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स्मृति / वक्त उनकी मखमली आवाज को यूं ना भुला पाएगा

31 जुलाई को मोहम्‍मद रफ़ी की 38 वीं पुण्‍यतिथि पर विशेष…

निश्चित ही वे हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक, सर्वश्रेष्‍ठ गायक तो हैं ही, वे एक दुर्लभ किस्‍म के इंसान भी थे। आने वाली पीढि़यों को यह विश्‍वास करना मुश्किल हो जाएगा कि क्‍या मोहम्‍मद रफी जैसा कोई इंसान वास्‍तव में हुआ भी था।

जहां तक गायन की बात है, रफ़ी ने गायन विधा का स्‍तर इतना अधिक ऊंचा उठा दिया कि गाने-बजाने के प्रति उदासीन व्‍यक्ति भी गायन के लिए उत्‍सुक हो जाए। उन्‍होंने अपने गीतों को इस ढंग से गाया कि हर गवैये का मन ललचाने लगता है कि काश हम भी ऐसा गा पाते।

रफ़ी ने गायन को इस तरह स्‍थापित कर दिया कि लोग केवल रफी को सुनकर ही गाना सीख गए। फिर उन्‍हें किसी भी पाठशाला, घराने, गुरु आदि की जरूरत नहीं पड़ी। रफ़ी को सुनना अपने आप में एक संपूर्ण स्‍कूल या यूनिवर्सिटी का कोर्स पूरा करने के समान है।

रफी की तारीफ में कहे गए शब्‍द अतिश्‍योक्ति इसलिए नहीं हो सकते क्‍योंकि उनकी तारीफ करने के लिए शायद कोई पैमाना बना ही नहीं है। प्रशंसा का हर शब्‍द उनके आगे बेमानी है। निश्चित ही रफ़ी जैसा नायाब हीरा सदियों में एक बार नहीं, पूरे इतिहास में केवल एक ही बार पैदा होता है।

आज उनको गए 38 साल पूरे हो गए हैं और उनके गीत हर साल और अधिक गहरे होते जा रहे हैं। अभागे हैं वो लोग जिन्‍होंने मनुष्‍य जीवन तो पाया लेकिन कोई शौक नहीं पाला। शौक तो पाला पर संगीत का नहीं पाला। संगीत का तो पाला लेकिन रफी को नहीं सुना, और रफ़ी को न सुनना एक भरे-पूरे स्‍वर्ग से वंचित हो जाने जैसा है। बेशक, रफ़ी जैसा कोई आदमी कभी जन्‍मा था, यह भी एक रहस्‍य ही बन जाने वाला है।

मोहम्‍मद रफ़ी के बारे में बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि रफ़ी अपने जीवन में शुरुआती दिनों में अपने पिता का हेयर सैलून संभालते थे। 1935 में उनके वालिद लाहौर आ गए थे जहां उन्‍होंने हेयर सैलून खोला था। रफ़ी जिनका उन दिनों पुकारता नाम फीको हुआ करता था, वो सैलून पर 11 साल की उम्र से ही काम करने लगे थे। वहां शेविंग बनवाने आए लाहौर रेडियो स्‍टेशन के डायरेक्‍टर ने एक बारबर का सधा हुआ गुनगुनाना सुना तो हर्ष मिश्रित आश्‍चर्य से उन्‍हें मौका देने की पेशकश कर डाली।

कुछ दिनों बाद ही एक कार्यक्रम में कुंदनलाल सहगल ने बिजली गुल होने से माइक बंद होने पर गाने से इंकार कर दिया तो श्रोताओं को संभालने के लिए बालक फीको को खड़ा कर दिया गया। बालक ने बिना माइक के कुछ यूं तान भरी कि महफिल मंत्रमुग्‍ध होकर सुनती रही और फिर कायनात ने इस बच्‍चे के लिए अपनी संभावनाओं के तमाम द्वार खोल दिए। असल में रफ़ी ने स्‍वयं ना अपना विस्‍थापन चुना, ना करियर, न गायन और ना ही अपना भविष्‍य।

अलबत्‍ता, नियति ने स्‍वयं उन्‍हें चुना और हालातों को उनके अनुकूल मोड़ा। मानो कि उन्‍हें दुनिया के सामने लाना खुद खुदा की मर्जी रही हो। एक देहाती फीको से हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक महान पार्श्‍वगायक बनने का सफ़र उनके लिए ज़रूर हैरत वाला रहा होगा लेकिन बचपन में उनके गांव कोटला सुल्‍तानाबाद में जिस दूरदर्शी फ़कीर ने उन्‍हें देखकर बहुत बड़ा आदमी बनने का आशीर्वाद दिया था, उसके लिए अचंभे जैसा कुछ नहीं होगा। उसकी रूह कहीं होगी तो ज़रूर मुतमईन होगी।

और आज…

31 जुलाई को रफ़ी साहब की 38 वीं पुण्यतिथि है। 1980 में इस तारीख की रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा और तकरीबन साढ़े दस बजे वे चल बसे। यह साल विश्व से तीन महान लोगों के अवसान का साक्षी बना। इसी साल साहिर भी गुजर गए थे और जॉन लेनन का कत्ल हुआ था।

आज रफ़ी साहब को गुजरे साढ़े तीन दशक हो गए हैं और उनसे जुड़े लोगों के दिल में वे बीते 38 साल से स्थायी टीस बनकर चुभ रहे थे, अब उसमें एक साल की और बढ़ोतरी हो गई। हर साल की तरह। कोई 20 बरस पहले टीवी पर मैंने लक्ष्मीकांत का इंटरव्यू देखा था, जिसमें रफ़ी साहब के जीवन के अंतिम दिन यानी 31 जुलाई का जिक्र करते हुए वे फूट—फूटकर रो पड़े थे।

नवोदित (लेखक, पत्रकार हैं। वह बीते 16 साल से संगीत, सिनेमा, खेल और समाजिक मुद्दों लेखन करते हैं।)

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