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रिपोर्ट / क्या सरकार सही जगह छात्रवृत्ति खर्च करने को पहल दे रही है?

  • अंकुर धवन, सीओओ, बडी4स्टडी।

दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी किसी देश की है तो वो भारत है। वहीं पूरे विश्व में हमारी आबादी चर्चाओं का विषय है कि क्या यह जनसांख्यिकीय लाभ है या जनसांख्यिकीय बोझ? भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2019 में भारत के  उच्च शिक्षा सकल नामांकन अनुपात यानि ग्रोस एनरोलमेंट रेशियो (जीआरई) पर एक सर्वे करवाया गया।

एमएचआरडी के ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एआईएसएचई) पर करवाए गए इस सर्वे के अनुसार 18 से 23 आयु वर्ग के युवाओं का जीईआर केवल 26.3 प्रतिशत है, यानि 100 में से 74 युवा उच्च शिक्षा के लिए दाखिला ही नहीं ले पाते।

इस सर्वे रिपोर्ट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस देश की युवा शक्ति को देश के निर्माण में योगदान करने के लिए पर्याप्त कौशल जो प्राप्त होना चाहिए, वो नहीं मिल रहा है, तो ज़ाहिर है ये जनसांख्यिकी लाभ तो नहीं हो सकता।

नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के अनुसार, इस खराब जीईआर का मुख्य कारण विद्यार्थियों की शिक्षा की राह में आने वाली वित्तीय चुनौतियां जिम्मेदार हैं। वहीं छात्रवृत्ति विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा पूरी करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

मौजूदा आंकड़ों व एक अनुमान के हिसाब से केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष लगभग 20,000 करोड़ रुपये की छात्रवृत्तियां देती हैं। मगर प्रश्न ये है कि इतने बड़े फंड के बावजूद उच्च शिक्षा मे जीईआर का स्तर चिंताजनक स्थिति तक क्यों पहुंच चुका है?   

जरूरत कहां है?

राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल (एनएसपी) एक महत्वपूर्ण छात्रवृत्ति मंच है, इस पर उपलब्ध आंकड़ों पर हमने नज़र डाली तो पता चला, शैक्षणिक वर्ष 2019-20 के लिए 12 मई, 2020 तक 2,566 करोड़ रूपये के करीब फंड छात्रवृत्ति के रूप में वितरित किया जा चुका है। छात्रवृत्ति प्रमुखतः तीन श्रेणियों में दी जाती हैं, जैसे प्री-मैट्रिक (कक्षा 1 से 10 तक), पोस्ट मैट्रिक (कक्षा 11, 12, यूजी, पीजी) और उच्च शिक्षा (यूजी, पीजी, व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रम हेतु)। इसके अलावा, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए भी एक छात्रवृत्ति योजना है।

इस चार्ट में वितरित किए गए छात्रवृत्ति फंड की रिपोर्ट है, जो दर्शाती है कि उच्च शिक्षा के लिए आवंटित की गई राशि काफी नहीं है।

कक्षा आठवीं तक विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने का औचित्य समझ से परे है, क्योंकि सरकार शिक्षा के अधिकार के अधिनियम के तहत निशुल्क शिक्षा सुनिश्चित करती है। इसलिए सरकारी स्कूलों में आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति के समर्थन की जरूरत नहीं होती है। सरकार अपने शिक्षा बजट का बहुत बड़ा हिस्सा स्कूली शिक्षा पर खर्च करती है। इसके अलावा, उच्च शिक्षा में इस बजट का प्रमुख हिस्सा देश के आईआईटी, आईआईसीएस जैसे संस्थानों व केंद्रिय विश्वविद्यालयों को जाता है।

जमीनी हकीकत

उच्च शिक्षा में जीईआर की चिंताजनक स्थिति की वजह छात्रवृत्ति फंड का असमान वितरण है, इस तथ्य के बावजूद भी सरकार इसे सुधारने की दिशा में अभी तक सोच भी नहीं रही। जबकि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक विद्यार्थियों को पहुंचाने के लिए वित्तीय सहायता की सख्त जरूरत है।

