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एसडीजी रैंकिंग / पर्यावरण से जुड़े मुद्दे पर ‘नीति आयोग की नीतियों’ ने बढ़ाई उलझन

चित्र : हुगली नदी में मछली पकड़ता एक मछुआरा। तस्वीर– फिल पार्सोन्स/फ्लिकर

कुंदन पांडे।

  • हर साल की तरह इस साल भी नीति आयोग ने विभिन्न सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को ध्यान में रखते हुए देश के राज्यों की रैंकिंग की है। इसमें भूख, शिक्षा और स्वास्थ्य, गरीबी इत्यादि के आकड़ों के आधार पर राज्यों की रैंकिंग की गयी है।
  • इन लक्ष्यों के अलावा, नीति आयोग की एसडीजी रैंकिंग में आज के समय के अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों भी शामिल हैं। जैसे, जलवायु कार्रवाई, लोगों के लिए ऊर्जा की उपलब्धता, शहरों में जीवनस्तर को सुधारने की कोशिश इत्यादि। हालांकि रैंकिंग के लिए विभिन्न मानक के घालमेल से भ्रम की स्थिति बढ़ी ही है।
  • 2018 की अपनी पहली रिपोर्ट की तुलना में नीति आयोग ने इस बार की रिपोर्ट में कई संकेतक बदल दिए या हटा दिए हैं। उदाहरण के लिए 2018 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घरों की मांग और आपूर्ति का इस्तेमाल किया था पर 2021 की रिपोर्ट में इसका जिक्र तक नहीं है। इससे रैंकिंग पर भी सवालिया निशान खड़ा होता है।

कम से कम 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इक्स्ट्रीम वेदर ईवेंट जैसे बाढ़, लू, बिजली गिरने इत्यादि से या तो कोई मौत हुई नहीं है या इन राज्यों में इन मौतों की गिनती के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। हाल ही में आई नीति आयोग की रिपोर्ट से यही बात निकलती है जबकि केंद्र सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि बिहार, गोवा या झारखंड में ऐसी कई मौतें हुई हैं। ये वही राज्य हैं जिन्होंने नीति आयोग के हालिया रिपोर्ट में मौसम की मार से एक भी मौत दर्ज नहीं किया है।

सतत विकास लक्ष्य के हिसाब से राज्यों की प्रगति के हिसाब से रैंकिंग करने वाली नीति आयोग की सालाना रिपोर्ट  की यह एक झलकी है। वर्ष 2015 में, संयुक्त राष्ट्र ने सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) को अपनाया था। आम आदमी के जीवन स्तर को सुधारने के हिसाब से ये 17 लक्ष्य 2030 तक हासिल कर लिए जाने हैं। इन लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा को लोगों तक पहुंचाना, असमानता को कम करना इत्यादि शामिल है। इन लक्ष्यों में आज के समय की कुछ बड़ी चिंताओं को भी शामिल किया गया है, जैसे जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिश इत्यादि। कुल 17 में से सात लक्ष्य ऐसे हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। इनमें जल जीवन, वन और हरियाली, ऊर्जा की उपलब्धता इत्यादि शामिल है।

हमने, नीति आयोग द्वारा 3 जून को जारी की गई इस रिपोर्ट के आंकड़े के माध्यम से इन मुद्दों के कुछ अहम पहलू को रेखांकित करने की कोशिश की है।

एसडीजी के 17 लक्ष्यों में से सात लक्ष्यों पर राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों की प्रगति जानने के लिए बाएं/दाहिने क्लिक करें। हरेक राज्य का स्कोर जानने के लिए वहां कर्सर ले जाएं। आंकड़े एसडीजी इंडिया इंडेक्स और डैशबोर्ड 2020–21. 
इस रिपोर्ट की कुछ खास बातें

एसडीजी का लक्ष्य-6 ‘स्वच्छ पानी और स्वच्छता’ की बात करता है। इसके तहत सभी लोगों के लिए पीने के स्वच्छ पानी सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य के आकलन के लिए कुल आठ संकेतकों का उपयोग किया गया है। नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के केवल 88.40% उद्योग ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मानदंडों के अनुसार अपशिष्ट जल का उपचार करते हैं। इस श्रेणी में दिल्ली का स्तर सबसे खराब है जहां महज 53.44 फीसदी उद्योग ही इस मानक का पालन कर रहे हैं। इसमें ग्रामीण आबादी के पीने के पानी उपलब्ध होने का भी आकलन किया गया है। असम (74.72%), त्रिपुरा (84.84%) जैसे राज्यों को इस क्षेत्र में अभी बहुत काम करने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल 51 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को ही पाइप से पेयजल की आपूर्ति की जाती है।

लक्ष्य-7 सस्ते और स्वच्छ ऊर्जा की बात करता है। इस लक्ष्य में सभी के लिए सस्ती, स्थायी और आधुनिक ऊर्जा को लोगों के लिए सुलभ बनाना है। इसके आकलन के लिए, नीति आयोग ने दो राष्ट्रीय स्तर के संकेतकों को चुना है। इसमें घरों में बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराना और एलपीजी+ पीएनजी कनेक्शन उपलब्ध कराना शामिल है। आयोग ने 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 100 अंक दिए हैं। हालांकि इन दो लक्ष्यों से सस्ती, स्थायी और आधुनिक ऊर्जा के सुलभ होने का पता नहीं चलता है।

