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स्मृति शेष / प्रणव मुखर्जी की वो अधूरी इच्छा, जो कभी पूरी ना हो सकी

भारत रत्न प्रणव मुखर्जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, वो भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के कद्दवार नेता थे। राजनीतिक विरोधी उनके प्रशंसक थे, तो जिस पार्टी में वो रहे उनके लिए वो संकट-मोचक थे।

भारत के 13वें राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के जीवन में प्रधानमंत्री बनने का अवसर तीन बार आया, पहला तब, जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई लेकिन इस पद पर उस समय राजीव गांधी सुशोभित हुए। दूसरा अवसर तब आया जब राजीव गांधी की हत्या हुई, तब प्रणव मुखर्जी को किनारा कर पी.वी. नरसिंह राव को प्रधानमंत्री बनाया गया और तीसरा अवसर तब जब सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात हो रही थी, लेकिन मामला विवाद में था तो प्रणव मुखर्जी प्रधानमंत्री बन सकते थे लेकिन उस समय डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी के लिए पार्टी ने नाम आगे किया।

बहरहाल, यदि प्रणव मुखर्जी प्रधानमंत्री बनते तो भारत की तस्वीर कुछ बदली-बदली सी होती लेकिन ऐसा ना हो सका। जब वो राष्ट्रपति बने तो उन्होंने अपने ज्ञान, विवेक और देशहित के जुनून को साबित करते हुए विपक्ष के साथ तालमेल बनाकर कई फैसले लिए उनका एक बड़ा फैसला यह भी था कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन को आम जनता के लिए खोल दिया। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वो किसी विवाद में नहीं पड़े। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों का सम्मान पाने में सफल रहे। उन्होंने राष्ट्रपति भवन को जनता के लिए खोला और कई लोगों को वहां रहने के लिए आमंत्रित किया।

प्रणब मुखर्जी को पढ़ने का बहुत शौक था लेकिन सिनेमा में उनकी कोई रूचि नहीं थी। 2006 में रक्षा मंत्री के पद पर रहते हुए, उन्होंने आमिर खान की रंग दे बसंती देखी थी वजह थी सशस्त्र बलों को उस फिल्म के कुछ दृश्यों पर आपत्ति थी। इससे पहले उन्होंने सत्यजीत रे की जलसाघर (1958) देखी थी।

1986 में द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के लिए, पत्रकार प्रीतीश नंदी ने जब प्रणब मुखर्जी का इंटरव्यू किया, जिसका शार्षक था द मैन हू न्यू टू मच (वो इंसान जो कुछ ज़्यादा ही जानता था) यह प्रकाशित होने पर उनकी पार्टी ने उन्हें निकाल दिया। इसके बाद प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस की स्थापना की और तीन साल गुमनामी में गुजारे, फिर वो दिन भी आया जब उनकी मूल पार्टी यानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में वापसी हुई।

अपनी आत्मकथा में, उन्होंने जिक्र किया कि 2004 में सोनिया गांधी के पीएम बनने से इनकार करने के बाद वो अपेक्षा कर रहे थे कि सोनिया इस पद के लिए उन्हें नामांकित करेंगी। वो लिखते हैं, ‘कांग्रेस पार्टी के भीतर आमराय ये थी कि इस पद पर किसी ऐसे सियासी लीडर को बैठना चाहिए जिसके पास पार्टी मामलों और प्रशासन दोनों का अनुभव हो। उस समय ये अपेक्षा की जा रही थी कि सोनिया गांधी के मना करने के बाद प्रधानमंत्री के लिए अगली पसंद मैं बनूंगा’।

उन्होंने अपनी जीवनी द टर्ब्युलेंट इयर्स:1980-1996 के दूसरे हिस्से में लिखा है, ‘मैं सिर्फ यही कह सकता हूं कि उन्होंने गलतियां कीं और मैंने भी की। वो दूसरों के असर में आ गए और मेरे खिलाफ उनके झूठे आरोपों को सच मान लिया।

आत्मकथा के तीसरे भाग कोलिशन इयर्स: 1996-2012 में वो लिखते हैं, ‘एक बार फिर 2012 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले मुखर्जी के मन में ‘हल्का सा ख़याल’ था कि अगर सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति ऑफिस के लिए मनमोहन सिंह को चुन लिया तो फिर वो साल 2014 में ‘प्रधानमंत्री के लिए मुझे चुन सकती हैं’। ये वो बात थी, जो बताती है उनकी प्रधानमंत्री बनने के ख्वहिश अधूरी रह गई थी, लेकिन वो देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न और सर्वोच्च पद यानी राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए।

राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने अजमल कसाब, अफजल गुरू और याकूब मेमन समेत 30 दया याचिकाओं को खारिज कीं। उन्होंने राज्य सरकारों के दो बिलों, गुजरात के आतंकवाद विरोधी बिल और दिल्ली सरकार के लाभ के पद बिल को मंज़ूरी नहीं दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके द्वारा मिले मार्गदर्शन के लिए सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ की और 2019 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। जून 2018 में वो राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ के बुलावे पर उसके मुख्यालय नागपुर गए। जहां बीजेपी के हल्कों में उनकी तारीफ़ हुई, वहीं कांग्रेस को उनका ये कदम नागवार गुजरा।

उन्होंने आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगवार की तारीफ की, लेकिन साथ ही नागपुर में प्रणब मुखर्जी ने आरएसएस के मंच से कहा कि देश की राजनीति में नफरत और असहनशीलता के लिए कोई जगह नहीं है। वह अपने साथ एक डायरी रखते हैं जो पिछले 40 सालों से उनके पास है, जिसे उन्हें निधन के बाद ही प्रकाशित किया जाएगा।

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