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कतर्नियाघाट / …तो क्या तराई क्षेत्र में बढ़ रही, ‘गिद्धों की संख्या’?

चित्र : अंकित सिन्हा/उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद के कतर्नियाघाट इलाके में गिद्धों की वापसी हो रही है। इसकी एक वजह इलाके में ऊंचे पेड़ों की उपलब्धता भी है, जहां गिद्ध आराम फरमाते हैं।

– अज़ीम मिर्जा।

  • गिद्धों की कम होती संख्या का असर तराई इलाके के कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य में भी पड़ा था लेकिन गिद्धों की गणना की ताज़ा रिपोर्ट में यहां 159 गिद्ध पाए गए है। तीन साल पहले यहां गिद्धों की संख्या महज नौ बतायी गई थी।
  • उत्तर प्रदेश राज्य विविधता बोर्ड के सहयोग से गिद्धों के गणना का यह प्रोजेक्ट करीब दो साल चला जिसमें कुल 41 टीम बनायी गयी थी जिसने इस गणना को संभव बनाया।
  • हालांकि विशेषज्ञों की राय है कि सिर्फ एक सर्वेक्षण के आधार पर यह खुशफहमी पालना गलत होगा कि गिद्धों की संख्या में कोई वृद्धि हो रही है। किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए विशेषज्ञ कम से कम पांच साल के ट्रेंड का इंतजार करने का सलाह देते हैं।

पांच साल पहले तक गिद्धों की घटती संख्या सबके लिए चिंता की बात थी। गिद्धों की संख्या सन 1980 तक भारत में चार करोड़ से भी ऊपर थी लेकिन 2017 तक आते-आते इनकी संख्या मात्र 19 हज़ार रह गई।  कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग भी इससे अछूता नहीं रहा। लेकिन अच्छी खबर यह है कि अब इन गिद्धों की वापसी हो रही है।

उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद के कतर्नियाघाट इलाके में हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात स्पष्ट हुई कि इस इलाके में गिद्धों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इनकी गिनती के लिए वन विभाग ने 41 टीमें बनाई थीं जिसने जीपीएस के माध्यम से टैगिंग करके तस्वीरों को एकत्रित करने का काम किया। इस अध्ययन में सर्वे में पाया गया कि तीन साल में यहां गिद्धों की संख्या नौ से बढ़कर 159 हो गयी है। 

लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान की प्रोफेसर और वन्य जीव संस्थान की निदेशक अमिता कन्नौजिया के नेतृत्व में गिद्धों की यह गणना संपन्न हुई है। इसके लिए उत्तर प्रदेश राज्य विविधता बोर्ड ने 30 लाख रुपये का सहयोग किया और साथ ही इस प्रोजेक्ट में वर्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) और वन विभाग का सहयोग भी मिला है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की तरफ से दबीर हसन को ऑब्जर्वर के तहत नियुक्त किया गया था।

पूर्व कार्यकारी प्रभागीय वनाधिकारी यशवंत सिंह ने बताया था कि कतर्नियाघाट का जो दक्षिणी पूर्वी हिस्सा है जो ककरहा रेंज के दक्षिणी हिस्से से लेकर कतर्नियाघाट तक में बहुतायत की संख्या में इधर गिद्ध देखे जा सकते हैं। इनके अनुसार सन 2018 में गिद्धों की गणना कराई गई थी और उस समय सिर्फ नौ गिद्ध ही मिले थे। फिर 2020 में गणना कराई गई उसमें 35 गिद्ध मिले।

अभी 15 जनवरी 2021 को प्रोफेसर अमिता कन्नौजिया के निर्देशन में गणना कराई गई और सुखद बात है कि उसमें यहां गिद्धों की संख्या 159 पाई गई। पूर्व कार्यकारी प्रभागीय वनाधिकारी यशवंत सिंह का कुछ दिन बाद कोरोना के कारण निधन हो गया। खास तौर पर कतर्नियाघाट में गिद्धों की संख्या बढ़ने की प्रथम दृष्टया एक वजह ही यह समझ आती है कि यहां छोटे बड़े हर आकार के पेड़ उपलब्ध हैं। इसके साथ यहां भोजन-पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, अमिता कन्नौजिया कहती हैं।

