और आवश्यक होने पर आइसोलेशन सुनिश्चित करने में मदद करेगा। यह कितना मददगार साबित हुआ है ये आप और हम सभी जानते हैं। यह भी एक सवाल है जहां से अगले सवाल की शुरूआत होती है।

क्या आरोग्य सेतु से संक्रमण रोक पाने की समस्या का हल होता है? यदि मौजूदा आंकड़ा देखें तो बिलुकल नहीं? फिर आरोग्य सेतु जैसा एप कितना मददगार साबित हुआ? आप यह कह सकते हैं कि कई देशों में मोबाइल के जरिए कॉन्टेंक्ट ट्रेसिंग एप से कोरोना संक्रमण रोकने का तरीका फायदेमंद साबित हुआ।

स्मार्टफोन हर किसी के पास नहीं

एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस, जर्मनी, पेरू, फिलीपींस, सऊदी अरब, तुर्की वियतनाम, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, इटली और भारत इन सभी देशों की आबादी लगभग 1 अरब 90 करोड़ के आस-पास है। एप का इस्तेमाल आबादी का बेहद कम हिस्सा कर रहा है। यह बात भारत पर भी लागू होती है, जहां लगभग 12 प्रतिशत (इससे थोड़ा ज्यादा) लोगों ने डाउनलोड किया है।

भारत सरकार ने 29 अप्रैल को एक ज्ञापन जारी किया था। जिसका शीर्षक था, ‘कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए (चेन ब्रेक) आरोग्य सेतु ऐप का प्रभावी इस्तेमाल।’ इसमें कहा गया कि केंद्र सरकार के अधीन आने वाले सभी कार्यालयों में कार्यरत् सभी को आरोग्य सेतु एप डाउनलोड करना अनिवार्य है।

अब बात टेलीकॉम इंडस्ट्री पर नजर डालें तो साल 2019 तक देश में ऐसी करीब 42 करोड़ मोबाइल (स्मार्टफोन) यूजर थे यानी आबादी का 70 फीसदी से भी कम हिस्सा। यह बात सिद्ध करती ऐसी कई रिपोर्ट आप इंटरनेट पर पढ़ सकते हैं। एक ओर सवाल यह जब भारत की पूरी आबादी की एक बड़ा हिस्सा अभी भी स्मार्टफोन यूज नहीं करता है तो ऐसे मे आरोग्य सेतु एप कैसे सफल माना जा सकता है?

तो क्या एप देता है छद्म अहसास

सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर कानून विशेषज्ञ बताते हैं कि एप डाउनलोड करने को लेकर जो सबसे बड़ा विवाद है वो निजता के हनन का है लेकिन देश में निजता के हनन को लेकर तस्वीर अब भी बहुत स्पष्ट नहीं है, बावजूद इसके की सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता दी थी। केंद्र सरकार अभी तक इस पर कोई कानून लेकर नहीं बना सकी है। निजता के अधिकार की बात से परे अगर बात करें तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी भी एप को इस तरह से अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है।

हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू रिपोर्ट के अनुसार, पाविया यूनिवर्सिटी और ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के आईटी विशेषज्ञों ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप्स की नाकामी की कई वजह बताईं जिनमें से एक है यह एक तरह से बुनियादी तौर पर बेहतर एप नहीं है क्योंकि जितने ज्यादा लोग इसे एप को डाउनलोड करें उनता भ्रम होगा क्योंकि इसकी रीडिंग बहुत गलत आएगी और सुरक्षा का छद्म अहसास पैदा होगा।

डेटा का हो सकता है दुरुपयोग

हाल में G20 देशों की डिजिटल इकॉनमी मीटिंग में सऊदी अरब की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अल स्वाहा ने कहा था, ‘दुनिया पिछले 90 वर्षों के सबसे बड़े स्वास्थ्य और आर्थिक संकट का सामना कर रही है। ऐसे में एक डिजिटल क्राइसिस नहीं होना चाहिए।’

मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नलॉजी के रिव्यू में आरोग्य सेतु को खराब बताया गया। इसे पांच में से केवल दो स्टार मिले। भारत में न तो प्राइवेसी लॉ है और न ही पर्सनल डेटा की सुरक्षा करने वाला कोई कानून। ऐसे में नागरिकों के डेटा के दुरुपयोग से निपटने का कानूनी रास्ता बहुत लचर है।

(आप हमें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, लिंक्डिन और यूट्यूब  पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।)

More from सोशल हलचलMore posts in सोशल हलचल »

Be First to Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *