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दीमक / प्रकृति के वो कारीगर, जो बनाते हैं हजारों साल तक खड़े रहने वाला टीला

चित्र – दीमकों द्वारा बनाए गए अधिकतर टीले इतने मजबूत होते हैं कि सिर्फ ड्रिल करने या हथौड़े से ही तोड़े जा सकते हैं। फोटो : निखिल मोरे

– अनुषा कृष्णनन

  • दीमकों द्वारा मिट्टी से बनाए गए टीले अविश्वसनीय तौर पर मजबूत होते हैं और हवादार भी। इनका शिल्प कुछ ऐसा होता है कि जमीन के नीचे दीमकों के घरोंदे हवादार भी रहते हैं और जरूरी आद्रता भी बनी रहती है।
  • इन टीलों की मजबूती और हवादार होने का रहस्य इनकी बनावट में छिपा है। दो स्तरीय संरचना में एक स्तर पर मजबूती का ख्याल रखा जाता है तो दूसरे स्तर पर हवा के आने-जाने का।
  • इन टीलों में दीमक के लार का काफी महत्व है। लेकिन ये टीलों की मजबूती के लिए नहीं बल्कि इन्हे जलरोधक या कहें वाटरप्रूफ बनाये रखने के लिए होता है ताकि ये बरसात में ढह न जाए।

कीटों की दुनिया में अगर वास्तुकारों या आर्किटेक्ट की बात की जाए तो दीमक बेशक इसके बादशाह माने जाएंगे। मिट्टी, पानी और अपने लार को मिलाकर दीमक जैसा टीला तैयार करते हैं वो किसी मानव निर्मित किले से कम जटिल नहीं होता। इनकी बनायी यह गूढ़ संरचना, न केवल जीव वैज्ञानिकों बल्कि कई आर्किटेक्ट और यहां तक कि रोबोटिक्स के विशेषज्ञों के लिए भी कौतूहल का विषय रहा है।  

अकादमिक क्षेत्र में चर्चा का केंद्र होने के बावजूद भी दीमक के टीले और उसके वास्तुशिल्प को लेकर बहुत कम जानकारी मौजूद है। लेकिन हालही में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) बेंगलुरू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग और सेंटेर फॉर इकोलॉजीकल साइंस ने संयुक्त प्रयास से एक अध्ययन किया। इस अध्ययन में  दीमक के टीलों की मजबूती और स्थिरतामौसमी थपेड़ों के प्रतिरोध की क्षमता और इसको बनाने में प्रयोग होने वाली सामग्री का पता लगाया गया।

इस संयुक्त प्रयास में  भारत में पाए जाने वाले  दीमकों की प्रजाति (Odontotermes obesus) द्वारा बनाए जाने वाले टीलों का अध्ययन किया गया। ये दीमक अपना घरौंदा जमीन के नीचे बनाते हैं। इनके बनाये घरौंदे में न केवल लाखों मजदूरों के रहने की जगह होती है बल्कि सिपाहियों, दीमकों के लार्वा या कहें इनके छोटे बच्चे और राजा-रानी के लिए भी जगह बनायी जाती है। इनकी बनाई संरचना में फंगल गार्डन  या कवक उद्यान भी शामिल होता है।

इनके बनाए घरौंदे के तापमान में एक तरह की निरंतरता जरूरी है। साथ  ही इसका भी ध्यान रखा जाता है कि घरौंदे में उच्च आर्द्रता बनी रहे। क्योंकि ऐसे ही वातावरण में उस फंगस या कवक का विकास होता है जिसको खाकर ये दीमक जीवित रहते हैं। यही इनका एकमात्र भोजन है। इस फंगस के विकास के लिए उचित वातावरण बना रहे और साथ में घरौंदे में हवा का आवागमन बरकरार रहे- इसीलिए दीमक अपने घरौंदों के ऊपर उस टीले का निर्माण करते हैं। कभी-कभी छः फीट तक की ऊंचाई छू लेने वाले ये टीले अविश्वसनीय रूप से काफी मजबूत और टिकाऊ होते हैं।

कैसे किया गया दीमकों के टीले का अध्ययन

निकिता जचारिया, आईआईएससी में शोध-छात्रा हैं वह बताती हैं कि पहले जब लोग इन टीलों का अध्ययन करना चाहते थे तो इसे बीच से तोड़कर नमूना या कहें सैम्पल निकालते थे। ऐसा करने से टीला पूरी तरह तहस-नहस हो जाता था। निकिता ने सोचा कि खाली पड़े टीलों के साथ तो ऐसा करना ठीक है पर जहां अब भी दीमक रह रहे हैं उन टीलों को ऐसे तोड़ना उचित नहीं है। वह आगे कहती हैं कि इसको ध्यान में रखकर मैंने अपनी ड्रिलिंग मशीन खुद बनाई ताकि हम इन नन्हे टीलों से नमूना भी निकाल लें और टीले बर्बाद भी न हों।

