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रिपोर्ट / केंद्र ने लिया RBI से 1.76 लाख करोड़, तो क्या अर्थव्यवस्था सुधरेगी?

दावा किया जा रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ लेकर मोदी सरकार सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों की हालत ठीक करने में मदद करेगी। लेकिन ये दावा कितना सही है इस बात को लेकर संशय बना हुआ है। बहरहाल सरकार जो भी करे वो सही होता है ऐसा सरकार सोचती है! जनता नहीं, जिसने चुनकर उनको वहां भेजा हुआ है।

लेकिन इसके साथ ही रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की स्वायत्तता को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। पिछले साल आरबीआई के तत्तकालीन गवर्नर उर्जित पटेल और मोदी सरकार में नीतिगत स्तर पर असहमतियां सामने आई थीं और पटेल ने कार्यकाल खत्म होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।

कनाडा की कार्लटन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर विवेक दहेजिया ने आरबीआई के इस फैसले पर फाइनैंशियल टाइम्स से कहा, ‘केंद्रीय बैंक अपनी कार्यकारी स्वायत्तता खो रहा है और सरकार के लालच को पूरा करने का जरिया बनता जा रहा है। इसे रिज़र्व बैंक की विश्वसनीयता कमजोर होगी। जो निवेशक भारत की तरफ देख रहे हैं वो कहेंगे कि आरबीआई पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है। मुझे नहीं लगता कि यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है।’

आरबीआई ने 26 अगस्त, 2019 में कहा कि पिछले वित्तीय वर्ष में हुई कुल आय 17.3 अरब डॉलर और 7.4 अरब डॉलर की सरप्लस राशि वो सरकार को सौंपने जा रहा है। रि़ज़र्व बैंक ने यह भी कहा कि यह ट्रांसफर न्यू इकनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क के तहत है जिसे हाल ही में स्वीकार किया गया है।

यहां सबसे जरूरी बात यह है कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर विमल जालान की अध्यक्षता में एक समिति बनी थी और इसी समिति ने न्यू इकनॉमिक फ्रेमवर्क की सिफारिश की थी। इस समिति की सिफारिशों को आरबीआई ने स्वीकार कर लिया है। आरबीआई इस बात पर सहमत हो गया है कि वो पिछले वित्तीय वर्ष की पूरी आय सरकार को दे देगा। रिज़र्व बैंक के पास सुरक्षित पैसे के इस्तेमाल को लेकर पिछले साल अक्टूबर में ही विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी।

नवंबर 2018 में इंडियन एक्सप्रेस के सनी वर्मा की एक खबर प्रकाशित हुई थी, कि रिज़र्व बैंक ने सरकार को 3 लाख 60 करोड़ रुपए देने से मना कर दिया है। तब सवाल उठा था कि सरकार रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता पर हमला कर रही है। तो उस समय सरकार ने कहा था कि मौजूदा नियम बहुत रुढ़ीवादी सोच के हैं। सरकार और रिज़र्व बैंक को रास्ता निकालना चाहिेए कि 9.56 लाख करोड़ के सरप्लस का कैसे इस्तेमाल हो।   

इस दौरान आरबीआई के तत्कालीन उप गवर्नर विरल आचार्य ने सरकार को चेताया था कि सरकार ने आरबीआई में नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप बढ़ाया तो इसके बहुत बुरे नतीजे होंगे। विरल आचार्य ने कहा था कि सरकार आरबीआई के पास सुरक्षित पैसे को हासिल करना चाहती है। इसके ठीक दो महीने बाद ही उर्जित पटेल ने आरबीआई से इस्तीफ़ा दे दिया था। इसके बाद मोदी सरकार ने शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाया गया।

भारतीय रिज़र्व बैंक के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने ट्विटर पर लिखा…

‘उर्जित पटेल और विरल आचार्य डटे हुए थे। उन्हें जाने पर मजबूर किया गया। तब आरबीआई के किले में सेंध लगी थी, अब किला ही ध्वस्त कर दिया गया है। आरबीआई अपने ही फलसफे के खिलाफ चला गया। सरकार को कुछ फंड मिला लेकिन किस कीमत पर?

