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साइबर क्राइम / 10 करोड़ भारतीयों का निजी डेटा खतरे में, ‘डार्क’ वेब पर बेचा जा रहा

प्रतीकात्मक चित्र।

यह मोबाइल से लेनदेन करने वालों को सतर्क करने वाली खबर है। साइबर सिक्योरिटी रिसर्चर राजशेखर राजहारिया और फ्रेंच साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट ईलियट एंडरसन का दावा है कि 10 करोड़ भारतीयों का व्यक्तिगत डेटा एक हैकर फोरम ‘डार्क’ वेब पर बेचने के लिए डाला गया है।

एक हिंदी दैनिक अखबार को राजशेखर ने बताया कि डेटा एक पेमेंट एप का इस्तेमाल करने वाले यूजर्स का है। हैकर्स इसे 26 मार्च से ऑनलाइन बेच रहे हैं। सूत्रों के अनुसार डेटा 1.5 बिटकॉइन (63 लाख रुपए) में बेचा जा रहा है। दरअसल, साइबर सुरक्षा को लेकर भारत में कड़े कानून नहीं है, जो हैं वो समय के मुताबिक पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। केंद्र और राज्य सरकार ने साइबर सुरक्षा को लेकर कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाया है।

डार्क वेब एक ऐसी जगह पनपता है जहां गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है। जिनमें ड्रग्स, अवैध वित्तीय और अश्लील वीडियो, लाइव मर्डर, मानव अंगों की तस्करी, बायोलॉजिकल एक्सपेरिमेंट्स तक शामिल हैं। डार्क वेब पर मौजूद वेबसाइट्स का यूआरएल काफी अलग होता है। इन वेबसाइट्स का डोमेन नेम भी .onion होता है डार्क वेब पर हैकर्स सक्रिय रहते हैं। डार्क वेब इंटरनेट कि वह काली दुनिया है जहां दुनिया भर के गैर कानूनी काम होते हैं।

डार्क वेब को जानने से पहले आपको वर्ल्ड वाइड वेब यानी डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू के बारे में समझना होगा। वर्ल्ड वाइड वेब दरअसल एक विश्वस्तरीय डिजिटल लाइब्रेरी है जहां दुनियाभर के इंफॉर्मेशन न्यू मॉडल्स के रूप में मौजूद हैं। वर्ल्ड वाइड वेब को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा गया है पहला सर्फेस वेब और दूसरा डीप वेब। सर्फेस वेब में मौजूद जानकारी को सर्च इंजन द्वारा आसानी से खोजा जा सकता है। साथ ही गूगल क्रोम जैसे किसी भी नॉर्मल ब्राउज़र से एक्सेस किया जा सकता है। गूगल, फेसबुक, टि्वटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, टेलीग्राम और यूट्यूब जैसे करोड़ों वेबसाइट इसी सर्फेस वेब में मौजूद हैं। जिसे हम डार्क वेब, डार्क नेट या ब्लैक वेब के नाम से जानते हैं। अगर सरल भाषा में कहें तो डार्क वेब इंटरनेट का वह हिस्सा है जिसे Google जैसे पारंपरिक सर्च इंजन के माध्यम से एक्सेस नहीं किया जा सकता है।

डार्क वेब पर मौजूद किसी भी चीज को इंटरनेट सर्च में नहीं देखा जा सकता है। इससे अपनी पहचान गुप्त रखने में मदद मिलती है। डार्क वेब, वेब का ही एक हिस्सा है जो एक व्यापक रूप से काम करता है जिसमें आपके बैंक स्टेटमेंट जैसी चीजें भी शामिल हैं जो ऑनलाइन उपलब्ध हैं लेकिन सामान्यीकृत इंटरनेट खोजों में नहीं ढूंढी जा सकती। डार्क वेब उपयोगकर्ता नियमित वेब को सर्फेस वेब के रूप में संदर्भित करते हैं।

डार्क वेब का उपयोग कैसे किया जाता है?