कैसे होती है गिद्धों की गणना

कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग का वह इलाका जहां गिद्ध निवास करते हैं। यह इलाका हिमालय का तलहटी क्षेत्र है इसलिए यहां की आबो-हवा पशु पक्षियों को पसंद है। इस इलाके में यूरेशियन ग्रिफॉन, रेड हेडेड (राज गिद्ध) सेनेरियस, इजिप्शियन प्रजाति के गिद्ध पूरे वर्ष पाए जाते हैं जबकि जाड़े में यहां हिमालयन ग्रिफॉन भी आ जाता है।

इन गिद्धों की गणना कैसे होती है? इस सवाल को अपने प्रोजेक्ट के मध्यम से समझाते हुए अमिता कन्नौजिया ने बताया कि हमारे प्रोजेक्ट में दो बार गणना होनी थी। एक बच्चा निकलने से पहले जो हो चुकी है। दूसरी गणना गिद्ध के बच्चे निकलने के बाद। गणना सटीक हो इसके लिए एक ही दिन में सुबह और शाम को गणना कराई जाती है। गणना करने से पहले हमने वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की ट्रेनिंग हुई है जिसमें बहुत सारे ब्योरे साझा किये गए, जैसे कौन सी प्रजाति का गिद्ध क्या खाता है, कितनी दूर तक खाना लेने जाता है, क्यों वह एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं इत्यादि। नौ प्रकार के गिद्धों को पहचानने के तरीके सिखाए गए जैसे यह बताया गया कि स्वदेशी गिद्ध की चमड़ी काली और विदेशी नस्ल के गिद्धों की चमड़ी गुलाबी होती है।

किस तरह होती है गिद्धों की गणना इसके सम्बन्ध में अमिता कन्नौजिया ने बताया कि यहां 41 टीमें बनाई गई थीं जो सुबह 5 से 8 और शाम 4-6 बजे के बीच उन इलाकों में फैल जाती थीं। उन इलाकों में जहां गिद्धों के मौजूद होने का अनुमान है। यह बात गौर करने की है कि गिद्ध सुबह के समय अपने बसेरे में रहता है। गिद्ध एक बड़ा पक्षी है और यह छोटी चिड़िया जैसे गौरैया की भांति इधर-उधर नहीं भागता है। बल्कि यह समूह में रहने वाला पक्षी है। यह कहीं 25 के समूह में तो कहीं 50 के समूह में मिलेगा। हालांकि इनके समूह में सिर्फ एक प्रजाति का गिद्ध हो ऐसा नहीं, बल्कि जो प्रजातियां इस इलाके में पाई जाती है उनमें से कई प्रजाति के गिद्ध एक जगह पर मिल सकते हैं। भोजन ढूंढने के वास्ते ये लम्बी उड़ान पर चले जाते हैं इसलिए इनकी गिनती सिर्फ सुबह और शाम को हो पाती है।

उन्होंने आगे बताया कि गिद्ध की मादा एक साल में सिर्फ एक अन्डा देती है। जब मादा गिद्ध 5 से 6 साल की हो जाती है तभी अन्डा देना शुरू करती है। औसतन गिद्ध 40 से 50 साल तक जीवित रहता है। यह अपने परिवार को बढ़ाने के लिए सितम्बर से  घोसला बनाना शुरू करते हैं और नवम्बर से दिसम्बर में तक अंडा देते है इनके अंडे से 55 दिन में बच्चा निकलता है।