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया…

‘प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के पास उनके खुद के द्वारा बनाए गए आर्थिक संकट का कोई समाधान नहीं है। आरबीआई से चोरी करने से काम नहीं चलेगा। यह डिस्पेंसरी से एक बैंड-एड खरीदकर गोली लगने के घाव पर लगाने जैसा है।’ 

देखा जाए तो भारतीय रिज़र्व बैंक ने सरकार को 2004 ले 2014 तक औसतन 20,000 करोड़ रुपए दिए। 2015 से 2019 तक औसतन 54,000 करोड़ रुपए दिए गए। लेकिन 2019-2020 औसतन 1,76,000 करोड़ रुपए अकेले एक वित्त वर्ष में दिए जा रहे हैं।

1991 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो विदेशी मुद्रा का संकट आया तो भारत के पास 15 दिनों के आयात के लिए पैसा था। तब रिज़र्ब बैंक के पास रखा हुआ 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखा गया। क्या हम उस स्थिति से तुलना कर सकते हैं? क्या आज कोई अलग स्थिति है जिसे समझने की जरूरत है? 

भारतीय रिज़र्व बैंक जो पैसा केंद्र सरकार को वो अपने दो खातों से देगा। 1,23,414 करोड़ रुपए आकस्मिक निधि से और 52,637 करोड़ रुपए सरप्लस फंड से। इस बीच भारतीय रिज़र्व बैंक ने एक प्रेस रिलीज जारी की है जिसमें कहा है कि आरबीआई ने इस कदम को उठाने से पहले दुनिया भर के रिज़र्व बैंक के जोखिम का अध्ययन किया है। यह भी देखा कितना पैसा रखा जाना चाहिए तब फैसला लिया गया है। बता दें कि दो तरह की परिस्थिति के लिए रिज़र्व बैंक पैसा रखता है एक मौद्रिक संकट के लिए दूसरा वित्तीय समय के संकट के लिए दोनों संकटों की परिभाषाएं अलग होती हैं।

आरबीआई की आकस्मिक निधि कितनी होना चाहिए? विमल जालान कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि बैलेंस शीट के 6.5 से 5.5% की रेंज में रखा जा सकता है रिज़र्व बैंक ने न्यूनतम रेंज को स्वीकार किया, अधिकतम को नहीं। इस कमेटी के पहले रिज़र्व बैंक की आकस्मिक निधि 6.8% होती थी। बैलेंस शीट के मुताबिक आकस्मिक निधि का स्तर कम-ज्यादा होता रहा है। तो क्या विमल जालान कमेटी ने न्यूनतम रेंज देकर मदद की है?

भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकी अधिकारी प्रणव सेन कहते हैं, न्यूनतम रेंज के कारण रिजर्व बैंक के पास कोई दूसरा स्कोप नहीं बचा है आने वाली सरकारें या यही सरकार आने वाले समय में न्यूनतम रेंज पर ही जोर देती रहेगी।’

रिज़र्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर, विरल आचार्य ने कहा था, अर्जेंटीना की सरकार भी रिज़र्व बैंक के खजाने को हथियाना चाहती थी वहां के गवर्नर ने विरोध में इस्तीफा दे दिया और वहां तबाही आ गई, सरकार जो योजना बना रही है वह टी-20 मैच की तरह है लेकिन रिज़र्व बैंक बहुत आगे की सोच कर योजना बनाता है।’

इस बयान के बाद पूर्व गवर्नर रघुरमन राजन ने सीएनबीसी चैनल से कहा था कि सरकार को रिज़र्व बैंक में हाथ डालने का काम नहीं करना चाहिए। यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है। यदि आप अपना रिज़र्व सरकार को दे देंगे तो भारत की रेटिंग नीचे आ जाएगी। हम क्यों नहीं इस रिज़र्व को बचा कर रख सकते हैं।

अर्थशास्त्र विशेषज्ञ मानते हैं कि देखने वाली बात यह है कि वर्तमान में दुनिया के सभी देशों में अर्थव्यवस्था डगमगाई हुई है ऐसे में ये कदम उठाना नहीं चाहिए। फिलहाल ये वक्त बताएगा कि सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक का यह फैसला कितना सही है?

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