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अयोध्या / 10वीं शताब्दी में भी तोड़ा गया मंदिर, तो क्या मिल सकता है खजाना?

अयोध्या में जब-तक राम का नाम है, तब-तक मंदिर रहेगा। रहना भी चाहिए वजह कई हैं। राम आज के इंसान के लिए एक पूरी पाठशाला हैं यदि उनके चरित्र को पढ़ कर आत्मसात करें तो काफी हद तक राम की तरह बना जा सकता है लेकिन राम बनना इतना आसान नहीं है। राम बनने के लिए त्याग करना होगा। आजीवन मर्यादा का पालन करना होगा यानी वो हर काम जो राम ने किया वो करना होगा, उनके आदर्शों पर चलना पूरी तरह खरा उतरना इंसान के वश में नहीं। बात हम इस दौर की करें तो ये मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं।

पिछले दिनों अयोध्या में श्रीराम मंदिर की नींव रखी गई। प्रधानमंत्री भी मौजूद थे, जिन्हें वहां होना चाहिए था वो नहीं थे। क्यों नहीं थे इस पर चर्चा शुरू होकर खत्म हो चुकी है लेकिन एक चर्चा इन दिनों फिर से सुर्खियों में बनीं है, वो यह कि राम मंदिर के अस्तित्व की जांच के लिए अब फिर से खुदाई शुरू हो गई है। 17 साल पहले जब खुदाई करने वाली एएसआई की टीम ने कहा था कि ईसा पूर्व का 1600 साल पुराना इतिहास यहां छिपा है तब से राम मंदिर की प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है।

एएसआई टीम ने उस वक्त 6 माह में 90 ट्रंच खुदाई कर छानबीन की थी। टीम लीडर बुद्ध रश्मि मणि ने अब जानकारी दी है कि राम मंदिर निर्माण के दौरान अभी जिस जगह मानस भवन है, वहां नए मंदिर का सिंह द्वार बनेगा। अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि पर एक बार फिर खुदाई की तैयारी है लेकिन, किसी पुरातात्विक साक्ष्य के लिए नहीं, बल्कि इस बार नए राम जन्मभूमि मंदिर का आधार तय किया जाना है। उम्मीद है कि नींव की खुदाई में पुरातात्विक इतिहास का खजाना सामने आ सकता है।

जन्मभूमि के नीचे 9 काल और ईसा पूर्व 1600 साल के पुरातात्विक इतिहास की पर्तें दबी हैं। नए मंदिर का गर्भगृह उसी स्थान पर बन रहा है। जहां 2003 के पुरातात्विक खनन के दौरान प्राचीन मंदिर का गर्भगृह मिला था। समय के पन्नों को पलटें तो 2003 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश से खुदाई कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम ने बुद्ध रश्मि मणि और हरि मांझी के नेतृत्व में रिपोर्ट सौंपी थी। इस टीम का नेतृत्व करने वाले एएसआई के तत्कालीन अधीक्षक बुद्ध रश्मि मणि ने 17 साल बाद जानकारी उजागर की।

पुरातात्विक सामग्री संरक्षित करे ट्रस्ट

एक प्रमुख हिंदी दैनिक अखबार को दिए इंटरव्यू में बीआर मणि कहते हैं, ‘श्रीराम जन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान प्राचीन मंदिर के महत्वपूर्ण अवशेष सामने आए हैं। जन्मभूमि की नींव की खुदाई के दौरान बेहद प्राचीन मंदिर का ढांचा और अहम पुरातात्विक सामग्री मिलेगी। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को कोशिश करनी चाहिए कि मंदिर निर्माण को प्रभावित किए बिना पुरातात्विक सामग्री को कुछ मात्रा में जरूर संरक्षित करें।

कोर्ट ने अपने आदेश में पूरी टीम को निर्देश दिया था कि इस बारे में वे किसी से कोई चर्चा नही करेंगे। इसके लिए सभी से शपथपत्र भी लिया गया था। इस टीम में चार मुस्लिम पुरातत्वविद एआर सिद्दीकी, जुल्फिकार अली, जीएस ख्वाजा और एए हाशमी भी शामिल थे। करीब छह महीने तक 90 ट्रंच की छानबीन कर रिपोर्ट तैयार की गई थी। 9 नवंबर को आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में इस रिपोर्ट की अहम भूमिका थी।

10वीं सदी में भी तोड़ा गया मंदिर

बीआर मणि का कहना है कि 2003 में हुई खुदाई के दौरान पता चला था कि जन्मभूमि के नीचे मौर्या, कुषाण, शुंग समेत 9 काल दबे हुए हैं। खनन से मिली सामग्री की कार्बन डेंटिंग से पता चला कि इस स्थल पर ईसा पूर्व 1600 सालों तक के इतिहास की पर्तें दबी हैं।

वहां बड़ी संरचना भी मिली थी। एक बड़ी और मोटी दीवार उत्तर से दक्षिण में काफी लंबाई में मिली थी। इस दीवार के साथ दूसरी दीवारें भी जुड़ी हुईं थी। इस बात की भी जानकारी मिली थी कि 10वीं सदी में भी इस स्थान पर मौजूद मंदिर को तोड़ा गया था। संभव है कि नींव खुदाई के दौरान प्राचीन मंदिर और संस्कृति के बारे में और बड़ी जानकारी सामने आएगी।

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