अमिता कन्नौजिया ने बताया कि गिद्घ के अंडे से निकला बच्चा साढ़े तीन से चार महीने घोसले में ही रहता है गिद्ध की यह खास बात है कि जब तक इनके अंडे में से बच्चा नहीं निकल आता तब तक नर व मादा दोनों अंडे को बदल-बदल कर सेते है। जब तक बच्चा उड़ कर खुद खाना न खाने लगे तब तक माता-पिता दोनों उसके भोजन की व्यवस्था करते हैं। 

घटने-बढ़ने को लेकर पांच साल के ट्रेंड पढ़ने की जरूरत

कतर्नियाघाट इलाके में गिद्धों की बढ़ती संख्या के सम्बन्द्ध में बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसायटी के प्रमुख वैज्ञानिक विभु प्रकाश बताते हैं कि उनका कहना है कि तराई की भौगोलिक स्थित बहुत अच्छी है फिर भी गिद्धों की एक-दो गणना से यह कहना ठीक नहीं होगा कि गिद्धों की संख्या बढ़ रही है। तराई में गिद्धों का ज़्यादा दिखाई देने की एक वजह यह भी हो सकती है कि उस इलाके में हिमालियन गिद्ध काफी आते हैं। गिद्धों की संख्या का सटीक आंकड़ा जानने के लिए कम से कम 5 साल तक बराबर गणना की जानी चाहिए तभी हम किसी नतीजे पर पहुंच सकते हैं। उन्होंने बताया कि गिद्ध भोजन तलाशने के लिए 100 किलोमीटर तक जा सकता है।

इनके उड़ने की क्षमता पर विभु प्रकाश कुछ मजेदार तथ्य बताते हैं। जैसे कि जब यह विशाल पक्षी गरम हवाओं के ऊपर जाता है तो बहुत तेज़ी से उड़ता है। गिद्ध साथ-साथ उड़ते हैं और एक दूसरे को खाना ढूंढने में मदद करते हैं। यह उड़ते-उड़ते नीचे देखते रहते हैं और जैसे ही कुछ खाना पड़ा होने का अंदेशा हुआ तो झुंड में से एक गिद्ध थोड़ा नीचे आ जाता है और उसे खाना दिखाई दिया तो वह एकदम नीचे नहीं उतरेगा बल्कि एक जगह पर ही तेज़ी से गोल-गोल घूमने लगेगा ताकि दूसरे साथी गिद्ध जान जाएं कि नीचे कुछ खाना है इसलिए नीचे उतरना है।

गिद्ध के बारे में देखा गया है कि यह भोजन ढूढने के लिए 100 किलोमीटर तक चले जाते हैं और फिर कई बार खाना खाकर वापस अपने स्थान पर आ जाते हैं। गिद्ध प्रजाति के पक्षियों के विशेषज्ञ विभु प्रकाश बताते हैं कि गिद्ध एक दवा के कारण खत्म हुए जिसका नाम है डाईक्लोफेनिक। यह दवा मवेशियों को दी जाती थी वह मवेशी जब मर जाता था तो उसको गिद्ध खाते थे। इससे उनके किडनी इत्यादि कमजोर हो जाते थे। मादा के अण्डे का खोल कमजोर हो जाता था और जब मादा अण्डे पर बैठती थी तो उसके वज़न से अंडा फुट जाता था।  पर सरकार ने उस दवा पर 2006 में पाबंदी लगा दी।

डाइक्लोफेनिक की जगह मिलाक्सीकैम नाम की दवा अब आ गई है अगर वह जानवरों को दिया जाए तो उससे गिद्धों कोई नुकसान नहीं होता।क्या आगे गिद्धों की संख्या पर नजर रखने का कोई योजना है, इसका जवाब देते हुए अमिता कन्नौजिया ने बताया कि यह प्रोजेक्ट दो साल का था जो खत्म होने को आया है अब इसकी हमें मैपिंग करके रिपोर्ट देनी है। आगे की योजना अभी स्पष्ट नहीं है।

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