डार्क वेब अज्ञात नेटवर्क के माध्यम से उपयोग किया जाता है। इस दिशा में सबसे चर्चित टीओआर ब्राउज़र का इस्तेमाल डार्क वेब तक पहुंचने में किया जा सकता है , जिसे शार्ट में दी अनियन रिंग भी कहा जाता है। यह एक मुफ्त सॉफ्टवेयर है जो उपयोगकर्ता इंटरनेट से गुमनाम रूप से डार्क वेब पर डाउनलोड करते हैं। 1990 के मध्य में संयुक्त राज्य अमेरिका के नौसेना अनुसंधान प्रयोगशाला के कर्मचारियों द्वारा अमेरिकी खुफिया संचार को ऑनलाइन संरक्षित करने के लिए विकसित किया गया।

फरवरी 2016 में, ‘क्रिप्टोपॉलिटिक एंड द डार्कनेट’ नामक एक अध्ययन में, किंग्स कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं डैनियल मूर और थॉमस रिड ने अपनी सामग्री का विश्लेषण करने के लिए टीओआर नेटवर्क के एक हिस्से को पांच सप्ताह की अवधि के लिए खंडित किया। जहां 2,723 वेबसाइटों में से 1,547 यानी 57 प्रतिशत ड्रग से जुड़े (423 साइटों, अवैध पोर्नोग्राफी (122) और हैकिंग (96) से लेकर अन्य अवैध सामग्री के रूप में वर्गीकृत थे।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नेटफ्लिक्स जैसी स्ट्रीमिंग साइटों के लॉग-इन विवरणों को सस्ते दरों पर डार्क वेब मार्केटप्लेस पर बेचे जा रहे थे। सबसे बदनाम डार्क वेब मार्केटप्लेस में से एक सिल्क रोड था, जिसे अवैध रूप से ड्रग्स बेचने के लिए जाना जाता था जिसका अंततः एफबीआई द्वारा भंडाफोड़ किया गया था।

डार्क वेब का दूसरा पहलू क्या है?

इस नेटवर्क का उपयोग एक्टिविस्टों द्वारा किया जाता है, विशेष रूप से उनके द्वारा जो बिना किसी सरकारी सेंसरशिप के संवाद करना चाहते हैं। टीओआर नेटवर्क का उपयोग एक्टिविस्टों द्वारा अरब स्प्रिंग के दौरान किया गया था। यह शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए बड़ी वर्चुअल लाइब्रेरी का भी काम करता है।

लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियां ​​क्या करती हैं?

पश्चिमी देशों में अपराधियों को पकड़ने के लिए कम्युनिकेशन को डिक्रिप्ट करने पर एक बहस चल रही है, जिसका एक्टिविसिटों द्वारा विरोध किया गया है क्योंकि यह सभी के डेटा को जोखिम में डाल सकता है। साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में कुछ एफबीआई अधिकारी डार्क वेब पर अंडरकवर हो जाते हैं ताकि वहां चल रही अवैध गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। भारत में भी पिछले कुछ साल में ऐसे मामले सामने आए थे जब चेन्नई और मुंबई में LSD को डार्क वेब का उपयोग करते हुए पासवर्ड से खरीदा गया था।

1 अप्रैल 2021 से लागू होने वाले थे नए नियम

साइबर क्राइम को रोकने की दिशा में आरबीआई ने एक पहल की थी, लेकिन हालही में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों और पेमेंट गेटवे कंपनियों को राहत दी। उसने बैंकों के लिए ऑटो डेबिट के नए नियमों का पालन करने की खातिर डेडलाइन बढ़ा दी है। इसे बढ़ाकर 30 सितंबर 2021 किया गया है। यह समय सीमा 31 मार्च 2021 को समाप्‍त हो रही थी। इसका मतलब यह है कि ऐसे ऑटोमेटिक रेकरिंग पेमेंट पर फिलहाल असर नहीं पड़ेगा जिनके लिए ई-मैंडेट (ई-मंजूरी) जरूरी होता है यानी इस व्‍यवस्‍था के जरिए नियमित रिचार्ज और बिजली-पानी के बिलों का भुगतान पहले की तरह ही होगा।

इसके पहले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 31 मार्च के बाद एडिशनल फैक्‍टर ऑथेंटिकशन (एएफए) या यूं कहें तो वेरिफिकेशन के लिए अतिरिक्त उपायों को अनिवार्य किया था। बैंकों और पेमेंट गेटवे (पेमेंट सुविधा प्रदान करने वाले प्‍लेटफॉर्म) ने ऑटोमैटिक रेकरिंग पेमेंट को लेकर आरबीआई के निर्देश के अनुपालन के लिए अतिरिक्त समय मांगा था।

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