लक्ष्य-11 में शहरों और वहां रहने वाले समुदायों के जीवन स्तर के बारे में बात की गयी है। इसके आकलन के लिए आठ संकेतकों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें से एक है ड्रेनेज की सुविधा। इस मानदंड पर, पूर्वोत्तर राज्य जैसे अरुणाचल प्रदेश (59.4%), नागालैंड (59.5%), मिजोरम (52%) राष्ट्रीय औसत 87.6 (%) से काफी पीछे हैं। लक्ष्य की निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण संकेतक है कुल सीवेज से निकलने वाले कचरे के अनुपात में कचरा-उपचार की कुल क्षमता। राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश को महज 38.86 अंक मिले हैं।

लक्ष्य-12 में खपत और उत्पादन को पर्यावरण के हित में बनाने की बात की गयी है। इसके लिए नीति आयोग ने सात संकेतकों का इस्तेमाल किया है, जिनमें प्रति व्यक्ति जीवाश्म ईंधन की खपत, प्रति 1,000 आबादी पर उत्पन्न होने वाला प्लास्टिक कचरा, बायो मेडिकल वेस्ट (बीएमडब्ल्यू) के निष्पादन को शामिल किया गया है। जब पूरी दुनिया महामारी का सामना कर रही है और बीएमडब्ल्यू एक गंभीर चिंता का विषय है, यह जानना दिलचस्प है कि बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बमुश्किल 25 प्रतिशत ऐसे कचरे का ही सही से निष्पादन हो पाता है।

लक्ष्य-13 में जलवायु से जुड़ी कार्रवाई की बात की गयी है। नीति आयोग ने इस मानदंड पर राज्यों को रैंक करने के लिए पांच संकेतकों का उपयोग किया है। दिलचस्प बात यह है कि बिहार को यहां महज 16 (100 में से) अंक मिले हैं। यह राज्य पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन से लड़ने के अपने प्रयासों के बारे में जोर शोर से चर्चा करता रहा है। इस राज्य में एक जलवायु परिवर्तन प्रभाग की स्थापना भी की गयी है। इतने हो हल्ला के बावजूद भी राज्य मौसम की मार से होने वाली मौतों की गिनती के लिए एक तंत्र नहीं विकसित कर पाया है। नीति आयोग की रिपोर्ट में यह बताया गया है। जबकि केंद्र सरकार का अपना रिकॉर्ड बताता है कि 2019 में मौसम की मार की वजह से 690 लोगों की जान गयी है।

एसडीजी-14 में ‘जल जीवन’ के स्तर की बात की गयी है। इसके लिए नीति आयोग ने केवल नौ राज्यों को ही रैंकिंग में शामिल किया है जो समुद्र तट पर स्थित हैं। इनमें से तमिलनाडु का स्कोर सिर्फ 11 है। आयोग ने राज्यों को रैंक करने के लिए पांच संकेतकों का इस्तेमाल किया है। इसमें मैंग्रोव क्षेत्र की वृद्धि शामिल है। इस मानदंड पर तमिलनाडु ने नकारात्मक स्कोर किया है जबकि महाराष्ट्र में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई है।

एसडीजी-15 में जमीन पर जीवन स्तर की बात की गयी है। इसमें पारिस्थितिक तंत्र के सही उपयोग, जंगलों का स्थायी प्रबंधन, मरुस्थलीकरण को कम करना, भूमि क्षरण को रोकना और जैव-विविधता के नुकसान को रोकना इत्यादि शामिल है। नीति आयोग ने राज्यों की रैंकिंग के लिए कुल छह मानदंडों का इस्तेमाल किया है। इसमें कुल भौगोलिक क्षेत्र में वन-क्षेत्र का प्रतिशत, कुल भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में वृक्षारोपण, मरुस्थलीकरण के क्षेत्र में प्रतिशत वृद्धि और वन्यजीवों से जुड़े दर्ज मामले को शामिल किया गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने में हरियाणा, मिजोरम, पंजाब और राजस्थान ने सबसे खराब प्रदर्शन किया है।

समय के साथ संकेतक बदलने से स्थिति अस्पष्ट

दिलचस्प बात यह है कि नीति आयोग अपने एक संकेतक को कभी एक लक्ष्य के लिए तो कभी दूसरे लक्ष्य के लिए इस्तेमाल करता रहा है। उदाहरण के लिए, इसने 2018 की रिपोर्ट के दौरान लक्ष्य-6 में ‘शहरी क्षेत्रों में निर्मित सीवेज के अनुपात के रूप में स्थापित सीवेज उपचार क्षमता’ को शामिल किया था। वहीं 2021 की रिपोर्ट में इसे लक्ष्य-11 के लिए संकेतक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। खास बात यह है कि पिछले चार वर्षों में नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सीवेज उपचार क्षमता में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई है।

इसी तरह 2018 की रिपोर्ट में, नीति आयोग ने किफायती और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य (लक्ष्य-7) के आकलन के लिए कुल स्थापित ऊर्जा क्षमता में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी को एक संकेतक माना था। हालिया रिपोर्ट में इसे हटाकर लक्ष्य-13 (जलवायु कार्रवाई) के संकेतक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है।

एसडीजी-11 (सस्टेनेबल सिटीज एंड कम्युनिटीज) के तहत वर्ष 2018 में इस्तेमाल किए गए एक संकेतक को हटा ही दिया गया है। तीन साल पहले आए इस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कितने जरूरतमंदों को घर उपलब्ध कराया गया, एक संकेतक था। और देश को 100 में 3.32 अंक मिले। हालिया रिपोर्ट में इस संकेतक को हटा ही दिया गया है। हर साल की रिपोर्ट में संकेतक बदलने या मानदंड के बदलते जाने से एसडीजी को लेकर नीति आयोग का स्पष्ट समझ बनाने का लक्ष्य ही हासिल नहीं हो पा रहा है।

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