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महात्मा गांधी / 102 साल पहले ऐसा क्या हुआ, जो सन् 2020 में भी हो रहा है

चित्र – जब महात्मा गांधी स्पेनिश फ्लू से संक्रमित थे।

साल 1918, हिंदी के विख्यात कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी आत्मकथा ‘कुल्ली भाट’ में लिखा, ‘मैं गंगा के घाट पर खड़ा था। जहां तक नजर जाती, गंगा के पानी में इंसानों की लाशें ही लाशें दिखाई देती थीं। मेरे ससुराल से खबर आई कि मेरी पत्नी मनोहरा देवी भी चल बसी। मेरे भाई के सबसे बड़े बेटे ने भी दम तोड़ दिया। मेरे परिवार के और भी कई लोग हमेशा के लिए चले गए। लोगों के दाह संस्कार के लिए लकड़ियां कम पड़ गई थीं। पलक झपकते ही मेरा परिवार मेरी आंखों के सामने ही खत्म हो गयाा। अखबारों से पता चला था कि ये सब एक बड़ी महामारी के शिकार हुए थे।’ इस महामारी का नाम था स्पैनिश फ्लू। महात्मा गांधी की पुत्रवधू गुलाब और पोते शांति की मृत्यु भी इसी महामारी से हुई थी। स्वयं गांधीजी भी इस जानलेवा बीमारी से बीमार पड़ गए थे। कहा जाता है कि मशहूर उपन्यासकार प्रेमचंद भी इस बीमारी से संक्रमित हुए थे।

ये 2 अक्टूबर, 2020 का दिन है, चीजें ज्यादा नहीं बदली हैं, बस चिकित्सा विज्ञान ने तरक्की कर ली है, मौत को रोकने की कोशिश जारी है, लेकिन मौत एक दिन सबको आनी है। इन दिनों कोविड-19 का कहर दुनिया में मौजूद है। चीन ने इजाद किया, दुनिया के कई घर सूने हो गए, कहीं मातम तो कहीं खामोशी चादर ओढ़े चुपचाप बैठी है। 1918 से 2020 यानी 102 साल बाद वही घटनाक्रम। बीमारी बदली है लोग नहीं उस दौर में मौत का आंकड़ा दोनों विश्वयुद्धों में हुई कुल मौतों से भी कहीं ज्यादा और आज उससे ज्यादा हो सकता है।

भारत में यह बीमारी 29 मई 1918 को तब आई, जब पहले विश्व युद्ध से लौट रहे भारतीय सैनिकों का जहाज मुंबई बंदरगाह पर लगा था इस बीमारी से दुनियाभर में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत का अनुमान है, जबकि भारत में इससे 1.20 करोड़ लोग मारे गए थे। – उस समय स्पेनिश फ्लू जब भारत आया तब ब्रिटिश सरकार बेपरवाह थी।  

ठीक इसी तरह जब कोविड-19 का पहला मामला केरल में 30 जनवरी, 2020 को आया भारत सरकार ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि चीन के वुहान विश्वविद्यालय से आए एक छात्र में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए थे। भारत सरकार का रुख भी 102 साल पहले की अंग्रेजी हुकुमत की तरह ही था।

हम इन दोनों महामारी का जिक्र इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि स्पेनिश फ्यू और कोविड 19 दोनों ही बीमारी में व्यक्ति के फेफड़ों पर असर पढ़ता है।

जॉन एम. बेरी ने अपनी किताब ‘द ग्रेट इन्फ्लूएंजा : द स्टोरी ऑफ द डेडलिएस्ट पैनडेमिक इन हिस्ट्री में भारत में इस महामारी के फैलाव का विस्तार से ब्योरा दिया है। वे लिखते हैं कि ट्रेन में सवार होते समय तो लोग अच्छे-भले होते थे, लेकिन गंतव्य तक जाते-जाते मरने के कगार पर पहुंच जाते थे।

इस दौरान भारत में आर्थिक विकास शून्य से कहीं नीचे माइनस 10.8 फीसदी तक जा चुकी थी। शुरू में जब यह बीमारी फैली तो दुनियाभर की सरकारों ने इसे इसलिए छिपाया क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों का मनोबल गिर जाएगा।

क्यों पड़ा स्पेनिश फ्लू नाम

सबसे पहले स्पेन ने इस बीमारी के अस्तित्व को स्वीकार किया। इसीलिए इसे स्पेनिश फ्लू का नाम दिया गया। इस बीमारी का सबसे ज्यादा असर पीड़ित के फेफड़ों पर पड़ता था। उसे असहनीय खांसी हो जाती थी और कभी-कभी नाक व कान से खून बहने लगता था। शरीर में भयंकर दर्द होता था। भारत में मार्च 1920 तक इस पर नियंत्रण पाना संभव हो सका। दुनियाभर में दिसंबर 1920 में इसका खात्मा हुआ।

महात्मा गांधी और स्पेनिश फ्लू

जिस समय स्पेनिश फ्लू का कहर भारत में था, उस समय महात्मा गांधी के एक सहयोगी ने बताया था कि 1918 में उन्हें फ़्लू हो गया था। उस वक्त दक्षिण अफ्रीका से लौटे हुए उन्हें चार साल गुजर गए थे। गुजरात के उनके आश्रम में स्पेनिश फ्लू हो गया था। उस वक्त महात्मा गांधी की उम्र 48 साल थी। फ़्लू के दौरान उन्हें पूरी तरह से आराम करने को कहा गया था। वो सिर्फ तरल पदार्थों का सेवन कर रहे थे। वो पहली बार इतने लंबे दिनों के लिए बीमार हुए थे।

जब उनकी बीमारी की खबर फैली तो एक स्थानीय अखबार ने लिखा था, ‘गांधीजी की ज़िंदगी सिर्फ उनकी नहीं है बल्कि देश की है।’ गांधी और उनके सहयोगी किस्मत के धनी थे कि वो सब बच गए।  हिंदी के मशूहर लेखक और कवि सुर्यकांत त्रिपाठी निराला की पत्नी और घर के कई दूसरे सदस्य इस बीमारी की भेंट चढ़ गए थे।

लॉरा स्पिनी ने पेल राइडर- द स्पेनिश फ्लू ऑफ 1918 नाम की किताब लिखी है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि कैसे अस्पताल के सफाईकर्मियों को इलाज करा रहे ब्रितानी सैनिकों से दूर रखा गया था। ये सफाईकर्मी उस वक्त को याद करते हैं जब 1886 से 1914 के बीच अस्सी लाख लोग मारे गए थे।

लॉरा आगे लिखती है कि औपनिवेशिक अधिकारियों को स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य को अनदेखी करनी की कीमत चुकानी पड़ी थी। हालांकि यह भी सच है कि वे ऐसी त्रासदी का मुकाबला करने में सक्षम बहुत सक्षम नहीं थे। डॉक्टरों की भी भारी कमी थी क्योंकि वे जंग के मैदान में तैनात थे।

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, ‘भारत के इतिहास में पहली बार शायद ऐसा हुआ था जब पढ़े-लिखे लोग और समृद्ध तबके के लोग गरीबों की मदद करने के लिए इतनी बड़ी संख्या में सामने आए थे’।

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