इससे निकिता को यह सुविधा हुई कि वो आसपास के खाली पड़े और उन टीलों से भी जिसके नीचे वर्तमान में दीमक रह रहे थे, नमूने निकाल पाईं। इन नमूनों को फिर एक टेस्टिंग मशीन में डाला गया। इस मशीन का आकार कुछ  बादाम या अखरोट तोड़ने वाले मशीन की तरह होता है। इस मशीन से तब तक दबाव बनाया गया जब तक टीलों से लिए गए नमूने टूट ना जाएं ।

परिणाम में देखा गया कि इन टीलों के मुख्य दीवार, इनके परिधीय दीवार से काफी मजबूत हैं। करीब 35 से 40 फीसदी मजबूत। लेकिन जब सीटी स्कैन और हवा पारगम्यता की जांच की गयी तो पाया गया कि परिधीय दीवार इसके लिए अधिक उपयुक्त है। इन दोनों अध्ययनों से पता चला कि दीमकों के बनाए टीलों में विभिन्न प्रकार की दीवार बनाई जाती है जो एक तरफ तो मजबूती का ख्याल रखती है और दूसरी तरह हवा के आने-जाने का भी।

दीमकों के टीले कितने मजबूत?

यह एक आम धारणा है कि दीमकों के बनाये टीले काफी मजबूत होते हैं। पर इस धारणा में वैज्ञानिकता कितनी है यह नहीं मालूम? इसकी क्या संभावना है कि ये टीले खुद के भार से ढह न जाएं? ये सारे सवाल तेजस मूर्ती के हैं जो आईआईएससी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े तेजस भी इस अध्ययन का हिस्सा हैं।  

इन टीलों से लिए गए नमूनों के आधार पर इनके घनत्व और मजबूती का अध्ययन करने वाले एक छात्र सौरभ सिंह ने बताया कि इनकी मॉडलिंग दो तरीकों से की गई। त्रिकोण और समलंब चतुर्भुज। यह माना गया कि टीले इन दो तरीकों से ही बने होंगे। पर अध्ययन में पाया गया कि इन टीलों का नक्शा त्रिकोण और समलंब चतुर्भुज के बीच में कहीं हैं।

इनके विश्लेषण से पता चलता है कि दीमक के टीले अत्यंत स्थिर हैं। सुरक्षा कारक के आधार पर शोधकर्ताओं ने त्रिकोणीय आकार वाले टीले को 100 और चतुर्भुज को करीब 50 की रैंकिंग दी। मूर्ति बताते हैं कि आमतौर पर जो इमारतें हम अपने आस-पास देखते हैं उनका स्कोर 1 से 2 के बीच होता है या कभी-कभी 3 भी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ये इमारतें अपने वजन से क्रमशः एक, दो या तीन गुना तक वजन होने के बावजूद भी स्थिर बनी रहेंगी।

इंसान मकानों या इमारतों को बनाते समय केवल गुरुत्वाकर्षण का ही ध्यान रखते हैं।  दीमकों द्वारा बनाए गए टीले, हो सकता है कि प्राकृतिक आपदा को ध्यान में रखकर बनाये जाते हों।

दीमकों के टीलों में इस्तेमाल होने वाले ‘ईंट

दीमकों द्वारा बनाये गए अधिकतर टीले इतने मजबूत होते हैं कि सिर्फ ड्रिल करके या हथौड़े से ही तोड़े जा सकते हैं। कुछ टीलों में मौसम की मार झेलने की ऐसी क्षमता होती है कि  ये हजारों साल तक ऐसे ही खड़े रह सकते हैं। यह सारी जानकारी तब अविश्वसनीय लगने लगती है जब हमें यह पता चलता है कि इन टीलों को बनाने में बस जैविक सीमेंट का ही इस्तेमाल होता है। यह महज मिट्टी, पानी और दीमकों के लार से बना हुआ होता है।

जब दीमकों को टीले बनाने की या मरम्मत करने की जरूरत होती है तो वे पहले जैविक सीमेंट से तैयार गोलाकार ईंट बनाते हैं। इन्हे अंग्रेजी में बॉउलस (bolus) कहा जाता है। रेने बोर्जेस, आईआईएससी के सेंटर फॉर इकोलॉजीकल साइंस में प्रोफेसर हैं वह बताती हैं कि दीमकों में बॉउलस बनाने की क्षमता प्रकृति की देन है। अगर आप प्रयोगशाला में  बैक्टीरिया आदि को उत्पन्न करने वाले बर्तन में दीमकों को छोड़ दें और उस बर्तन में थोड़ा पानी तथा फ़िल्टर पेपर मौजूद हो तो वहां भी ये बॉउलस बना देंगे।

इनके अनुसार दीमक किसी भी चीज से बॉउलस बना लेते हैं। मिट्टी, शीशा, कागज इत्यादि कुछ भी। लेकिन अगर इन्हें विकल्प दिया जाए तो ये मिट्टी, पानी और अपने लार का ही इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। इस पर जब और भी अध्ययन किया गया तो पता चला कि दीमक का लार दीवारों को मौसम की मार और अपक्षरण से बचाने के लिए होता है। लार एक तरह से इन टीलों को बरसात में ढहने से बचाते हैं। शोधकर्ताओं ने नमूने को बार-बार गीला किया और सुखाया तब जाकर उन्हें इस दीमक के लार का महत्व समझ में आया।

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