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आपबीती / कहां गए वो पत्रकार जो ‘सरकार से पूछते थे जनता के सवाल’

  • राजेश भारद्वाज

साल 2014 के बाद देश का महौल कुछ ऐसा बदला कि जनता ने पत्रकारों को 2 खेमों में बांट दिया। कांग्रेसी पत्रकार बनाम बीजेपी पत्रकार? ऐसा क्यों हुआ, इसमें किसका कसूर था, चैनेलों का, पत्रकारों का या फिर राजनीतिक पार्टीयों का?

मीडिया में काम करते हुए 28 साल हो चुके हैं, लेकिन 2014 से पहले जनता की एक सोच थी कि मीडिया में जो काम करते हैं उसको चौथा स्तंभ बोला जाता है। यहां पत्रकारों की भी एक भूमिका होती है। सरकार से सवाल पूछना, जनता से सवाल पूछना, जनता की परेशानियों की आवाज बनकर सरकार तक पहुंचाना।

2014 से पहले जनता के दिमाग मे ये नहीं होता था कि ये पत्रकार कांग्रेस का है ये बीजेपी का। सिर्फ उनके सामने एक चेहरा होता था वो था ‘पत्रकार’। सभी पत्रकार सरकार से सवाल भी पूछते थे। सरकार बनाने के बाद हमारे देश के प्रधानमंत्री जी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करते थे, जिसमें सभी चैनल के वरिष्ठ पत्रकार वहां मौजूद होते थे। वो प्रधानमंत्री जी की बात सुनते थे और उनसे सवाल भी पूछते थे।

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जब कभी हमारे देश के प्रधानमंत्री जी विदेश यात्रा पर जाते थे तो उस देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति जी के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस भी होती थी। 2014 के बाद ऐसा माहौल बदला की जनता ने पत्रकारों को 2 खेमो में बांट दिया। कांग्रेसी पत्रकार बनाम बीजेपी पत्रकार? ऐसा क्यों हुआ, इसमें किसका कसूर था, चैनेलों का, पत्रकारों का या फिर राजनीतिक पार्टीयों का? पत्रकार तो सिर्फ अपना काम करता है।

ऐसा लगता है जैसे कि इस पूरे घटनाक्रम में मुख्य भूमिका सोशल मीडिया की रही है क्योंकि सोशल मीडिया ने इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर निगरानी रखनी शुरू कर दी, हर राजनीतिक पार्टी के कार्यालयों में सोशल मीडिया की टीम बैठी रहती है, उन्होंने अपना काम करना शुरू कर दिया।

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राजनीतिक पार्टियों ने भी जनता के दिमाग मे बैठा दिया ये कांग्रेसी पत्रकार है, ये बीजेपी पत्रकार है या फिर किसी और राजनीतिक पार्टी का पत्रकार। जब भी कोई पत्रकार ट्वीट करता है, तो सामने वाली पार्टी के पार्टी ऑफिस में बैठे हुए आईटी विभाग के लोग अपशब्द कहना शुरू कर देते है। कई बार पत्रकार ही सोशल मीडिया पर एक दूसरे पत्रकार को टारगेट करते है। पत्रकारों को टारगेट किया जाता रहा है, जो 2014 से पहले नही होता था?

अगर पत्रकार एक नहीं हुए तो देश के चौथे स्तंभ की नींव पर संकट आ सकता है। मैं देखता हूं कि जब पत्रकार रिपोर्ट के लिए फील्ड में निकलते है तो फील्ड में कुछ लोग पहले से इंतज़ार कर रहे होते है कि जब भी ये पत्रकार अपना शो, अपना काम शुरू करेगा हमें इनके काम मे अड़चन डालनी है। चाहे उसके लिए उनको कितने ही पैसे क्यों न खर्च करने पड़ जाएं। उनको टारगेट कर परेशान किया जाता है क्योंकि उनके दिमाग मे उस पत्रकार की जो छवि है, वो दूसरी पार्टी की है जिसको वो पसंद नहीं करता।

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आज जब कोई पत्रकार रोड शो कवर कर रहे हों या रैली तो ये बात अमूमन सुनने को मिल ही जाती है कि फलां पत्रकार, फलां राजनतिक पार्टी का दलाल है, इसको तो वो पार्टी पैसा देती है। पेड मीडिया सुन कर हंसी भी आती है और गुस्सा भी…!

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सवाल ये है कि आखिर कब तक पत्रकार आपस मे लड़ते रहेंगे? वो एकजुट क्यों नहीं हो सकते? पत्रकार एक दूसरे से लड़ते हैं इसीलिए आज चाहे आम आदमी हो, राजनीतिक पार्टी या कोई ओर सभी मीडिया को टारगेट करते हैं। हमें एकजुट होकर जनता की आवाज बनना होगा न की आपस में लड़ते हुए राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता? तय आपको करना है क्या सही है और क्या गलत…!

{लेखक सीएनएन न्यूज 18 में चीफ वीडियो जर्नलिस्ट हैं। वह पिछले दो दशक से मीडिया में सक्रिए हैं।}

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