स्रोत: एमएचआरडी की साक्षरता और जीईआर के आंकड़ों पर 2018 की रिपोर्ट पर आधारित

ऊपर दिए गए ग्राफ से पता चलता है कि प्राइमरी स्तर पर ग्रोस एनरोलमेंट रेट (जीईआर) 99.2 फीसदी है। यह बेहतर प्रतिशत आंकड़ा बड़े स्तर पर सरकारी स्कूलों का मौजूद बुनियादी ढांचा है, जिसके अंतर्गत शिक्षा का अधिकार नीति के चलते बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिलती है। वहीं सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी लेवल तक आते-आते यही जीईआर अनुपात गिर के नीचे आ जाता है। इन आंकड़ों को देखकर समझ आता है कि सरकार को प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की तुलना में उच्च शिक्षा के लिए अधिक छात्रवृत्ति वितरित करने पर खर्च करना चाहिए।

एक नज़र यहां भी…

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय (एमओएमए) ने वर्ष 2019-20 में कुल 2190 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति राशि वितरित की। इसमें से भी 65 प्रतिशत हिस्सा प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाओं पर खर्च कर दिया गया। इस राशि (2190 करोड़ रुपये) का मात्र 35 फीसदी हिस्सा पोस्ट मैट्रिक कक्षाओं जिनमें 11वीं, 12वीं के अलावा ग्रेजुएशन, पोस्टग्रेजुएशन कक्षाएं शामिल हैं, पर खर्च किया गया।

उच्च शिक्षा विभाग (डीएचई) जो उच्च शिक्षा के लिए समर्पित है ने केवल 137 करोड़ रुपये ही वितरित किए। यह फंड अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति फंड की तुलना में मात्र 10 प्रतिशत है।

सिर्फ रिकॉर्ड के लिए एक आंकड़ा ये भी : जनजातीय मामलों के मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय ने ही 15 करोड़ रुपये छात्रवृत्ति के रूप में वितरित किए और 1.3 करोड़ की राशि केवल और केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति के रूप में ताकि अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर सकें। कॉलेजों और यूनिवर्सिटीस में महंगी होती उच्च शिक्षा के मद्देनज़र उच्च शिक्षा में ज्यादा छात्रवृत्ति फंड की जरूरत बढ़ जाती है।

ये छात्रवृत्ति नीतियों में बदलाव का समय है

भले ही उच्च शिक्षा के आधार के लिए प्राथमिक शिक्षा महत्वपूर्ण है, फिर भी मौजूदा हालातों को देखते हुए सरकार को अपनी छात्रवृत्ति नीतियों में परिवर्तन के लिए गंभीरता से सोचना होगा। दुनिया में बहुत सारे ऐसे देश हैं जिन्होंने अपनी उच्च शिक्षा को पहल दी और इसके लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया, जो हमारे लिए वाकई एक व्यवहारिक सबक है।

उदाहरण के लिए, चीन ने पिछली सदी के अंत में शिक्षा पर बड़े पैमाने पर खर्च किया। इसने अपने उच्च शिक्षा के बजट में तेन गुणा वृद्धि की, जिससे उनके विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने को प्रोत्साहन और समर्थन मिला। नतीजतन आज चीन की धाक पूरी दुनिया में है। चीन ने न केवल अपने जीईआर को कई गुणा बढ़ाया, बल्कि इस देश के कई संस्थान आज दुनिया के बेहतरीन संस्थानों की फेहरिस्त में खड़े हैं।

वर्ष 2000 में भारत की जीईआर 9.5% थी और चीन की 7.6 फीसदी। पिछले दो दशकों में चीन ने अपना ग्रोस एनरोलमेंट रेट 50 फीसदी कर लिया और भारत का लगभग इससे आधा ही है यानि 26 प्रतिशत। आज चीन उच्च शिक्षा के दम पर कुशल कार्यकर्ताओं की एक सेना तैयार कर चुका है जिसका लाभ वो पूरी तरह से उठा रहा है। चीन के कुशल युवा और मानव संसाधन के कारण आज यह देश पूरी दुनिया के लिए मैनुफेक्चरिंग हब बन चुका है।  

यही समय है जब भारत की सरकार को अपने उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने पर पुनर्विचार करना होगा। इस पर होने वाले खर्च और छात्रवृत्तियों की नीतियों में सकारात्मक परिवर्तन लाना होगा, ताकि हमारी युवा पीढ़ी भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर कुशल कार्यबल बना सकें। उच्च शिक्षा और कौशल के बूते हमारे युवा देश की तरक्की और अर्थव्यवस्था में योगदान कर पाने में सक्षम हो पाएं।


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